Monday, March 7, 2011

नारी सशक्तिकरण की सच्चाई

आज की नारी में भले ही आगे बढ़ने की छटपटाहट हो और जीवन और समाज के हर क्षेत्र में कुछ नया कर दिखाने का सपना हो, साथ ही आधी दुनिया में नया सवेरा लाने और ऐसी सशक्त इबारत लिखने का माद्दा हो, जो महिला को अबला न रहकर सबला बना देती हो। भारत की पराधीनता की बेडियां कट जाने के बाद नारी ने भले ही अपने भविष्य के लिए जोरदार अभियान चालया हो और कई मोर्चो पर उसने प्रमाणित भी किया हो लेकिन इसके बावजूद भी महिलाएं कहीं न कहीं दोराहे पर खड़ी दिखाई देती है। महिलाओं के अधिकारों के लिए गठित महिला आयोग महज नाम के रह गये हैं। अंतराष्ट्रीय महिला दिवस सौ साल का हो गया हो लेकिन आज भी महिलाओं का सर्वांगिण विकास का दावा अधूरा है। मार्च 2010 की कैग की रिपोर्ट पर नजर डाले तो देश में महिलाओं की स्थिति दयानीय है। कैग ने अपनी रिपोर्ट में साफ किया कि देश में बनाया गया राष्ट्रीय महिला आयोग पूरी तरह से भ्रष्ट है। कैग के अनुसार साल 2008-09 में आयोग के पास लगभग बारह हजार आठ सौ उन्नींस शिकायतें आयी। जिसमें से सिर्फ सात हजार पांच सौ नौ शिकायतों पर ही गौर किया गया। जबकि कार्रवाई मात्र एक हजार सत्तर पर की गई। इन आंकड़ों पर अगर गौर किया जाय तो साफ होता है कि देश में महिलाओं का सशक्तिकरण कम उनका उत्पीड़न ज्यादा हो रहा है। जबकि महिलाओं के अधिकारों की बात करते वाले आयोग महज नाम के रह गये है। बिडंबना देखिए कि देशभर के जेलों में बंद महिलाओं की दशा का जायज़ा पिछले चार सालों से नहीं लिया गया है। जो कि महिला आयोग के कार्य शैली और मानवीय सोच पर प्रश्न चिन्ह खडा कर देता है। उत्तराखंड की स्थिति भी इससे कोई जुदा नहीं है। जिस राज्य को बनाने में महिलाओं ने अपनी इज्जत तक दांव पर लगा दी थी उसी राज्य में महिलाआंे का उत्पीड़न का ग्राफ हर रोज कुलाछे भर रहा है। प्रदेश में महिलाओं के अधिकारों के लिए गठित आयोग काम का न धाम सिर्फ नाम का रहा गया है। नौ अक्टूबर 2003 को प्रदेश में राज्य महिला आयोग अस्तित्व में आया। तब से लेकर अब तक आयोग को 4641 शिकायतें मिली। जिसमें साल 2003-04 में आयोग के पास 40 शिकायतें मिली, तो साल 2004-2005 में 128 तो साल 2005-06 में 457। महिला उत्पीड़न मामला साल 2006-07 में बढ़कर 566 हुआ। तो साल 2007-08 में यह संख्या 747 तक जा पहुंचा। 2008-09 में उत्पीड़न का ग्राफ में ईजाफा हुआ और यह संख्या 913 हुई। वहीं 01 अप्रैल 2009 से 31 मार्च 2010 तक आयोग के पास 737 महिला उत्पीड़न के मामले आये। जबकि इस साल यह आंकड़ा 1053 तक जा पहुचा। साल दर साल बढ़ते आंकडे़ बताते हैं, कि प्रदेश में महिलओं की स्थिति अच्छी नहीं हैं। राज्य ने एक दशक का सफर तय कर दिया लेकिन इस सूबे में अभी तक महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक भी नीति नहीं हैं। लिहाजा प्रदेश में महिलाओं का विकास चाहिए तो इसके लिए एक अदद स्वस्थ नीति बनानी होगी साथ ही हर क्षेत्र में महिलाओं की भागदारी भी तय होनी चाहिए। इतना ही नहीं महिलाओं के हकों के लिए गठित महिला आयोग को भी अपनी जिम्मेदारी के प्रति गंभीर होना होगा। तभी जाकर इस प्रदेश की महिलाओं का सम्मान होगा और उनका विकास होगा। 

