Wednesday, December 12, 2012

नींद में है साडा



245 बीघे की जगह सिपर्फ 45 बीघा जमीन पर दिखी अवैध् प्लाॅटिंग

प्रदीप थलवाल
उत्तराखंड अलग प्रदेश क्या बना कि सूबे में एक नई किस्म की प्रजाति भी पैदा हुई। ये प्रजाति किसी रसायन या भौतिक प्रक्रिया से नहीं बल्कि सरकारी तंत्र की कमजोरी से जन्मी, जिसे खाद-पानी देने का काम हमारे माननीय नेताओं ने किया। आलम यह है कि आज के समय में यह प्रजाति प्रदेश को चट करने में लगी हुई है। इन्हीं में एक भू-माफियाओं की प्रजाति भी है जिसकी गि( जैसी नजरें प्रदेश की जमीन पर लगी हुई है।
चमोली से लेकर चंपावत, उत्तरकाशी से लेकर ऊधमसिंह नगर , टिहरी से लेकर टनकपुर और देहरादून से लेकर नैनीताल सहित समूचे प्रदेश में भू-माफियाओं का गिरोह इस काम में जुटा है।  हर जगह प्रदेश  की जमीन को हड़पकर भूमाफिया बेच रहे  हैं। खरीद-फरोख्त का यह धंधा दिन दूनी और रात चैगुनी तरक्की कर रह है। यही वजह है कि इस ध्ंाधे में जो भी लोग आये उन्होंने ना सिर्फ मोटा पैसा कमाया बल्कि सरकार और शासन में भी अपनी धाक जमायी। समय के साथ-साथ  भू-माफियाओं का राज और डर प्रदेश में इस कदर बढ़ गया जैसे कि अंधकार में किसी दैत्य का। जिसकी परछाई मात्र से ही लोग सहम जाते हैं।
समूचे प्रदेश में भू-माफियाओं ने ना सिर्फ सरकारी जमीनों पर कब्जा जमाया हुआ है बल्कि कृषि भूमि का बिना लैंड यूज चेंज किये उसे बेच भी रहे  हैं। प्रदेश में जमीनों की खरीद-फरोख्त का सूचकांक हर रोज कुलांछे भर रहा है लेकिन सरकार से लेकर शासन और प्रशासन के एक भी नुमाइंदे ने सूबे में हो रही भूमि की अवैध खरीदारी पर सावल नहीं उठाये। इसकी वजह यह भी बताई जा रही है कि इस धंधे में खुद प्रदेश के हुक्मरान शामिल हैं, ऐसे में भू-माफियाओं पर कार्रवाई की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
जमीन की खरीद फरोख्त का सिलसिला राजधानी में भी बदस्तूर जारी है। स्थिति ये है कि राजधानी और इससे सटे इलाकों में जमीन के भाव आसमान छू रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद भी जमीनों की खरीददारी पर अंकुश नहीं लग रहा है कभी बासमती की खुशबू और लीची की मिठास के लिए पहचान रखने वाले दून से यह दोनों ही चीज गयाब हो गई है। आम के बागान चैपट हो गये हैं। भू-माफियाओं के हाथों विकासनगर बिक रहा है, लेकिन आला-अफसरों के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है। विकासनगर में कई आम और लीची के बागन कंक्रीट के जंगल की भेंट चढ़  गये हैं  लेकिन इसके बावजूद भी प्रशासन ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया।
जबकि देहरादून से सटे  आसपास के क्षेत्र की देख-रेख के लिए बकायदा दूनघाटी विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण का गठन किया गया है। इस प्राधिकरण पर क्षेत्र की निगरानी रखने की जिम्मेदारी है।  लेकिन आरामपरस्त असफरों की कार्यशैली का फायदा उठा भू-माफियाओं ने ना सिर्फ सरकारी जमीनों बल्कि बागानों  पर अवैध प्लाटिंग कर बेच दिया है। जबकि प्रदेश के भू-कानून के अनुसार किसी भी कृषि योग्य जमीन को बिना लैंड यूज चेंज किये उसकी प्लाटिंग नहीं की जा सकती है। बावजूद इसके विकासनगर के हरबर्टपुर, परगना पछवादून  स्थित वंशीपुर गांव में इस कानून का भू-माफियाओं ने जमकर उल्लंघन किया।  