Monday, October 22, 2012

टिहरी संसदीय सीट पर खिला कमल



महारानी माला राज्य लक्ष्मी को टिहरी की बागडोर


टिहरी लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव का नतीजा सामने आ चुका है। जनादेश सत्तासीन कांग्रेस के बजाय भाजपा के पक्ष में रहा। आगामी लोकसभा चुनाव के सेमीफाइनल के तौर पर देखे जा रहे इस उपचुनाव में भाजपा ने बाजी मारी। पिछले कई चुनावों में हार का सामना कर रही भाजपा को टिहरी की जीत ने संजीवनी का काम किया। भाजपा प्रत्याशी महारानी माला राज्य लक्ष्मी की जीत ने पार्टी कार्यकर्ताओं से लेकर नेताओं को जोश से लबरेज कर दिया । वहीं दूसरी ओर टिहरी संसदीय सीट पर मिली हार से कांग्रेस आहत हो गई। कांग्रेस के लिहाज से देखा जाए तो यह हार उसके लिए ऐतिहासिक हार बन गयी है। हार के कारणों की खोज में जुटी कांग्रेस मंथन करने को मजबूर है। हालांकि मझौले दर्जे के नेता बयानबाजी से भी बाज नहीं आ रहे हैं।
खैर भाजपा की परंपरागत सीट रही टिहरी में कांग्रेस हैट्रिक लागने के मूड में थी। यही कारण था कि कांग्रेस ने इस सीट पर अपने कई खांटी नेताओं को तरजीह ना देकर मुख्यमंत्री बहुगुणा के पुत्र को महत्व दिया। कांग्रेस टिहरी सीट को हर हाल में जीतना चाहती थी, ऐसे में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को भरोसे में लेकर साकेत की जीत की गारंटी ली थी। इसके लिए सीएम बहुगुणा ने अपने स्तर से हर कोशिश की, यहां तक कि उन्होने चुनाव की कमान खुद संभाल कर पार्टी नेताओं को जीत के प्रति आश्वस्त भी किया। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने पहाड़ से लेकर मैदानी इलाकों में खुद कांग्रेस के लिए वोट मांगे।
टिहरी संसदीय सीट में कांग्रेसियों के तूफानी हवाई दौरे, बूथ लेवल तक के चुनावी प्रबंधन से कांग्रेस की जीत पक्की मानी जा रही थी। जबकि इसके उलट भाजपा प्रत्याशी महारानी माला राज्य लक्ष्मी ने सादगी से मैदानी क्षेत्रों में खुद प्रचार अभियान की बागडोर थामी थी। महारानी ने खुद जनता के बीच जाकर लोगों से वोट की अपील की। महारानी ने राजशाही वैभव को दूर रख अपने सौम्य स्वभाव से मतदाताओं का दिल जीता। उनकी सीधी साधी छवि को लेकर कांग्रेस ने चुनावी सभाओं में कई टिप्पणियां की लेकिन महारानी ने कांग्रेस की उन टिप्पणियों पर कभी भी पलटवार नहीं किया। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि उनकी इसी गंभीरता ने उन्हें जनता के बीच मजबूत किया और उनकी जीत प्रशस्त की। हालाकि यह भी माना जा रहा है धरेलू गैस सिलैंडर  से सब्सिडि वापस लेने का फैसला और  बेहिसाब बढ़ती महंगाई के जिस चाबुक से आम जनता की खाल उधड़ रही है उसी मंहगाई के चाबुक ने कांग्रेस को टिहरी सीट से भी बेदखल किया है।  ये बात दूसरी है कि  चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस ने मंहगाई और भ्रष्टाचार को कोई मुद्दा नहीं माना और विकास के नाम पर वोट मांगे।  बावजूद इसके मतदान करने वाली जनता ने कांग्रेस को नकार दिया।

किसेे कहां क्या मिला...
महारानी ने कांग्रेस के प्रत्याशी और मुख्यमंत्री विजय बहुगुण के बेटे साकेत बहुगुणा को 22,694 मतों से पटखनी दी। जबकि तीसरे और चौथे नंबर पर क्रमशाः उत्तराखंड रक्षा मोर्चा और उत्तराखंड क्रांति दल-पी रहे। इन दोनों क्षेत्रीय दल समेत अन्य दस प्रत्याशियों की जमानत तक भी नहीं बची। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बनी टिहरी संसदीय सीट पर देहरादून के मतदाताओं ने भाजपा के पक्ष में मतदान कर बाजी पलट दी। इस उपचुनाव में तकरीबन 5,10,951 मतदाताओं ने वोट दिया। कुल मतदाताओं के सापेक्ष 43 फीसदी वोटिंग होने से कोई भी पार्टी जीत के प्रति आश्वस्त नहीं थी, लेकिन आखिरकार नतीजा भाजपा के पक्ष में रहा।
टिहरी, देहरादून और उत्तरकाशी में हुई मतगणना में पहले पहल कांग्रेस आगे नजर आ रही थी, चकराता विधानसभा सीट से लगभग दस हजार वोट की बढ़त से कांग्रेस की उम्मीद परवान चढ़ गई थी। लेकिन विकासनगर, सहसपुर, कैंट, राजपुर, रायपुर और मसूरी विधानसभा सीटों पर भाजपा के पक्ष में हुए मतदान ने बाजी पलट दी। इन सभी विधानसभा में भाजपा ने लगभग 35,210 की बढ़त बनाई। उधर उत्तरकाशी की पुरोला और गंगोत्री सीट में कांग्रेस भाजपा से आगे रही, जबकि यमुनोत्री सीट पर मतदाताओं ने भाजपा पर भरोसा जताया। टिहरी जिले की प्रतापनगर,और धनोल्टी विधानसभा क्षेत्र पर कांग्रेस आगे रही,। जबकि घनसाली और टिहरी विधानसभा सीट पर भाजपा का जादू चला। उपचुनाव में कांग्रेस के मुकाबले इक्कीस साबित हुई भाजपा की प्रत्याशी महारानी माला राज्य लक्ष्मी को 2,45,835 वोट मिले जबकि कांग्रेस के प्रत्याशी साकेत बहुगुणा को 2,23,141 वोट पड़े। दोनों के बीच जीत का अंदर 22,694 रहा। वहीं क्षेत्रीय दलों का हाल बहुत ही दयनीय रहा। अपने आपको प्रदेश की हितैषी बताने वाली उत्तराखंड क्रांति दल-पी इस उपचुनाव में चौथे नंबर पर रही उसे 6,939 मत मिले, जबकि तीसरे नंबर रहे उत्तराखंड रक्षा मोर्चा 7,466 मत बटोरने में कामयाब रहा।