Friday, March 4, 2011

मै जिंदा हूं हुजूर

मै जिंदा हूं हुजूर...... ये गुहार उस बुजुर्ग की है, जो समाज कल्याण विभाग की धूल चढ़ी फाइलों में स्वर्ग पहुंचा दिया गया है। मामला उत्तरकाशी जिले हैं, जहां सत्तर वर्षीय मुताडू लाल समाज कल्याण विभाग की नजरों में स्वर्गसिधार गया है। जिसके चलते विभाग ने दो साल पहले सरकार द्वार मिलने वाली तमाम पेंशन बंद कर दी। इसकी शिकायत मुताडू लाल ने अपने स्तर से विभाग से की लेकिन किसी भी अधिकारी ने इस बुजुर्ग की एक नहीं सुनी। बिडंबना देखिए अपने जिंदा रहने सबूत इससे ज्यादा क्या होगा कि वो अधिकारी के सामने खड़ा हो लेकिन अधिकारी हैं कि अपने विभाग के कर्मचारियों की उस सत्यापन रिपोर्ट पर भरोसा कर रहे हैं जो शायद घर में खुद तैयार की है। सरकारी काम काज के तौर तरीके देखिए आपको भी खुद हौरानी होगी। लेकिन इन अधिकारियों को नहीं जो किसी भी आदमी को जब चाहें स्वर्ग पहुचा दें और जब चाहे वापस धरती पर बुले लें। ऐसा नहीं है कि मुताडूू लाल ने इसकी जानकारी जिला के आला अधिकारियों न दी हो लेकिन इसके बाद भी अधिकारी मुताडू लाल की रूकी पेंशन नहीं दिला पाये। इतना ही नहीं मुताडू लाल ने इसकी शिकायत जनप्रतिनिधियों से भी लेकिन मामला ढाक के तीन पात रहा। भला हो गांव के पूर्व प्रधान का जिसने इस पीड़ित की पीड़ा समझी।
जुलाई 2009 के बाद पेंशन न मिलने परेशान मुताडू लाल ने इसकी शिकायत की। कई शिवरों में अपनी अर्जी दी। लेकिन कहीं से भी मदद नहीं मिली। इस बात की खबर मीडिया को लगी तो मीडिया ने समाज कल्याण अधिकारी से इसकी जानकारी ली। मीडिया की मौजूदगी में जब विभागीय कारनामों का पता चला तो कर्मचारियों के होश गुम हो गये। आनन-फानन में जिला समाज कल्याण अधिकारी ने पेंशन जारी करने आदेश दिये। साथ ही ग्राम विकास अधिकारी को दोबारा सत्यापन करने का फरमान सुनाया। ऐसा नहीं है कि सरकारी काम-काज में ये पहली बार हुआ हो इससे पहले भी कई लोगों को समाज कल्याण विभाग ने मृत घोषित किया। लेकिन बिडंबना देखिए कि विभाग ने इससे कोई सबक नहीं लिया। लिहाजा समाज कल्याण विभाग की कार्य प्रणाली पर सवाल उठना लाजमी है।

Tuesday, March 1, 2011

गढ़ों की गड़बडाई गणित!


