उत्तराखंड की राजनीति में आया भूचाल आखिककार थम गया है। भाजपा की उधड़ी हुई सांसे अब सामान्य हो चुकी है, लेकिन डर अभी भी बरकरार है, भाजपा का ये डर किरण की करतूत से उपजा था, मंडल के कांग्रेस का दामन थामन से भाजपा के कमंडल में जो सुनामी आयी थी, उस सुनामी में कुछेक विधायकों के बहने के आसार थे। हुआ भी कुछ ऐसा ही, टिहरी के घनसाली में खिला भाजपा का फूल भीमलाल आर्य के कांग्रेस में चले जाने से मुरझाने वाला था, लेकिन ऐन वक्त पर भाजपा के क्षेत्रीय क्षत्रपों ने भीमलाल को उठाकर, देहरादून में पार्टी नेताओं के सामने पेश किया। टिहरी से देहरादून की दूरी तय करते करते भीमलाल ने भी अपने सुर बदले और अपने आपको पार्टी का अनुशासित सिपाही बताया। टिहरी और दून की दूरी के बीच ऐसा क्या हुआ कि भीमलाल ने पूरे ड्रामे का ठीकरा मीडिया के सर फोड़ा। लेकिन भीमलाल ने ये बात नहीं बताई कि पिछले सात दिनों से वो कहां लापता थे। खैर ये बात भीमलाल कैसे स्वीकारते कि वो भी कांग्रेस का दामन थामने वाले थे। जिस प्रकार की खबर सामने आ रही थी उससे साफ हो चला था कि भीमलाल आर्य कांग्रेस की शरण में जाने वाले थे, इतना ही नहीं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल और नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट ने भी भीमलाल की घर आने की आस छोड़ दी थी, लेकिन इसके बाद भाजपा के दो बिग बी ने मोर्चा संभाला और स्थिति को काबू में कर भीमलाल आर्य की घर वापसी कराने में कामयाबी पायी। घनसाली विधायक के घर वापसी के पीछे बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं का सक्रिय होना और परिवार सहित क्षेत्रिय जनता का मुखर होना भी है। भले ही भीमलाल आर्य ने साफ कर दिया हो कि वो कांग्रेस में नहीं जाने वाले हैं, लेकिन भाजपा के विधायक के द्वारा रचे ड्रामे से पार्टी भविष्य के लिए सर्तक हो चुकी है। किरण मंडल के कांग्रेस में जाने से भयभीत भाजपा किसी भी कीमत पर अपना विधायक नहीं खोना चाहती। लिहाजा भाजपा ने कुछ दिन पहले उन विधायकों से भी मीडिया में सफाई दिलवाई कि उनके नाम को यूं ही मीडिया में घसीटा जा रहा है। पुरोला विधायक मालचंद और लैंसडाउन विधायक दिलीप रावत के बयान के बाद भले ही भाजपा ने थोड़ी राहत महसूस की हो लेकिन राजनीति के चौसर पर खेल में कब बाजी हाथ से निकल जाये इस बात को भाजपा नेता अच्छी तरह जानते भी है और समझते भी है। लिहाजा ऐसे विधायकों से नजर फेरने से वो धोखे में भी नहीं रहना चाहती। उधर कांग्रेस को मिशन भीमलाल आर्य में भले ही झटका लगा हो लेकिन कांग्रेस भी अपने मिशन को यू ही आधे पर नहीं छोड़ना चाहियेगी, भीमलाल नहीं तो कोई और के मकसद से कांग्रेस मिशन में जुटेगी। क्योंकि भाजपा में भीम अकेला नहीं हैं।
Saturday, June 23, 2012
भीम अकेला नहीं!