प्रत्याशियों के बोल---

महारानी माला राज्य लक्ष्मी, नवनिर्वाचित सांसद, टिहरी

यह जीत टिहरी संसदीय क्षेत्र की जनता का आर्शीवाद है, हमारे परिवार ने अच्छे काम किये होंगे इसीलिए उन्होने मुझ पर भरोसा जताया। मैं उनका आभार करती हूं। महंगाई और भ्रष्टाचार सभी मुद्दे कांग्रेस के खिलाफ गये। मैं संसद में महंगाई का मद्दा उठाऊंगी। कांग्रेस के नेताओं द्वारा की गई टिप्पणी पर मैं कुछ नहीं कहूंगी। जनता समझदार है, वो सब जानती है।

साकेत बहुगुणा, प्रत्याशी कांग्रेस

जनता का आदेश सर्वोपरी, मतदाताओं से किये सभी वायदे पूरा करूंगा, दून के मतदाताओं की नाराजगी दूर करूंगा। हर हार में जीत छिपी होती है, जनता के बीच जाकर उनका काम करता रहूंगा। मेरा विश्वास है कि 2014 में हम बेहतर प्रदर्शन करेंगे।

त्रिवेंद्र सिंह पंवार, प्रत्याशी, यूकेडी-पी
कांग्रेस के खिलाफ जनता में आक्रोश था, लिहाजा जनता ने उसे ही वोट दिया जो जीतने की स्थिति में था, मंत्री प्रीतम सिंह पंवार भी साथ नहीं आये, ऐसे में यूकेडी की हालत ज्यादा खराब हो गई। हार पर मंथन किया जायेगा।

कुंवर जपेंद्र, प्रत्याशी, उत्तराख्ंाड रक्षा मोर्चा

कांग्रेस की हार में उत्तराखंड रक्षा मोर्चा अहम रही, क्योंकि हमने जो मुद्दे उठाये उससे मैदानी इलाकों में कांग्रेस के खिलाफ मतदान हुआ। मूल निवास और अन्य मुद्दों पर हमने कांग्रेस को घेरा, जिसकी वहज से भाजपा जीतने में कामयाब रही।

क्या बोले नेता

टिहरी की जनता ने केंद्र सरकार की नीतियों और राज्य सरकार के छह महीने के कार्यकाल को खारिज किया है। महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता की मुहर लग चुकी है। चुनावी नतीजों ने सरकार के अहंकार को खत्म किया है। ---- बी.सी. खंडूड़ी, पूर्व मुख्यमंत्री

जनता के गुस्से का फायदा भाजपा को मिला। जनता महंगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त है। कांग्रेस में आपसी फूट का नतीजा भी इस चुनाव में देखने को मिला।---- भगत सिंह कोश्यारी, राज्य सभा संासद

प्रदेश में अराजकता का महौल है, भाजपा की तमाम कल्याणकारी योजनाओं में रूकावट पैदा की गई है। केंद्र और राज्य सरकार ने आम जनता के हकों को मारा है।.... डा. रमेश पोखरियाल निशंक

टिहरी और उत्तरकाशी जिले में कांग्रेस को बढ़त ने बता दिया है कि विकास के नाम पर पहाड़ के मतदाताओं ने कांग्रेस की सरकार पर भरोसा जताया है। आपदा पीड़ितों ने भी कांग्रेस के पक्ष में मतदान कर सरकार के कामों पर मुहर लगाई।...... विजय बहुगुणा, मुख्यमंत्री

पार्टी जिसे प्रत्याशी घोषित करती है उसे जितना सभी की सामुहिक जिम्मेदारी होती है। अब बहानेबाजी से कोई काम नहीं चलेगा। टिहरी की हार से सबक लिया जायेगा और कांरणों को खंगाला जायेगा, ताकि भविष्य में पार्टी मजबूत होकर उभरे।..... यशपाल आर्य, प्रदेश अध्यक्ष, कांग्रेस।

पहाड़ में कांग्रेस की जीत हुई है। देहरादून के कुछ क्षेत्रों में रसोई गैस भारी पड़ा, विकासनगर, रायपुर, राजपुर में हार की समीक्षा की जायेगी। .... सुबोध उनियाल, विधायक नरेंद्र नगर।




Saturday, October 6, 2012

असमय बसंत का आना!