कहते हैं कुंभकर्ण भी सिर्फ छः महीने ही सोता था मगर ताज्जुब की बात है कि साडा नाम का प्राधिकरण उक्त प्रकरण में पिछले सात साल से सोया हुआ ही है। आरटीआई का रणसिंघा उसे जगाने की कोशिश करता है लेकिन साडा उनींदी हालत में ही नोटिस भेजकर फिर से सो जाता है।  बंशीपुर के बाग प्रकरण पर आरटीआई के तहत ली गई जानकारी के अनुसार प्राधिकरण को सिर्फ 45 बीघा जमीन पर अवैध प्लाटिंग नजर आयी, जबकि भू-माफियाओं द्वारा 245 बीघा जमीन पर प्लाटिंग की गई है। प्राधिकरण द्वारा आरटीआई के तहत जानकारी दी गई है कि अमुक बागान के 45 बीघा जमीन पर  भू-उपविभाजन के विरू( लक्ष्मी नारायण, रमेश नारायण, हृदय नारायण, बिदुर नारायण, आखिलेश नारायण और जनार्दन को कारण बताओ एवं विकास कार्य रोको नोटिस निर्गत किया है। जो कि 17 जनवरी 2005 को भेजा गया। इसके साथ ही प्राधिकरण सूचना के अधिकार के तहत जानकारी देता है कि उसने 27 सितंबर 2012 को 11 बजे तक अपने कार्यालय में हाजिर होकर भू-स्वामी को अपने पक्ष में बात रखने का नोटिस दिया था। ऐसे में प्राधिकरण पर सवाल उठता है कि साल 2005 से अब तक उसने इस प्रकरण में क्या कार्यवाही की?  आखिर इतने जिम्मेदार प्राधिकरण के अफसर कहां सोये रहे। आखिर सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगे जाने के बाद ही प्राधिकरण ने उक्त भू-स्वामी को अपने पक्ष रखने की याद क्यों दिलायी? आखिर क्यों प्राधिकरण अवैध निर्माण के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने से हिचकिचा रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि भू-माफियाओं के तार सीधे साडा से जुडे हों, इसीलिए पिछले सात साल तक प्राधिकरण ने इस ओर कार्यवाही करना उचित नहीं समझा हो।
वहीं दूसरी ओर दूनघाटी विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर एक और प्रकरण सवाल उठाता है। ये मामला भी विकासनगर का है, जिसमें जीवनगढ़ गांव लगभग 153 बीघा जमीन पर भू-उपविभाजन और  भू-खंड पर विकास कार्य किया जा रहा है। लेकिन प्राधिकरण को इससे कोई सरोकार नहीं है। हालांकि प्राधिकरण ने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी दी कि उसने 11 जून 2007 को भू-स्वामी को नोटिस दिया था और उसे अपना पक्ष रखने को कहा गया था। ताज्जुब की बात है कि इसके बाद भी यहां प्लाटिंग का कार्य जोरों पर है।
इन दो प्रकरणों से साफ होता है कि दून घाटी में भू-माफियाओं का कितना दबदबा है। जमीनों की खरीद-फरोख्त में लिप्त भू-माफियाओं को ना तो कानून का डर  है और ना ही प्रशासन का खौफ। यही वजह है कि सूबे में भू-माफिया निश्चिंत हैं। क्योंकि उसे भय दिखाने वाले प्रशानिक अधिकारी से लेकर नेता उसकी मुट्ठी में हैं। सवाल उठता है कि  क्या सरकार इन तथ्यों से बेखबर हैं? उसके अफसर क्या गुल खिला रहे हैं और उन्हें किस नेता का संरक्षण प्राप्त है या यूं कहें यह नेता-अफसर-माफिया जोड़ है, जो आसानी से नहीं टूटेगा। सबसे गंभीर और खतरनाक यह जोड़ है जिसे प्रदेश की जनता को समझ लेना चाहिए। जिस जमीन के लिए जनता ने लड़ाई लडी उसे बचाने के लिए उन्हें दूसरा आंदोलन भी न लड़ना पड़े।