उत्तराखंड की राजनीति में आया भूचाल आखिककार थम गया है। भाजपा की उधड़ी हुई सांसे अब सामान्य हो चुकी है, लेकिन डर अभी भी बरकरार है, भाजपा का ये डर किरण की करतूत से उपजा था, मंडल के कांग्रेस का दामन थामन से भाजपा के कमंडल में जो सुनामी आयी थी, उस सुनामी में कुछेक विधायकों के बहने के आसार थे। हुआ भी कुछ ऐसा ही, टिहरी के घनसाली में खिला भाजपा का फूल भीमलाल आर्य के कांग्रेस में चले जाने से मुरझाने वाला था, लेकिन ऐन वक्त पर भाजपा के क्षेत्रीय क्षत्रपों ने भीमलाल को उठाकर, देहरादून में पार्टी नेताओं के सामने पेश किया। टिहरी से देहरादून की दूरी तय करते करते भीमलाल ने भी अपने सुर बदले और अपने आपको पार्टी का अनुशासित सिपाही बताया। टिहरी और दून की दूरी के बीच ऐसा क्या हुआ कि भीमलाल ने पूरे ड्रामे का ठीकरा मीडिया के सर फोड़ा। लेकिन भीमलाल ने ये बात नहीं बताई कि पिछले सात दिनों से वो कहां लापता थे। खैर ये बात भीमलाल कैसे स्वीकारते कि वो भी कांग्रेस का दामन थामने वाले थे। जिस प्रकार की खबर सामने आ रही थी उससे साफ हो चला था कि भीमलाल आर्य कांग्रेस की शरण में जाने वाले थे, इतना ही नहीं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बिशन सिंह चुफाल और नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट ने भी भीमलाल की घर आने की आस छोड़ दी थी, लेकिन इसके बाद भाजपा के दो बिग बी ने मोर्चा संभाला और स्थिति को काबू में कर भीमलाल आर्य की घर वापसी कराने में कामयाबी पायी। घनसाली विधायक के घर वापसी के पीछे बूथ स्तर तक के कार्यकर्ताओं का सक्रिय होना और परिवार सहित क्षेत्रिय जनता का मुखर होना भी है। भले ही भीमलाल आर्य ने साफ कर दिया हो कि वो कांग्रेस में नहीं जाने वाले हैं, लेकिन भाजपा के विधायक के द्वारा रचे ड्रामे से पार्टी भविष्य के लिए सर्तक हो चुकी है। किरण मंडल के कांग्रेस में जाने से भयभीत भाजपा किसी भी कीमत पर अपना विधायक नहीं खोना चाहती। लिहाजा भाजपा ने कुछ दिन पहले उन विधायकों से भी मीडिया में सफाई दिलवाई कि उनके नाम को यूं ही मीडिया में घसीटा जा रहा है। पुरोला विधायक मालचंद और लैंसडाउन विधायक दिलीप रावत के बयान के बाद भले ही भाजपा ने थोड़ी राहत महसूस की हो लेकिन राजनीति के चौसर पर खेल में कब बाजी हाथ से निकल जाये इस बात को भाजपा नेता अच्छी तरह जानते भी है और समझते भी है। लिहाजा ऐसे विधायकों से नजर फेरने से वो धोखे में भी नहीं रहना चाहती। उधर कांग्रेस को मिशन भीमलाल आर्य में भले ही झटका लगा हो लेकिन कांग्रेस भी अपने मिशन को यू ही आधे पर नहीं छोड़ना चाहियेगी, भीमलाल नहीं तो कोई और के मकसद से कांग्रेस मिशन में जुटेगी। क्योंकि भाजपा में भीम अकेला नहीं हैं।
Wednesday, November 16, 2011
विरासत की बिडंबना
हे! हिमालय के वंशजों
ये कैसी विरासत छोड़ गये
गम दे गये जीवन में
अकेलापन और घुटन भी दे गये।
खिलखिलाती हंसती जिंदगी में
ये कैसी विरासत दे गये
दर्द का अंबार और खामोशी
की चादर भी ओढ़ के चले गये।
हे! हिमालय के वंशजों
लड़-प्यार में गम के बीज
क्यों बो गये।
पता था तुम्हें फिर भी
ये विरासत क्यों सौंप गये।
याद नहीं मुझे मेरे पुरखों
खुशी की नाव में तुम
गम की पतवार कब छोड़ गये।
चाहत तो प्रकाश पुंज की थी
लेकिन मौत का पुलिंदा छोड़ गये।
हे! हिमालय के वंशजों
ये कैसी विरासत छोड़ गये।
ये कैसी विरासत छोड़ गये
गम दे गये जीवन में
अकेलापन और घुटन भी दे गये।
खिलखिलाती हंसती जिंदगी में
ये कैसी विरासत दे गये
दर्द का अंबार और खामोशी
की चादर भी ओढ़ के चले गये।
हे! हिमालय के वंशजों
लड़-प्यार में गम के बीज
क्यों बो गये।
पता था तुम्हें फिर भी
ये विरासत क्यों सौंप गये।
याद नहीं मुझे मेरे पुरखों
खुशी की नाव में तुम
गम की पतवार कब छोड़ गये।
चाहत तो प्रकाश पुंज की थी
लेकिन मौत का पुलिंदा छोड़ गये।
हे! हिमालय के वंशजों
ये कैसी विरासत छोड़ गये।
Tuesday, July 19, 2011
भला प्रेम का कोई मापदंड होता है क्या?