               
लगता है उत्तराखंड में बसंत ने आहट दे दी। तभी तो भ्रमरों का मद्म गुंजन सुनाई दे रहा है। भ्रमर ध्वनी टेलीवीजन रूपी फूलों के स्क्रीन से सुनाई पड़ रही हैं। कुछ भौंरे विरोधी गुंजन कर रहे हैं, लेकिन फिर भी उत्तरांखड में मौल्यार आता दिख रहा है। देखिए न यह मौल्यार ऐसे वक्त आ रहा है जब टिहरी संसदीय सीट पर उपचुनाव का फल पक रहा है। अक्सर राजनीति के धरातल पर बसंत ऐसे ही मौकों पर आता है। क्योंकि ऐसे टाईम पर बसंती भौंरों का गुंजन कम होने के बाद भी ऊंचा सुनाई पड़ता है। वो इसलिए कि प्रकृति का नियम ही कुछ ऐसा है, क्योंकि प्रकृति नहीं चाहती है कि भौंरों और फूलों में कोई बैर रहे। अपने जंगली प्रदेश के राजनीतिक धरातल पर बसंत के आने की प्रबल इच्छा है, इस बसंती बयार से कंटीली हो चुकी राजनीति फिर हरी-भरी होने के संकेत हैं। भगवाधारियों की आपसी जंग और धर्मनिरपेक्षियों की सुल्ताल बनने के टक्राहट से सियासी सल्तनत को कई गहरे जख्म दिये हैं, जिसका दर्द बसंती भौंरे केा अभास होता है। तभी तो हेमंत ऋतु में बसंत आने की चर्चा हो रही है। बसंत के अचानक और ऐसे समय आने के संकेत सियासी सामंतों को महज मजाक लग रहा है। लेकिन उनके माथे से लेकर पीठ पर पसीने की बंूदे हैं, उन्हें अंदर ही अंदर ये बात भी उन्हें खाये जा रही है कि कहीं प्रकृति रूठ गई और ऐसा सच हुआ तो फिर क्या होगा? लिहाजा बसंत को आने से रोके जाने के लिए राजनीतिक रसायन की विधा अपनानी होगी। ताकि बसंत आये नहीं बल्कि शांति से ‘संत’ ही रहे। जैसा अभी तक चल रहा है। राजनीति की स्वीकृत बगिया देहरादून में इन दिनों राजभौंरों की संख्या ना के बराबर है, ये इन दिनों टिहरी वाटिका में विचरण कर रहे हैं। क्योंकि इस वाटिका में अपना कब्जा जो जमाना है, यहां की हर डाल, शाख पर अपना वर्चास्व कायम जो रखना है। इस वाटिका पर किस झुंड का कब्जा होगा ये तो तेरह को पता चल जायेगा। लेकिन देहरादून से जो बसंती गुंजन जो सुनाई पड़ रहा है उससे एक वर्ग के भौंरों का चिंतित होना लाजमी है। इससे एक वर्ग की वर्चास्व की लड़ाई पर मानसिक तौर पर फर्क भी पड़ा है।
इस प्रकृति से वास्ता रखने और इस क्षेत्र में विशेषज्ञता रखने वालों का कहना है कि बसंत आने की खबर प्रदेश के अयन मंडल से होते हुए अचानक लोगों के घरों में दाखिल हुई, चुपचाप आई इस खबर की वास्तविकता का जब लोगों ने पता कि ये बात सौ आने सच निकली। हालांकि बसंत बयार आने की सुगबुगाहट पहले भी सुनाई देती रही लेकिन ये हल्की और परले दर्जे की थी। लेकिन अभी जो खबर अयनमंडल से लेकर अखबारी दुनियां में तैर रही है उसमें दम है। इस खबर में कई तरह के आरोप लगाये जा रहे हैं। इसमें जहर की बात भी सुनने को मिल रही है। आरोप लग रहे हैं कि इस जंगली प्रदेश का लोग भला नहीं चाहते हैं यही वहज है कि बसंत के पैरोकार को ठिकाने लगाये जाने की सुनियोजित योजना थी। लेकिन बसंत राज को जब इसकी भनक लगी तो तय हुआ कि अपना समय न होने के बाद भी बसंत लौट आयेगा। वाया एफआरआई के जंगलों से लौट आयेगा। नए भम्ररों का झुंड होगा पुराने भी भौंड से भौंड (स्वर से स्वर) मिलायेंगे और बसंती गीत गाकर फिर से जख्मी जंगली प्रदेश की जमीन पर मरहम लगायेंगे। खबर है कि इसके लिए दिल्ली एम्स के लिए पत्र व्यवहार हो रहा है, एम्स के वरिष्ठ शैल्य चिकित्सक की मुहर लगती है कि नहीं ये कहना मुश्किल है। लेकिन बसंत राज के जन्म दिन पर बड़ी बात जरूर निकल कर आयेगी। और बताया जायेगा कि क्यों असमय बसंत का आना तय हुआ। खैर हिमवंत कवि चंद्र कुंवर बर्त्वाल के शब्दों में .... अब छाया में गुंजन होगा, वन में फूल खिलंेगे।


Thursday, October 4, 2012

इस चारागाह के चरवाहे



प्रदीप थलवाल

आजकल उत्तराखंड में अजीब किस्म की हलचल दिख रही है। आसमान से लेकर सड़क पर भागदौड़ बढ़ी हुई है। इस भाग-दौड़ का मुख्य बिंदु टिहरी बताया जा रहा है। जहां से चुनावी भूकंप के झटके उठ रहे हैं, और यही टिहरी किसी चारागाह से कम नजर नहीं आ रहा है। जिस प्रकार गोरू-भैंस और बकरियांे का चारागाह होता है, उसी प्रकार टिहरी और ये पहाड़ी मुल्क भी राजनेताओं का चारागाह साबित हो रहा है। जिस प्रकार समाज के हर वर्ग में श्रेणी पायी जाती है उसी प्रकार की श्रेणी राजनीतिक चारागाह में भी होती है। सबसे निचले स्तर पर कार्यकर्ता टाइप के चरवाहे होते हैं, फिर ब्लॉक, जिला स्तर के होते हैं, राज्य स्तर पर आते-आते हैं इनकी श्रेणी इतनी उच्च हो जाती है कि चरवाही के मायने ही बदल जाते हैं। क्योंकि ये चरवाहे वीआईपी श्रेणी में आते हैं और ये चरवाहे अपने आप को कुलीन समझने लगते हैं।

उत्तराखंड भी राजनीति के लिहाज से खासी उर्वरक और उपजाऊ है। यही वजह है कि यहां देश के कोने कोने और भांति-भांति किस्म के नेता अपनी नेतागिरी चमकाने आते हैं। उत्तराखंड का पिछले बारह साल का इतिहास टटोले तो प्रदेश में कई पैराशूट नेता ने यहां ना सिर्फ लैंडिंग की बल्कि यहां पर राजनीति का ककहरा सीखने के बाद राष्ट्रीय राजनीति में भी चमके। कुछ नेता ऐसे भी थे जो उत्तराखंड को कतई भी पसंद नहीं करते थे लेकिन आखिरकार झक मार के यहां आये और खूब लूट-खसोट की। लेकिन इलाकाई नेता इस उपजाऊ जमीन पर ढंग से नहीं पनप पाये। हालांकि किसी तारे की तरह कुछ समय के लिए राजनीति के अयन मंडल में ये नेता जरूर टिमटिमाये, लेकिन इनकी टिमटिमाहट अब नहीं उतनी नहीं है। इसका कारण शायद इन इलाकाई राजनेताओं को राजनीतिक करने का शऊर नहीं था।