कहीं किस्सा कुर्सी का तो नही!



चड्डा बंधु हत्याकांड की जांच दिल्ली क्राइम ब्रांच कर रही है और यह बात भी सामने आ रही है कि इस हाईप्रोफाइल हत्याकांड के दौरान उत्तराखंड का एक आईएएस अफसर भी छतरपुर में मौजूद था।  अगर सच में उत्तराखंड का कोई आईएएस अफसर छतरपुर में था तो यह कैसे संभव है कि दिल्ली पुलिस ने उस कथित आईएएस से कोई पूछताछ नहीं की और ना ही उत्तराखंड सरकार या पुलिस को किसी आईएएस के वहां होने की पुष्टि करी।  जहां आज के टैक्नालाॅजी के युग में कौन आदमी कहां है उसकी लोकेशन खंगालना दिल्ली पुलिस के बांए हाथ का काम है। मगर आजतक उत्तराखंड के किसी आईएएस के छतरपुर में मौजूद होने का कोई सबूत सामने नहीं आ पाया है।
दूसरी ओर उत्तराखंड में अगले मुख्य सचिव पद की लड़ाई भी अंदरखाने चल रही है। अभी से रास्ता साफ किया जा रहा है, कहीं यह खबर कि उत्तराखंड का एक सीनियर आईएएस वहां मौजूद था यह भी अपने चहेते खबरनबीसों के माध्यम से हव्वा तो नहीं बनाया जा रहा है?सूत्रों की मानें तो छतरपुर में हत्याकांड के समय उत्तराखंड का कोई अधिकारी मौजूद नहीं था, इसके बावजूद बड़ी सूझबूझ और रणनीति के तहत यह खबर आग की तरह फैली। वहीं दूसरी ओर रेव पार्टी में एक आईपीएस का नाम घसीटा जाना भी पुलिस महकमें में साजिश के तहत देखा जा रहा है। इन दोनों प्रकरणों को देख कर एक पहलू यह भी निकल कर सामने आ रहा है कि माफिया तंत्र अपने हितैशी अधिकारियों और खबरनबीसों के जरिए मुख्यमंत्री पर  भी निशाना साधने की तैयारी में तो नहीं है। अगर  ऐसा है तो इसकी पुष्टि आने वाले दिनों में जरूर होगी।

देवभूमि की छाती पर, माफिया के गमबूट




चड्डा हत्याकांड से लेकर रेव पार्टी तक

देवभूमि उत्तराखंड का शायद चरित्र बदल रहा है! जिन  आला अफसरों को तरक्की की तस्वीर बनानी चाहिए उन अफसरों का नाम राज्य के लिहाज से जधन्य कांडों में उछल रहा है। किसी का नाम हत्याकांड की कड़ी बन रहा है तो किसी का नाम नशीली महफिलों का लुत्फ लूटने वालों में शामिल हो रहा है। जिन बदनाम धंधों से माफिया के ताल्लुकात होते हैं वहां राज्य के अफसरों के नाम तलाशे जा रहे हैं। पौंटी हत्याकांड के छीटे हों या रेव पार्टी के दाग, अगर राज्य के अफसर के दामन पर तलाशे जा रहे हैं तो सवाल उठना लाजिमी है आखिर अफसरों के नाम कौन उछाल रहा है ?उन्ही की बिरादरी, या राज्य में सक्रिय माफिया ? ये सच है ! या साजिश ! देवभूमि की मासूम जनता के सामने ये यक्ष प्रश्न बन गया है।