(वीरू भड़ों कु देश बावन गढ़ों कु देश) लोक गायक नरेद्र सिंह नेगी के इस गीत में गढ़वाल साम्राज्य और यहां के वीर और उनकी वीरता का जिक्र है। इस गीत के माध्यम से भारत संघ में विलय हुए टिहरी रियासत के उन गढ़ों का भी जिक्र है। जिन पर गढ़वाल नरेश का शासन रहा। गढ़वाल साम्राज्य में गढ़ों का खासा महत्व रहा। बावन गढ़ों में समिटे गढ़वाल साम्राज्य के हर गढ़ का अपना वैभव और इतिहास रहा है। इन गढ़ों में लोई गढ़, बडियार गढ़, लोदन, भरदार गढ़,तोप गढ़, चौंडा़गढ़, चांदपुर गढ़, फत्यांणां, बधांण, कुंजडी, भरपूर गढ़, क्वीली गढ़, मौल्या, रैका गढ़, उप्पू गढ़, कंडारा, लोहाब, संगेला, माब, बगरी, रंवाई गढ़, नाळा, जौंट गढ़, मुंगरा, हिन्दाव गढ़, कांडा, उमटा, खैरा, तिड़िया, हैरासू, कोट, साबली, नवासू, वनगढ़, चौंदकोट, गुजडू, मासूर गढ़, रामीबदलपुर गढ़, उल्खा गढ़, लंगोर गढ़, अजमेर, नयाल, खिमसारी, सुम्याळ, देवलगढ़, रानी गढ़ संकरी, कोली, भुवनासिर, गुरू गढ़, बांगर, दसोली गढ़, है। लेकिन हाल ही में गढ़वाल रियासत के गढ़ों की संख्या पर नयी बहस छिड गई है। 1823 के सर्वे जर्नल पर निगाह डाले तो गढ़वाल रियासत में 52 नहीं बल्कि 55 गढ़ मिलते हैं। इतिहास में गहरी रूचि रखने वाले मसूरी के गोपाल भारद्वाज ने दावा किया कि इंग्लैंड के जर्नल्स ऑफ रॉयल ज्योग्राफिकल सोसाइटी से मिले तत्कालीन दस्तावेज में गढ़वाल साम्राज्य के अधीन पचपन गढ़ थे न कि बावन गढ़। इतिहासकार गोपाल भारद्वाज का कहना है कि 1817 में भारत के तत्कालीन सर्वेयर जनरल एचएल हर्बर्ट और जनरल जौन अंथोनी होजसंस ने सिरमौर-गढ़वाल की पैदल यात्रा की थी। इनका मकसद गंगा यमुना के उद्गम स्थल को ढूंढना था। उनके सर्वे बताते हैं कि जब वो लोग यात्रा पर निकले तेा उन्हें तीन गढ़ों से होते हुए गंगा के मायके पहुचे। इतिहासकार बताते हैं कि जर्नल में एचएल हर्बट और जौन अंथोनी हेजसंस ने लिखा कि वो 24 मार्च 1817 को कालसी से चले और 24 हजार पांच सौ ग्यारह कदम चलने पर आमला नदी से एक खाई नजर आयी। खाई से छह हजार कदम पर दो मंजिला बैराटगढ़ की तेवार नजर आयी। आपको बता दें कि तेवार उस दौरान गढ़पतियों का महल हुआ करता था। जो कि समुद्र तल से 6508 फुट की ऊचाई पर है। इसी किले को गोरखा सेना ने कर्नल कारपेंटर की अंग्रेजी सेना के खिलाफ इस्तेमाल किया था।इतना ही नहीं इतिहासकार बताते हैं कि बैराटगढ़ से चलकर ये दोनों सर्वेयर दूसरी जगह पहुंचे जिसे उन्होने अपने नक्शे में बस्तील गढ बताया। जो कि हिमाचल और जौनसार की सीमा के पास और देहरादून जिले में पड़ता है। तीसरे गढ़ मसूरी में बताया गया। जिसका दुधली गढ़ के नाम से जिक्र है। इतिहास कार गोपाल भारद्वाज का कहना है कि इन गढ़ों की अभी तक किसी के पास जानकारी नहीं थी। हालांकि उन्होंन ये भी बताया कि पुरातत्व विभाग बैराटगढ़ को गढ़ के रूप में लगभग अपनी स्वीकृति देता है। इतिहासकार गोपाल भारद्वाज के पास मौजूद ब्रिटिशकालीन तथ्यों ने टिहरी रियासत के इतिहास को दोबारा समझने और जानने के लिए मजबूर तो कर दिया साथ गढ़ों की संख्या पर एक नई बहस भी छेड दी है। गढ़वाल साम्राज्य के अधीन अभी तक 52 गढ़ बताये जाते थे लेकिन तीन और गढ़ों के तथ्य मिलने से गढ़ों के इस गीत के बोल बदल तो सकते हैं लेकिन गढ़वाल के तीन हजार साल पुराने इतिहास की जानकारी हासिल करना आसान काम नहीं होगा।