तमाम वजहों के चलते बाहरी चरवाहे उत्तराखंड जैसे नए-नवेले चारागाह में आये और जमकर सेंधमारी की, जिसका फायदा बाहरी लोगों को खूब मिला। विभिन्न संगठनों, दलों और ना जाने किन-किन जगाहों से आये ये लोग यहां के मठाधीश तक बन बैठे। यही वजह है कि प्रदेश में होने वाले हर चुनाव में इनको देखा जा सकता है। इतना ही नहीं इन लोगों की संख्या में कमी की बजाय हर चुनाव में तेजी देखने को मिल रही है। जिससे प्रदेश का मूल नेता हाशिये पर सरकता जा रहा है। हाल ही का उदाहरण देखिए, टिहरी में लोकसभा उपचुनाव होने जा रहा है। इस संसदीय सीट पर दोबारा इतिहास दोहराया गया। तमाम दलों ने स्थानीय लोगों को अपना प्रतिनिधि चुनने के बजाय बाहरी लोगों को तरजीह दी। कांग्रेस, भाजपा से लेकर उत्तराखंड रक्षा मोर्चा ने बाहरी लोगों को चुनाव में उतारा, हां एक मात्र यूकेडी पी ने स्थानीय निवासी पर जरूर दांव खेला है।

कांग्रेस ने जहां साकेत बहुगुणा पर दांव खेला, वहीं भाजपा ने टिहरी राजपरिवार की महारानी राजलक्ष्मी शाह पर भरोसा जताया है, उत्तराखंड रक्षा मोर्चा ने कुंवर जपेंद्र सिंह को चुनावी मैदान में उतारा है। गौर से अगर आंकलन किया जाये तो इन तीन राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवार किस लिहाज से यहां के मूल निवासी है। हालांकि भाजपा उम्मीदवार राजघराने की बहु होने के नाते मूल निवासी के दायरे में फिट बैठ सकती है लेकिन वो भी विदेशी मूल की है। लेकिन कांग्रेस और उरमा के प्रत्याशी यहां के मूल निवासी नहीं है।

ऐसे में राजनीति के इस चारागाह में बाहरी और नये-नवेले चरवाहे पर लोग-बाग भी टिप्पणी कर रहे हैं। लोगों का यहां तक कहना है कि यहां के लोगों ने जिस प्रदेश का सपना देखा था वो महज सपना रह गया है, और ये प्रदेश सिर्फ राजनेताओं के लिए किसी चारागाह बनकर रह गया है। इतना ही नहीं लोगों का कहना है कि इस प्रदेश का दुर्भाग्य देखिए कि बाहरी लोग ना जाने कैसी-कैसी पार्टियों के यहां आकर अपनी पैठ बनाते हैं। इन दिनों प्रदेश में भारतीय बल्द पार्टी के नेता की आने की बात भी कह रहे हैं, जो कांग्रेस के हाथ के सहारे अपनी नैया पार लगाने जुगत में है।

लेकिन सवाल ये है कि इस चारगाह के चरवाहे क्या बहारी होंगे, या फिर कभी यहां के लोगे भी इतने मजबूत होंगे कि वो खुद ही चरवाह की भूमिका निभा सके। खैर महान जर्मन कवि ने कभी लिखा था कि ...और चरवाहे से नाराज भेड़ों ने कसाई को मौका दे दिया, उन्होने जनवाद के खिलाफ मत दिया क्योंकि वह जानवादी थे।