प्रेम, प्यार, मोहब्ब्त.... ये शब्द जिंदगी की पटरी पर जरूर टकराते हैं, कोई इन्हें जिंदगी में रचा-बसा लेते हैं, तो किसी को ये अधूरे आखर जिंदगी भर अखरते रहते हैं। जरा सोचिए.... प्यार करने से पहले अगर आपने कोई मापदंड बना रखे है तो फिर क्या होगा? प्यार-प्यार की तरह अधूरा रहेगा, शायद इसीलिए दिललगी के इन शब्दों को एक अधूरा अक्षर मिला। हर किसी की रूचि अलग होती है, हर किसी की सोच अलग होती है, रूकिये और उस पल को याद कीजिए जब आपने किसी से प्यार किया, क्या सोचा था आप ने उस वक्त? आपने अपने प्यार का न रूप देखा और न सौदर्य। बस दिवाना हो चले। लेकिन अब आपने मापदंड की कमेटी बना दी। और हर चीज के तोलने बैठ गये। नाक-नक्श से लेकर कद-काठी वगैरह-वगैरह। चलिए छोडिए... लेकिन आपको बता दें कि प्यार के इस मापदंड से आपने दिल से इंसान को समझने का मौका खो दिया। क्योकि अब आपके जेहन में प्रेम की जगह शर्तों ने डेरा जमा दिया। फिर क्या दो दिलों को एक करने वाले ये आखर भी कभी पूरे नहीं हो पाये। सदियां गुजर गई और ये आखर आज भी पूरे होने का सपना पाले हुए है। वो सपना जो दो दिवाने अक्सर पाला करते हैं। शर्तो के आगे ये भी वेबस और लाचार हैं,
प्रदीप थलवाल।
खूबसूरती का खगोलशास्त्र।
मनुष्य कुदरत का वो करिश्मा है, जो दुनियां को खूबसूरत बना दे, मूर्त रूप में भी खूबसूरती भर दे। जिसका अहसास यदाकदा आप भी महसूस करते हैं, और अपने आप में आहं भी भरते हैं। खूबसूरती का ये अहसास होने के पश्चात हर वो वस्तु आपको संुदर लगती है, फिर चाहे वो इंसानी चेहरे क्यों न हो। आपके मन में शंका भी हिलारे ले सकती है, और कह सकते है कि संुदर लगना और होना अलग बात है। फिर आप नवजात सुकुमार की छवि को मन में अंकित कर सकते हैं... क्योंकि नवजात शिशु को हर कोई पसंद करता है और यही नजरिया आपको खूबसूरती का अहसास कराती है, क्योकि प्रेम की दृष्टि में हर चीज सुंदर है। यही प्यार उन सवालों का जवाब है जिसे समाज, इतिहास और विज्ञान भी नहीं सुलझा पाये। फर्क सिर्फ इतना है कि आप कैसे देखते है। आपके चाहने वाले किस नजारिये से आपको देखते हैं, आप किसी को अच्छे लगते हो, कोई है जो आपकी कद्र करता है, जो आपको आपके अच्छेपन का या कहें कि खूबसूरती का मीठा अनुभव कराता है। जिसकी आंखों में हर उदास पल में भी आपका चेहरा तैरता रहता है। उस वक्त उसके मन में बिजली की गति से भी तेज कल्पनाएं दौड़ती फिरती है, लेकिन आप हो कि इस प्रेम का अहसास रत्ति भर भी नहीं कर पाती, बस उसे तो इतना ही पता है कि तुम बहुत खूबसूरत हो... और दिल की न सुनाई देने वाली आवाज से दुनियां को आवाज देता है कि तुम बहुत खूबसूरत हो....! प्रदीप थलवाल।
Wednesday, June 29, 2011
मौत की यात्रा