Tuesday, January 4, 2011

यूकेडी के फिल्डमार्शल पर दल का कोर्टमार्शल


समर्थन वापसी के बाद से यू के ड़ी बॅटी बॅटी सी नजर आ रही थी । जहॉ एक तरफ केन्द्रीय अध्यक्ष के फैसलों ने दिवाकर एण्ड़ कम्पनी के ख्ेामें में खलबली मचाई हुई थी वही अब त्रीवेन्द्र सिंह पंवार ने दिवाकर भट्ट का पर्टी से आजीवन निष्कासन का एलान कर दिया है । इससे पहले अध्यक्ष ने मंत्री जी को कारण बताओ नोटिस जारी किया था साथ उन्हे ये भी कहा गया कि उन्होने अभी तक सरकार कोे इस्ताफ क्यो नही सौपा । लेकिन ना ही दिवाकर की तरफ से कोई बयान आया और ना ही उनक इस्तीफा । और ऐसे में पार्टी ने ये फैसला कर लिया कि उन्हे पार्टी से बाहर का रस्ता दिखाऐं । लेकिन पार्टी का ये फील्ड़मार्शल पार्टी में अपनी अनुशासनहीनता के लिए जाना जाता है । इससे पहले भी दिवाकर पार्टी से अलग हुए है । पहले उत्तराखंड आंदोलन के दौरान संगठन 1996 में टूटा। उस समय भी दिवाकर भट्ट ने संगठन को कमतर आंकते हुए खुद को पार्टी का खुदा समझा और दल से अलग हो गये। समय के साथ पार्टी का कदमताल देख 1999 में दिवाकर फिर यूकेडी में शामिल हुए, और आपसी मतभेदों को दूर कर पार्टी का फिर एकीकरण हुआ। 2000 में राज्य का गठन हुआ। चार विधायकों के साथ प्रदेश की पहली भाजपानीत सराकर में यूकेडी भी भागीदार बनी। सत्ता की मलाई चाटने के बाद 2003 में यूकेडी फिर बिखर गई। अफसोस कि तब भी बिखराव के कर्ताधर्ता दल के फिल्डमार्शल दिवाकर भट्ट थे। पार्टी ने फिर से दिवाकर भट्ट को बाहर का रास्त दिखाया। उस समय उक्रांद को क्षेत्रीय दल की मान्यता मिली थी और इस टूटन के बाद दल की मान्यता पर भी खतरा मंडराया लेकिन दल अपनी मान्यता बचाने में सफल रहा। दो साल बाद पार्टी की मजबूत स्थिति को देखते हुए मौजूदा काबीना मंत्री दिवाकर भट्ट यूकेडी में शामिल हो गये। अपने जन्म से ही टूटने, जुड़ने और विखरने का दंश झेल रही यूकेडी एक बार फिर विखराव के कगार है इस बार भी दिवाकर भट्ट बिखराव के कर्ताधर्ता है। लेकिन इस बार पार्टी उन्हें बकासने के मूड़ में नहीं है। पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष त्रिवेंद्र सिंह पंवार के कठोर निर्णय के बाद आखिरकार इस फिल्डमार्शल का कोर्टमार्शल करते हुए पार्टी से आजीवन निष्कासन कर दिया है। ऐसे में खैट पर्वत की ऊंचाई तक चढ़ चुका बुजुर्ग दिवाकर भट्ट का राजनीतिक करियर पर फुल स्टाप नजर आ रहा है। लेकिन राजनीतिक समीकरण कब बदल जाये कोई कह नहीं सकता।