Monday, September 24, 2012

मूल निवास पर सरकार का सरेंडर

               
मूल निवास और जाति प्रमाण पत्र का जिन्न एक बार फिर बोतल से निकल आया है। मूल निवास और जाति प्रमाण पत्र को लेकर राज्य गठन के बाद से जंग छिड़ी हुई है। लेकिन प्रदेश की किसी सरकार ने इसका समाधान निकालने की नहीं समझी। राज्य की सभी सरकारों ने इस मामले को टरकाने में ही अपनी भलाई समझी। मौजूदा कांग्रेस सरकार से प्रदेश की जनता को खासी आशाएं थी कि प्रदेश का मुखिया खुद कानून का जानकार है तो ये सरकार मूल निवाास और जाति प्रमाण पत्र को लेकर सकारात्मक भूमिका निभायेगी और सूबे के हकों का ख्याल रखेगी। लेकिन सूबे के मुखिया विजय बहुगुणा के बयान ने लाखों लोगों की उम्मीद को एक झटके में ही खत्म कर दिया। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने स्पष्ट लहजे में कह दिया है कि उनकी सरकार मूल निवास और जाति प्रमाण पत्र मामले में हाईकोर्ट के आदेशें का पालन करेगी। मुख्यमंत्री के इस बयान से जहां इस पर्वतीय प्रदेश के मूल निवासियों का गहरा झटका लगा वहीं विपक्षी दल इसे मुख्यमंत्री की कमजोर मानसिकता और प्रदेश के प्रति मुख्यमंत्री की सोच को इंगित करता है। मुख्यमंत्री ने अपने बयान में ये भी कहा कि वो मूलनिवास और जाति प्रमाण पत्र के संदर्भ में दिये हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने सुप्रीम कोर्ट भी नहीं जायेंगे। सीएम के बयान से साफ होता है कि वो नहीं चाहते हैं कि प्रदेश के मूल निवासियों को उनका वाजिब हक मिले। मुख्यमंत्री के इस बयान से उसकी सहयोगी और अपने आपको उत्तराखंड के हितों की हितैषी बताने वाली यूकेडी-पी भी गुस्से में है। क्योंकि यूकेडी पी पहले से ही मूल निवास और जाति प्रमाण पत्र पर अपना रूख स्पष्ट कर चुकी है, यूकेडी चाहती है कि मूल निवास की कट ऑफ डेट राज्य गठन के दिन से ना हो बल्कि इससे पूर्व यानि कि 1950 हो। इस मामले को लेकर यूकेडी ने पहले ही अदालत की डबल बेंच में अर्जी दाखिल की हुई है। 
ये सारा प्रकरण उस वक्त हो रहा है जब प्रदेश में टिहरी उपचुनाव होने जा रहे हैं। मूल निवास और जाति प्रमाण पत्र को लेकर दिये मुख्यमंत्री का बयान दस अक्टूबर केा होने वाले मतदान पर क्या असर डालेगा ये 13 अक्टूबर को ही मालूम होगा। लेकिन दूसरी ओर यूकेडी पी ही इस मुद्दे पर गरम नजर आ रही है। यूकेडी पी सरकार में सहयोगी होने के बावजूद भी सरकार पर हमला कर रही है जिससे साफ होता है कि यूकेडी का राजनीतिक एजेंडा प्रदेश के हित में है। जबकि दूसरी ओर भाजपा इस मुद्दे को ज्यादा तूल देती नहीं दिखाई दे रही है। यानि कि भाजपा भी नहीं चाहती है कि वो भी इस पचड़े में पड़े, और अपने हाथ जला बैठे। उधर एक और क्षेत्रीय पार्टी उत्तराखंड रक्षा मोर्चा भी मूल निवास और जति प्रमाण पत्र पर हाईकोर्ट की दलीलों का अध्ययन कर लागू करने की बात कर रहा है। ऐसा नहीं है कि किसी भी दल का सदस्य नहीं चाहता है कि प्रदेश में मूल निवास की कट ऑफ डेट 1950 हो लेकिन वोट बैंक के चलते यूकेडी पी के अलावा कोई राजनीतिक दल इस फैसले को मजबूती के साथ नहीं उठा रहा है। 
उधर टिहरी लोकसभा उपचुनाव के मद्देनजर यूकेडी के पास मूल निवास और जाति प्रमाण पत्र का मुद्दा सबसे हाट है, अगर यूकेडी चाहे तो वो इस मुद्दे को उछाल कर जनता के सामने अपने आप को मजबूत कर सकती है, और लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस और भाजपा को टक्कर दे सकती है, लेकिन यूकेडी के शीर्ष नेता सरकार पर सीधा हमला करने के मूड में नहीं है। सरकार ने भी मूल निवास और जाति प्रमाण पत्र को लेकर सरेंडर कर दिया है। राज्य सरकार नहीं चाहती है कि वो इस मुद्दे केा सुप्रीम केार्ट में ले जाये। यानि कि मूल निवासियों को इसके लिए खुद ही पहल करनी होगी। 