चार धाम यात्रा । इस यात्रा के लिए सरकार ने कई दिनो पहले से तैयारियॉ कि हुई थी । ऐसा सरकार का कहना है । चार धाम विकास परिषद भी इस पूरी यात्रा को अपनी और सरकार की बड़ी उपल्बधी के रुुप में भुनाने के लिए बढ चढ कर आह्वाहन कर रहा था । सभी तैयारियॉ काफी पहले पूरी कर ली गई है ऐसी बातें मीड़िया को बताई गई । कहा गया कि हर तरह कि सुविधा इस यात्रा के दौरान बाहर से आने वाले यात्रियों को दी जाऐगी । लेकिन यात्रा का सबसे जरुरी हिस्सा यानि कि यात्री इस यात्रा में सुरक्षित नही है । इस यात्रा बाहर से आए हमारे 33 मेहमान अभी तक अपनी जान गवॉ चुके है । ये ऑकड़ा यात्रा रुट में पड़ने वाले 4 जिलो का है । टिहरी ,देहरादून,चमौली और उŸारकाशी । इन चारो जिलो से गुजरते हुए महज एक महीने में हमारे बाहर से आए 32 मेंहमानों की मौत हो चुकी है । एक महीना और 33 मौतें । अब इन ऑकड़ो पर नजर पर गौर फरमाऐं ।टिहरी जिलें में हार्ट अटैक से एक यात्री को जान गॅवानी पड़ी वही सड़क दुर्घटना में इस जिलें में 6 मौत हुई और नदी में ड़ुबने से एक मौत । पिछले एक महीनें में टिहरी में 8 यात्रियों की मौत हो चुकी है ।
अब बात देहरादून की, राजधानी में मई से लेकर अब तक 8 यात्री रोड़ एक्सीड़ेट में मारे जा चुके है ।
चमौली जिलें में हार्ट अटैक से 2 यात्रियों की मौत हो चुकी वही एक मेहमान नदी में ड़ूब कर मर गया ।
उŸारकाशी में हार्ट अटैक से अभी तक 11 मौते हो चुकी है वही एक यात्री रोड़ एक्सीड़्ेट और एक नदी में ड़ूबने से मर गया ।
ये ऑकड़े यात्रा प्रशासन के है। लेकिन अगर 108 आपातकालीन सेवा की बात मानी जाए तो पिछले एक महीने में चारधाम यात्रा मार्गों पर 27 लोगों की हार्ट अटैक से मौत हो चुकी है ।
पिछले एक महीनें में 33 यात्रियों के लिए ये चार धाम यात्रा अंतिम यात्रा साबित हो चुकी है । ऐसे में सवाल ये उठता है कि त्वरित राहत देने की बात करने वाली सरकार के हवाई महल ढेर क्यों हो गए । इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि प्रशासन और सरकार ने सिर्फ दावों के हवाई फायर किए । धरातल पर देखने की जंहमत सरकार ने उठाई ही नही । दरअसल जब एक व्यक्ति को हार्टअटैक पड़ता है उस दौरान उसे विशेष उपचार की जरुरत पड़ती है ।
ड़ॉक्टर भी ये मानते है अगर किसी यात्री को हार्ट अटैक पड़ जाए तो स्पेशलिस्ट ड़ॉक्टर का होना बेहद जरुरी है । लेकिन गौर करने वाली बात ये है चार धाम यात्रा के रुट पर पड़ने वाले चार जिलों में से सिर्फ उŸाकाशी के जिला अस्पताल में ही कारड़ियोलोजिस्ट है जो हार्ट अटैक के मरीजों की देख रेख कर सकता है । उॅचाई बढने के साथ साथ हार्टअटैक के मरीजों के लिए अटैक का खतरा बढता जाता है । ऐसें में सवाल ये भी है कि 108 सेवा में ऐसे ड़ॉक्टर मौजूद है या नही जिन्हे ऐसे हालातो में किए जाने वाले उपचार में महारत हासिल हो । क्या पहाड़ो के अस्पतालों में वो सुविधाऐं है जो हार्ट अटैक से जूझ रहे मरीजो को चाहिए होती है । सवाल बेहद गंभीर है और खुद स्वास्थय सचिव भी ये मानते है कि इन अस्पतालों में स्पेशलिस्ट ड़ॉक्टरों की बेहद कमी है ।