सीन एक शूटआउट ऐट छतरपुर,  लिकर किंग और माफियाओं का बेताज बादशाह पौंटी चड्डा  और उसके भाई हरदीप सिंह चड्डा की आपसी रंजिश से मौत। ये खबर आते ही पूरे उत्तरी भारत में सनसनी पसर गई । यकायक आयी इस खबर पर किसी को विश्वास नहीं हुआ। लेकिन मीडिया में छाने के बाद सबको यकीन हो गया कि लिकर किंग नहीं रहा। शुरूआत में इस दोहरे हत्याकांड के लिए जिम्मेदार दोनों भाईयों के बीच संपत्ति विवाद को करार दिया गया। लेेकिन इस बीच सुखदेव सिंह नामधारी का नाम आने से मामले ने दूसरा मोड़ लिया। नामधारी का कनेक्शन सीधे भगवाधारियों से है और इस दोहरे हत्याकांड से पहले नामधारी के सीने पर उत्तराखंड अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष का बिल्ला भी टंगा हुआ था।
इस प्रकरण में नामधारी का नाम आने से जहां उत्तराखंड सरकार की सांसे फूली वहीं भाजपा और संघ सहित तात्कालीन सीएम की जान भी अटक गयी जिन्हांेने नामधारी को आयोग का पद सौंपा। किसी से भी जबाव देते नहीं बना कि आखिर प्रदेश के एक सम्मानित पद पर आसीन नामधारी शूटआउट ऐट छतरपुर की घटना के दौरान वहां क्या कर रहा था?
राष्ट्रीय मीडिया में लगातार खबरों के प्रसारण के बाद सरकार ने सुखदेव सिंह नामधारी को पदमुक्त कर दिया। दूसरी ओर भाजपा ने भी समय को भांपते हुए नामधारी की पार्टी से प्राथमिक सदस्यता खत्म कर उससे किनारे होने में अपनी भलाई समझी। इतना ही नहीं नामधारी ने हत्याकांड के तुरंत बाद उत्तराखंड के दो नेताओं और एक अधिकारी से फोन पर बात की, क्या जनता कभी इन नमों को जान पाएगी? शुटआउट ऐट छतरपुर की जांच में जुटी दिल्ली पुलिस सूबतों के आधार पर सुखदेव सिंह नामधारी और उसके गनर सचिन त्यागी को गिरफ्तार कर उनसे पूछताछ कर रही है।
इस पूरे  घटनाक्रम के दौरान उत्तराखंड सहित राष्ट्रीय मीडिया में एक और खबर आती है कि शूटआउट ऐट छतरपुर से उत्तराखंड के एक आईएएस अफसर के तार भी जुडे़ हैं। इस खबर से अमूमन शंात माने जाने वाले राज्य की नौकरशाही में खलबली मच गई है। सवाल उठ रहा है पौंटी हत्याकांड से प्रदेश के वरिष्ठ आईएएस अफसर का क्या नाता है ? खबरें तो यह भी कहती हैं कि अफसर भी वंहा मौजूद था सवाल है आखिर बदनाम धंधे के सौदागर से व्हाइटकाॅलर जाॅब करने वाले अफसर का क्या ताल्लुक था आखिर वह वहां क्या करने गया था? अगर खबर में रत्ती भर भी सच्चाई है तो पूछना जायज है आखिर पोंटी से अफसर का क्या रिश्ता था ?
सीन दो, तरक्की के साथ कदमताल कर रहा देहरादून अब आधुनिकता के अंधे गलियारे की ओर बेहिसाब दौड़ रहा है। यही वजह है कि मठ-मंदिरों की जमीन पर अब ढोल-नगाड़ों का मंडाण नहीं लगता बल्कि पश्चिम की अधनंगी संस्कृति नशे में थिरकती हुई दिखती है। रेस्तरां और नाइट क्लब खुल रहे हैं, अमूमन आठ बजे के बाद सन्नाटे में पसरे रहने वाले दून की रातंे अब विभिन्न प्रकार की रंगीन लाइटों और डीजे के संगीत में मदमस्त हैं, जहां जवानी का जोश अपने उबाल के चरम सीमा पर  रहता है और बेपरवाह काया बिन पेंदे के लोटे की तरह कहीं भी लुडक जाती है। कानून के नजारिये ये अपराध है लेकिन दून की शांत वादियों में कानून का कड़ा मिजाज पर भी शायद नाइट क्लब का नशा तारी है। हाल ही में दून पुलिस ने राजपुर रोड़ स्थित एक नाइट क्लब पर छापा मारा जहां रेव पार्टी चल रही थी। छापे के दौरान कई युवक-युवतियों को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया। कुलीन वर्ग के इन युवाओं पर देवभूमि की खाकी ने सख्ती ना दिखा कर उन्हें थाने की दहलीज पर ही जमानत पर छोड़ दिया। लेकिन इस पूरे  घटनाक्रम के दौरान एक और खबर बांउसर की तरह उछल जाती है कि रेव पार्टी के दौरान राज्य के अफसर भी मौजूद थे।