Friday, September 21, 2012

प्रतापनगर की पीड़ा



टिहरी जिला मुख्यालय के ठीक सामने नजर आने वाला पहाड़, प्रतापनगर है, दरअसल प्रतापनगर को पहाड़ इसलिए कहा गया है कि हर कोई इसे महज एक पहाड़ी टीला समझ कर धोखे में रहता है, ठीक उसी तरह जैसे कि यहां के हजारों लोग धोखे और छलावे की जिंदगी जीने को मजबूर है। कभी टिहरी महाराजा की ग्रीष्मकालीन राजधानी रही प्रतापनगर आज विकास के लिए तड़प और छटपटा रहा है। विकास की दुहाई देने वालों ने अपनी मोटी कमाई के लिए टिहरी बांध की ऐसी पटकथा लिखी कि प्रतापनगर को अलग-थलग कर काले पानी की सजा मुकर्रर कर दी। प्रतापनगर के लोगों ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उनके साथ उसी संघीय राष्ट्र के लोग धोखा करेंगे, जिन्होने सन उन्नीस सौ अड्तालीस में एक राष्ट्र का नारा देकर टिहरी का विलय भारत में कराया। तब शायद ना टिहरी के महाराजा ने सोचा था और ना प्रतापनगर की जनता ने की 21वीं सदी उनके लिए किसी सजा से कम ना होगी। विकास के नाम पर टिहरी में जनमी और पली बढ़ी एक सभ्यता भले ही पानी के ताबूत में दफन हो गयी हो लेकिन प्रतापनगर की तीन लाख की आबादी वाली जनता दर-दर ठोकर खाने को मजबूर है। एक दशक पहले जब एतिहासिक टिहरी शहर तिल-तिल कर डूब रहा था, तो दूसरी ओर प्रतापनगर भी तड़प रहा था, झील का पानी का स्तर बढ़ता गया तो प्रतापनगर के सारे बाटे-घाटे एक-एक कर पानी में समा रहे थे, ये वो बाटे-घाटे थे जो प्रतापनगर के लिए किसी रूधिर वाहिका से कम नहीं थे। झील की गर्त में हमेशा के लिए समा रहे सड़कों और रास्तों को देख कर प्रतापनगर मानों मूर्छित पड़ा हो, और ये मूर्छा कब टूटेगी कोई कह नहीं सकता। यही मूर्छित प्रतापनगर आज सभी के लिए महज पहाड़ का टीला बन कर रह गया है। इस पहाड़ी टीले की छाती पर जो समाज सांसे ले रहा है उसकी फिक्र शायद ही किसी को हो। कोई जान पाये कि विकास के साथ कदमताल करने वाला प्रतापनगर आज 18वीं सदी में जीने को मजबूर है। एक दशक में तीन निर्वाचित सरकारों ने अपना शासन इस प्रदेश में चलाया लेकिन किसी भी सरकार ने प्रतापनगर की सुध नही ली, जबकि प्रतापनगर की जनता ने जिस प्रत्याशी को भी यहां से चुनकर भेजा उसी की पार्टी की सूबे में सरकार बनी, फिर चाहे साल 2002 में मार्क्सवादी सिद्धांतों और कांग्रेसी रंग में रंगे खांटी नेता फूल सिंह बिष्ट हो या फिर संघ की खाकी पैंट पहनने वाला विजय सिंह पंवार या फिर वर्तमान में कांग्रेसी रंग-रूट विक्रम सिंह नेगी। तीनों ही लोगों को प्रतापनगर की जनता ने अपना प्रतिनिधि चुनकर देहरादून के सफेद पर्वत भेजा, लेकिन किसी ने भी प्रतापनगर की आवाज सफेद पर्वत के अंदर नहीं उठायी। प्रतापनगर को आज गोविंद सिंह नेगी जैसे तेज-तर्रार नेता की जरूरत है, जो विधानसभा के अंदर प्रतापनगर की समस्या को मजबूती से रख सके। 
वर्तमान में प्रतापनगर के परिदृश्य को देखते हुए कतई भी नहीं लगता कि ये वही प्रतापनगर है जहां कभी विकास का पहिया तेजी से घूम रहा था। महज एक दशक में प्रतापनगर के अंदर से इतना पलायन हुआ कि आज समूचा इलाका वीरान हो चुका है। प्रतापनगर से एक दशक में हुआ पालयन शायद ही आजाद भारत के अंदर किसी अन्य जगह से हुआ हो। प्रतापनगर से पलायन कर चुके लोग नई टिहरी, ऋषिकेश, देहरादून, हरिद्वार और महानगरों में अब अपनी जड़े जमा रहे हैं। लेकिन प्रतापनगर में हुए इतने बड़े पलायन की ओर किसी की नजर नहीं पड़ी ।ना सरकार की और ना उसके हुक्मरानों की। पालयन पर बड़ी बहस होती है लेकिन इस बहस में कभी भी प्रतापनगर का कोई जिक्र तक नहीं होता। कोई रत्तीभर नहीं बोलता कि प्रतापनगर की भी थोड़ा सुध लो, लेकिन नहीं। शिक्षा, स्वास्थ्य की सुविधा तो यहां बाबा आदम के जमाने की है। स्कूलों में एक भी टीचर नहीं, बच्चे स्कूल तो जाते हैं लेकिन शिक्षक ना होने से बैरंग वापस लौटते हैं या फिर रास्तों में छुपमछुपाई का खेल खेलकर अपने भविष्य को अंधेरे में धकेलने को मजबूर हैं। उच्च शिक्षा के नाम पर प्रतापनगर ब्लॉक में दो महाविद्यालय खोले गये, एक लंबगांव के कोने में तो एक अगरोड़ा में, दोनों कालेज ऐसी जगह बनाये गये जहां जाने में छात्रों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है। लंबगांव में खोले गये कालेज में विज्ञान संकाय की मांग थी लेकिन जालिम नेताओं और अफसरांे ने इसकी स्वीकृत आज तक नहीं दी, लिहाजा विज्ञान विषय से पढ़ाई करने वाले छात्रों को महंगा किराया देकर या तो नई टिहरी में या फिर देहरादून और ऋषिकेश पढ़ाई करनी पड़ रही है।  यही हाल अस्पतालों का है, एक भी डाक्टर आस्पतालों में नहीं है। प्रतापनगर और लंबगंाव में कहने को तो अस्पताल है, लेकिन इनकी हालत बदतर है। यहां तक पहुंचते ही मरीज दम तोड़ देता है। क्षेत्र में एक सौ आठ आपातकालीन सेवा तो हैं लेकिन महज दिखावे की, वो इसलिए कि एक सौ आठ की एम्बुलेंस प्रतापनगर खड़ी रहती है, और अगर भदूरा पट्टी के गांव में कोई घटना घट जाती है तो एम्बुलेंस को वहां पहुचने के लिए तकरीबन तीन घंटे लग जाता है। ऐसे में इस सेवा का यहां के लोगों के लिए कोई विशेष महत्व नहीं है।
शायद देश में इतनी महंगी राशन कहीं नहीं मिलती है, जितनी कि प्रतापनगर में, इसकी वहज भी टिहरी झील से उपजी समस्या है। राशन से भरे वाहन घनसाली या फिर उत्तरकाशी से प्रतापनगर जाते हैं। जिससे गाड़ी का भाडा़ इतना बढ़ जाता है कि दुकानदारों को मजबूर होकर महंगी राशन बेचनी पड़ती है। प्रतापनगर में चावल और दालों के भाव आसामन छू रहे हैं। और पिछले एक दशक से प्रतापनगर की जनता इस महंगाई से त्रस्त है, आलम ये है कि ऋषिकेश में दस रूपये किलो टमाटर प्रतापनगर में पचास रूपये से नीचे नहीं मिलता। लेकिन किसी भी सरकार ने यहां की जनता की पीड़ा को नहीं समझा। यही हाल पेयजल का है, प्रतापनगर में पानी की भारी किल्लत है, स्थिति ये है कि यहां घोड़ो और खच्चरों पर पानी की ढुलाई की जाती है, जबकि प्रतापनगर और लंबगांव के लिए थलवाल गाड़ (सिलगाड़) से टैंकर से पानी की सप्लाई की जाती है, जिससे स्थानीय काश्तकारों को भारी समस्या उठानी पड़ती है, क्योकि गाड़ का सारा पानी टैकरों से सप्लाई किये जाने से सेरों के खेत पानी के बिना सूख जाते हैं, जिससे धान की फसल को भारी नुकसान पहुंचता है, जिस वहज से यहां नौबत मारपीट तक आ जाती है। कई बार स्थानीय लोगों ने इसका विरोध भी किया लेकिन प्रशासन की ओर से कुछ भी नहीं किया गया। हालांकि सरकार की ओर से पंपिंग योजना शुरू करने की घोषणा तो की गई थी लेकिन ये योजना कब  धरातल की बजाय रसातल में समा गई। 
हाल के दिनों में आयी आपदा का कहर प्रतापनगर पर भी टूटा। प्रतापनगर जाने के लिए दो झूला पुल है, एक पीपलडाली और दूसरा स्यांसू पुल। लेकिन सूबे में भारी बरसात और टिहरी झील में बढ़ते पानी के जल स्तर से इन दो पुलों से जुडे मार्ग भूस्खलन की जद में आये। जिस वजह से लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ी। आलम ये था कि सुबह चार बजे घर से निकले लोग ऋषिकेश रात आठ बजे पहुंच रहे थे। क्षेत्र की ऐसी स्थिति में प्रदेश की सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिध देहरादून में दुबके थे। लेकिन क्षेत्र के हालात को लेकर प्रतापनगर के विधायक तक ने मुंह नहीं खोला। सड़कें दरक रही थी, जनता के माथे पर परेशानी का पसीना चूं रहा था और जनप्रतिनिधि प्रसन्न मुद्रा में देहरादून की सड़कों पर चौपहिया वाहन का सुख भोग रहे थे। हालांकि कुछ लोगों का कहना ये भी कहना है कि क्षेत्र के विधायक बड़े विजनरी व्यक्तित्व वाले हैं, लेकिन ऐसे विजन का क्या करना जिसका उपयोग वो क्षेत्र के विकास के लिए नहीं कर पा रहे हैं। प्रतापनगर को अगर मौजूदा समय में अगर किसी चीज की आवश्यकता है तो वो हैं क्षेत्र के लिए एक अदद पुल। हालांकि प्रतापनगर के लिए चांठी-डोबरा के पास एक पुल प्रस्तावित भी है, लेकिन ये पुल पिछले एक दशक से निर्माण की अंधेर गुफा में कहीं खो गया है। लिहाजा इस पुल के लिए रामायण के नल-नील की सख्त आवश्यकता है। ताकि जल्द पुल का निर्माण हो सके और गंगा के उस पार की जनता को थोड़ा सुकून मिल सके। 