Monday, September 20, 2010

टिहरी बांध का जलस्तर बढ़


एशिया का सबसे बडा़ बांध इस समय चर्चा का विषय बना है। वजह कोई और नहीं बल्कि बारिश है। दरअसल प्रदेश में भारी बारिश से नदियां अपने उफान पर है। जिससे भागीरथी और भिलंगना नदी पर बने टिहरी बांध का जलस्तर लगातार बढ़ता जा रहा है। हालत ये हो चुके हैं कि लगभग 45000 क्यूमैक्स पानी स्टोर करने की क्षमता रखने वाला टिहरी बंाध में पानी का जलस्तर 19 सितंबर की रात तक 827.30 एमएसएल तक पहुंच गया था। रविवार को 25 सेंटीमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ रहे झील के स्तर का सोमवार को एमएसएल 831 तक पहुंच गया अगर यही स्थिति रही तो जलस्तर एमएसएल 835 के आसपास तक पहुचने की संभावना है। जिससे कोटेश्वर बांध को भी खतरा पहुंच सकता है। यही नहीं एमएसएल 835 तक जलस्तर पहुचने से चिन्यालीसौड़ कस्बा तो घनसाली कस्बे तक भी झील में समा जायेगा साथ ही आसपास के लगभग 70 गांव पानी में डूब जायेंगे तो लगभग 100 गांव के लोग सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। वहीं बांध सूत्रों की माने तो इस समय टिहरी झील का पानी छोड़ना किसी आफत को दावत देना है। सूत्रों की मानें तो झील में सोलह सौ क्यूमैक्स पानी आ रहा है। जो कि बांध क्षमता को सीधे प्रभावित कर रहा है। सूत्रों की माने तो अगर इतने ही पानी को छोड़ा जायेगा तो अब तक चार सौ करोड़ रूपये खर्च हो चुके कोटेश्वर बांध को सीधा नुकसान पहुच जायेगा। यही स्थिति झील से सटे गांवों की भी है। अगर पानी को स्टोर किया जाता है तो झील से लगे गांव पानी में समा जायेंगे। वहीं पुर्नावास निदेशालय का कहना है कि डूब क्षेत्र में आने वाले गांव के लोगों को ऊंचे स्थान पर शरण दे दी। लेकिन विडंबना देखिए कि बांध प्रभावित लोगों के पुर्नावास को लेकर अभी तक कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गयी है। वहीं मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने टीएसडीसी को तत्काल पानी छोडने के आदेश दिये हैं। लेकिन टीएचडीसी कोटेश्वर बांध को नुकसान से बचाने के लिए बांध के जलस्तर को कम नहीं कर रहा। वहीं सूत्रों का कहना है कि अगर समय पर कोटेश्वर बांध में शटर लगा दिये गये होते तो ये हालत नहीं होती। जिससे साफ होता है कि टीएचडीसी लोगों को बचाने की जगह अपने ही प्रोजेक्ट को बचाने में लगा है। अगर बांध का जलस्तर यूं ही बढ़ता गया तो गांव के डूबेंगे ही साथ ही कोई बड़ी अनहोनी भी हो सकती है।

Saturday, August 21, 2010

नाम की राजनीति


मंगलवार को कैबिनेट ने भले ही राज्य हित में कई फैसले लिए हो। लेकिन एफिलिएटिंग यूनिवर्सिटी का नाम पं. दीन दयाल उपाध्याय रख कर अपने ही पैर पर कुल्हाडी मार दी। पिछले काफी लंबे समय से एफिलिएटिंग यूनिवर्सिटी को लेकर प्रदेश भर में आंदोलन हो रहे थे। इस यूनिवर्सिटी को बसाने के लिए बकायदा चमेाली, टिहरी, उत्तरकाशी और देहरादून अपनी-अपनी दावेदारी ठोक रहे थे। कैबिनेट ने इस यूनिवर्सिटी को टिहरी में बसाने की मंजूरी तो दी लेकिन यूनिवर्सिटी के नाम पर एक बार फिर से अपनी पुरानी कुटिल चाल चल दी। हद तो तब हो गयी जब कैबिनेट ने टिहरी के अमर शहीद सुमन श्रीदेव और पहाड़ के गांधी कहे जाने वाले स्वर्गीय इंद्रमणी बडोनी के नाम को दर किनार कर दिया। जिससे साफ हो चला है कि प्रदेश सरकार अपने इन महान विभूतियों को तवज्जो नहीं देना चाहती। यूनिवर्सिटी का नाम पं.दीन दयाल उपाध्याय कर एकबार फिर से भाजपा सरकार ने उत्तराखंड की सरजमीं पर नामों की राजनीति की पुरानी यादें ताजा कर दी है। जिससे प्रदेश भर में एक नया विवाद सिर उठाने लग गया है। आखिर ऐसी क्या वजह थी कि कैबिनेट ने प्रदेश के महान सपूतों के नाम पर यूनिवर्सिटी का नाम न रख पं. दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर मुहर लगा दी। जबकि पं. दीनदयाल उपाध्यान का प्रदेश हित में कोई अहम योगदान नहीं है। ऐसे में साफ हो चाल है भाजपा ने एक बार फिर से नामों की राजनीति का सिलसिला शुरू कर दिया है। लेकिन सवाल ये उठता कि आखिर क्या कभी प्रदेश में अपनों के नाम पर कभी किसी संस्थान का नाम होगा भी या नहीं।

Sunday, August 1, 2010