लेकिन सरकार और उसके नुमाईंदे इस पर भी कुछ करने के बजाए वो तर्क ढूंढ रहें है जिनसे उनकी गलतियो को ढका जा सके है । शासन और उसके मुलाजिम चाहे बातों के आवरण के पीछे सच्चाई छुपाने के लाख कोशिशें कर ले लेकिन ऑकड़े के शौर मचा रहें है कि कही ना कही कुछ गड़बड़ है । नीती और नियमों में भारी बदलाव की जरुरत है और जरुरत इस बात की भी है गला फाड़ कर झूठ को सच में बदला नही जा सकता ।
कांग्रेस बनाम रामदेव

योग से उद्योग खड़ा करने वाले बाबा रामदेव और भारतीय राजनीति की धूरी रही कांग्रेस में ठनी हुई है। इस लड़ाई की पटकथा खुद रामदेव ने लिखी, और कांग्रेस उसे अमलीजामा पहना रही है, केंद्र में कांग्रेस सरकार को हिलाने पहुंचे बाबा रामदेव को कांग्रेस ने सबक सिखाया, तो प्रदेश में कांग्रेस बाबा के कम समय में फैलाये सम्राज्य पर सवाल कर, रामदेव की मुश्किलें खड़ी कर रही है। लेकिन जिन आरोपों के दम पर कांग्रेस बाबा रामदेव को लपेटना चाहती है, उसके छींटे खुद कांग्रेस पर भी पड़ते नजर आ रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत ने बाबा रामदेव पर कई सवाल उठाये।सवाल नंबर एक- बाबा रामदेव ने हरिद्वार में ग्राम समाज की जमीनें हड़पी और स्टंप ड्यूटी चोरी की।
सवाल नंबर दो- बाबा रामदेव और उनके सहयोगी बालकृष्ण ने गलत तरीके से आग्नेय अस्त्रों के लाइसेंस लिए।
सवाल नंबर तीन- रामदेव के प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों में पैसा कहां से आया।
सवाल नंबर चार- रामदेव के गुरू कैसे गायब हुए, पतंजलि की उपमंत्री साध्वी कमला कैसे लापता हुई, राजीव दीक्षित की अचानक मौत।
कांग्रेस इन सभी मुद्दों पर केंद्र सरकार से सीबीआई जांच की मांग कर रही है, लेकिन इन सभी सवालों के पीछे खुद कांग्रेस भी कटघरे में खड़ी नजर आती है, सबसे पहले सवाल उठता है कि कांग्रेस को बाबा रामदेव के घोटालों की याद अब क्यों आ रही है, इससे पहले कांग्रेस ने क्यों सीबीआई जांच करने की जहमत क्यों नहीं उठायी। कांग्रेस की केंद्र में सरकार होने के बाद भी उसके विभागों ने रामदेव की कंपनियों पर निगरानी क्यों नहीं रखी, जिस जमीन को हड़पने का कांग्रेस आरोप लगा रही है, प्रदेश में कंाग्रेस की भी सरकार रही उस समय कांग्रेस ने सुध क्यों नहीं ली। कांग्रेस के ही शासनकाल में बाबा रामदेव की दवाईयों में मानवअंग न होने की पुष्टि हुई थी और कांग्रेस ने बाबा को क्लीन चिट दी। ऐसे में सवाल कांग्रेस की नीयत पर भी उठने लाजमी है। लेकिन जिस दमखम के साथ कांग्रेस सीबीआई जांच की ताल ठोक रही है उसका नतीजा भविष्य में क्या आता है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।
Wednesday, April 27, 2011
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