खैर जो भी हो टिहरी लोकसभा उपचुनाव का बिगुल बज चुका है। और आगामी 10 अक्टूबर को क्षेत्र की जनता एक बार फिर दिल्ली के गोल पर्वत के लिए अपना प्रतिनिधि चुनेगी। इस बार प्रतापनगर की जनता दिल्ली के दुर्ग में किसे भेजने में अपनी दिलचस्पी दिखायेगी ये कहना अभी मुश्किल है। लेकिन इतना तो तय है कि इस बार गंगा पार के इलाके का झुकाव राजपरिवार की तरफ ज्यादा है। इसका का भी वाजिब कारण है। क्योंकि स्वर्गीय महाराजा मानवंेद्र शाह ने कभी भी प्रतापनगर की उपेक्षा नहीं की। महाराजा के स्वर्गसिधर जाने के बाद इस क्षेत्र की सुध किसी ने भी नहीं ली। टिहरी की जमीन से प्रदेश की सियासत करने वाले वर्तमान मुख्यमंत्री ने भी प्रतापनगर को हमेशा पहाड़ी टीला समझा, और हमेशा प्रतापनगर की उपेक्षा की, जब सांसद थे तब भी और प्रदेश के मुखिया भी होने के बाद भी प्रतापनगर की कोई खबर नहीं ली। टिहरी लोकसभा सीट पर हो रहे उपचुनाव में भाजपा ने राजपरिवार पर अपना भरोसा जताकर टिहरी महारानी को मैदान में उतारा है। उधर कांग्रेस ने भी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के बेटे को टिकट थमा दिया है। दोनों दलों के प्रत्याशी क्षेत्र की जनता के लिए किसी अजनबी की तरह है। एक दफा भाजपा प्रत्याशी राजघराने की होने के नाते लोगों उनके प्रति भावनात्मक लगाव है लेकिन कांग्रेस के प्रत्याशी यहां की जनता के लिए अजनबी ही है। ऐसे में क्या टिहरी लोकसभा उपचुनाव में प्रतापनगर की जनता बहुगुणा परिवार के सदस्य को विजय बनाने में भागीदारी निभायेगी। इस का जबाव तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चल पायेगा। लेकिन इतना तो तय है कि झील पार का क्षेत्र अपनी परेशानियों का हिसाब चुनाव में जरूर चुकता करेगा, और ये हिसाब कांग्रेस की जीत में अवरोधक का काम करेगा। 

लोकसभा चुनाव भी होंगे, विधानसभ चुनाव भी होंगे, लेकिन क्या कभी इस बांध प्रभावित क्षेत्र को फिर से गोविंद सिंह नेगी जैसा तेज-तर्रार नेता मिलेगा। जो जनता की समस्याओं को संसद और विधानसभा के अंदर उठा सके। उम्मीद है कि एक दिन जरूर आयेगा जब प्रतापनगर को भी दूसरा गोविंद सिंह नेगी मिलेगा और तब खामोशी की चादर ओढ़े हुए प्रतापनगर, अपने हक के लिए आवाज बुलंद कर रहा होगा।  


Wednesday, September 19, 2012

कांग्रेस का दामन थामेंगे कंडारी!



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Tuesday, September 18, 2012

खबरदार..! सितारगंज नहीं है टिहरी




समीकरण गड़बड़ा सकते हैं घनसाली व प्रतापनगर के मतदाता


टिहरी इन दिनों खबरों की सुर्खियों में है। अखबारों, टीवी चैनलों और राजनीतिक पार्टियों के दफ्तरों में टिहरी की चर्चाएं छिड़ी हुई है। इन चर्चाओं में टिहरी के इतिहास को याद किया जा रहा है, राजा के जमाने की किस्से और कहानियां भी सुनने को मिल रही है। टिहरी से राजपाट और पच्चीस साल की गोर्ख्याण की यादें भी ताजा हो उठी है। गढ़वाल साम्राज्य का दो भागों में बंटना और फिर बाद में टिहरी रियासत का भारत में विलय भी चर्चा का हिस्सा है। टिहरी लोक सभा सीट पर टिहरी राजपरिवार का वर्चस्व, खात्मे और खत्म हुए वर्चस्व को दोबारा हासिल होने के सपनों का भी जिक्र इन दिनों चाय के ढ़ाबों से लेकर गांव की मुंडेरों और देहरादून के अविकसित शहरी इलाकों से लेकर सत्ता के गलियारों हो रहा है।
असल टिहरी भले ही पानी की झील की अतल गहराई में शांत और खामोश इन सब बातों से अनविज्ञ हो, लेकिन टिहरी लोकसभा उपचुनाव के बहाने उसे सहानुभूति से याद किया जा रहा है, राजा के बसाये जाने से लेकर, विकास के नाम पर उसे डुबोये जाने तक। टीवी चैनलों, अखबरों, राजनीतिक पार्टियों के दफ्तरों और नेताओं के बयानों में टिहरी की विकास की बातें किसी मिश्री की तरह लग रही है, जिसकी मिठास कल्पना से भी मीठी प्रतीत होती है, अगर सच में ऐसा होता तो शायद भारत में विलय होने वाली टिहरी रियासत के लोग खुशनसीब होते, खास कर झील पार की आबादी।
टिहरी का अचानक चर्चाओं में आने का श्रेय मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को जाता है। जिनकी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं ने भूली-बिसरी टिहरी को खबरों में ला खड़ा कर दिया है। सांसद बहुगुणा के मुख्यमंत्री बनने के बाद खाली पड़ी इस सीट पर उपचुनाव होना तय हुआ है। यही वजह है कि अनजान सितारगंज की तरह टिहरी भी चर्चाओं का बाजार गरमाये हुए है। लेकिन सितारगंज और टिहरी में जमीन-आसमान की असमानताएं हैं। टिहरी हमेशा से ही विश्व मानचित्र पर अपनी पहचान बनाए हुए है और सितारगंज सिर्फ वर्तमान मुख्यमंत्री की विधानसभा सीट के तौर पर जानी जाती है, या फिर बंगाली बाहुल्य इलाका। लेकिन टिहरी की धरती कई अनगिनत पहचानों से अटी पड़ी है, जिसका बाखान असंभव है, क्योंकि टिहरी अपने आप में ही एक मिसाल है।
ऐसे में इस लोकसभा उपचुनाव में भी टिहरी को सितारगंज समझना नादानी होगा। क्योंकि सत्तासीन कांग्रेस  टिहरी को भी सितारगंज समझ बैठी है। कांग्रेस के मठाधीशों का एक मत है कि टिहरी में भी सितारगंज की सफलता को दोहराया जायेगा। अति आत्मविश्वास में पगलाये कांग्रेसियों को इतना जानना जरूरी होगा कि वो टिहरी की सांभ्रांत जनता से किस आधार पर वोट मांगेगी। यहां तो किसी को भूमिधरी का अधिकार नहीं चाहिए। जिस प्रत्याशी के लिए टिहरी के मतदाता से वोट की अपील की जा रही है उस प्रत्याशी का नाम यहां की जनता ने अखबारों के काले आखरों और टीवी पर बकबक करते एंकर के मुंह से सुना। ना कांग्रेस का प्रत्याशी यहां की परिस्थिति, बोली-भाषा और रीति रिवाज को जानता है और ना समझता है, यही हाल भाजपा प्रत्याशी का भी है। भाजपा भले ही राजपरिवार के बहाने जीत का स्वाद चखने को आतुर हो, लेकिन उसके उम्मीदवार का भी टिहरी संसदीय सीट पर अपना कोई वजूद नहीं है। महाराजा मानमेंद्र शाह की ईमानदारी और बोलांदा बद्रीश का भावनात्मक झुकाव भले ही भाजपा की ओर हो लेकिन जीत टिहरी महारानी की होगी ऐसा कहना भी अभी जल्दबाजी होगा।
टिहरी संसदीय सीट के राजनीतिक रूख की अगर बात करें तो प्रदेश के राजनेताओं से लेकर स्थानीय नेताओं के जुबां पर टिहरी की विकास की बातें सुनने को मिल रही है। हर पार्टी के नेता टिहरी में हुए विकास को अपनी उपलब्धि बता रहे हैं, लेकिन बांध प्रभावित प्रतापनगर, घनसाली विधानसभा की जनता की समस्याओं के निदान के लिए किसी भी नेता के पास कोई योजना नहीं है। विस्थापित लोगों की समस्याएं, पुनर्वास में हुए घोटाले और ना जाने कितने ही मुद्दों पर हर पार्टी के नेताओं ने चुप्पी साध रखी है। कोई भी नेता दावे के साथ ये कहने को तैयार नहीं है कि टिहरी डूब जाने के बाद से एक अदद पुल का इंतजार कर रही प्रतापनगर की जनता को कब पुल का सुख मिलेगा। जबकि सभी पार्टियों के नेताओं को पता है कि प्रतापनगर के लिए पुल का बनना कितना जरूरी है। अगर आंकड़ों की बात की जाय तो अकेले घनसाली और प्रतापनगर विधानसभा के मतदाता हार और जीत की बाजी पटलने का मद्दा रखते हैं। यही भूल सत्तासीन कांग्रेस करने जा रही है और भाजपा इसका फायदा उठाने में लगी है। नतीजा ये है कि दोनों विधानसभा में कांग्रेस विरोधी लहर निकल पड़ी है।
खैर कांग्रेस और भाजपा अब सीधे तौर पर मैदान में उतर चुकी है। दोनों की दलों के बीच चुनावी टक्कर देखने को मिल रहा है। भाजपा प्रत्याशी टिहरी महारानी माला राजलक्ष्मी शाह पर ना सिर्फ टिहरी लोकसभा सीट जीत कर कमल खिलाने की जिम्मेदारी है बल्कि दोबारा इस संसदीय सीट पर राजपरिवार का वर्चस्व कायम की भी चुनौती है। तो वहीं कांग्रेस प्रत्याशी साकेत बहुगुणा को विजय बनाने में खुद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। हालांकि मुख्यमंत्री टिहरी लोकसभा सीट को जीतने का दावा कर रहे हैं, लेकिन तमाम झंझावतों, विरोधों के बाद भी क्या बहुगुणा परिवार अपने नए ढौर को बचाने में कामयाब हो पायेंगे या फिर राजपरिवार की बहू अपने किले में राजनीतिक सेंधमारी को इस बार उखाड़ फेंकेगी। खैर लोकतंत्र के इस चुनावी घाट पर फैसला जनता को करना है, लिहाजा टिहरी को सितारगंज समझना हवा का रूख मोड़ सकती है।