लेकिन सवाल उठता है कि ये खबर कैसे लीक हुई? क्या ये खबर आइपीएस बिरादरी ने उड़वाई है। या फिर इसके पीछे कोई ऐसा चेहरा या बिरादरी है जिसकी मंशा अपनी अधूरी हसरतों को पूरा करने की है।
इस जटिल गुत्थी को भले कोई समझे या ना समझे लेकिन पुलिस प्रशासन बखूबी समझता हैै। सूत्रों की मानें तो जिस आईपीएस अफसर का नाम रेव पार्टी में घसीटा जा रहा है उसकी कार्यशैली से देवभूमि के दामन को दागदार करने वाले माफिया गिरोह भी परेशान हैं। क्योंकि उस अफसर पर न तो माफिया की चकाचैंध का असर होता है न उसकी दबंगई का । इतना ही नहीं माना तो ये भी जाता है कि उस अफसर पर राज्य के  नेताओं का बस भी नहीं चलता।
क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि रेव पार्टी में जो अफसर मौजूद थे, उन्होंने  ही इस अफसर को षड़यंत्र के तहत रेव पार्टी में बुलाया हो, ताकि उक्त अफसर का दामन दागदार हो जाए । सूत्रों के मुताबिक माफिया की आंखों की किरकिरी बने इस आईपीएस अफसर को माफिया ठिकाने लगाने में तुले हैं और उसकी जगह एक ऐसे अफसर को बिठाने की जुगत में लगे हैं जो पूर्व में भी दून की कमान संभाल चुका है। खबरें  तो यह भी कहती हैं कि राज्य में सक्रिय माफिया चाहता है कि पुलिस प्रशासन में उच्च स्तरीय पदों पर कोई पहाड़ी अफसर ना बैठे क्योंकि इससे उन्हें काफी नुकसान पहुंचता है और पहाड़ी अफसर के पहाड़ जैसे मजबूत हौंसलों से माफिया के मन मुताबिक काम नहीं होते हैं।
यही वजह है कि बड़े पदों पर माफिया तंत्र अपने चहेते अफसरों के लिए धनबल का खूब इस्तेमाल करते हैं। जानकार लोग इसे हाल ही में पुलिस प्रशासन द्वारा किये गये पुलिस अधिकारियों की अदला-बदली के रूप में देखते हैं। इसके साथ ही अंदेशा जताते हैं कि माफिया तंत्र इस काम को अंजाम देने के लिए कार्पोरेट की समझ रखने वाले आदमी पर दांव खेल रहे हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि कैसे काम किया जाना है लिहाजा निशाना सटीक जगह लगाना जरूरी है।
इस मामले में कुछ हद तक माफिया सफल भी हुए हैं।  इतना ही नहीं माफिया तंत्र जानता है कि मीडिया की भूमिका सबसे अहम रहती है, ऐसे में कुछ पत्रकारों पर माफियाओं ने अपनी कृपा दृष्टि बनाई हुई है। जानकार बताते हैं कि इसमें ऐसी प्रजाति  के पत्रकार है जिनका प्रदेश के सरोकारों से कोई नाता नहीं है और पत्रकारिता उनके लिए महज रोजी रोटी कमाने का जरिया है। बावजूद इसके उनका सिक्का न सिर्फ सरकार और शासन में चलता है बल्कि ये लोग अपने तरीके से मीडिया का हव्वा बनाकर अपने और सौंपे गए काम को अंजाम भी दे देते हैं। पत्रकारों के इस गुट में अधिकांशतः पश्चिमी यूपी के लोग शामिल हैं।
खैर पूरे प्रकरण को देखकर लगता है कि इस समूचे प्रदेश में माफिया राज चल रहा है। सरकार और शासन माफियाओं के आगे नतमस्तक है। पुलिस से लेकर शासन-प्रशासन और मीडिया से लेकर सरकार में दखल होने के कारण माफिया अपने अनुसार देवभूमि की छाती को रौंद रहे हैं और प्रदेश की नीतियों को अपने माफिक तोड़ मरोड रहे हैं ।  सूबे में उच्च पदों पर अपने चहेतों को फिट कर रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि ये खबर कोई और उछाल रहा है माना जा रहा है कि इस खबर के पीछे अधिकारियों की बिरादरी के ही वो विभीषण हैं जिनके माफिया से ताल्लुक हैं।  क्योंकि ये आईपीएस अफसर माफियाओं की आंखों की किरकिरी बना हुआ है साथ इस पर पहाड़ी होने का तमगा भी लगा हुआ है। जबकि दूसरी ओर माफिया दून का किला फतह करना चाहते हैं और बड़े शातिर तरीके से इसे अंजाम भी दिया जा रहा है।
बहरहाल सच जो भी इसका खुलासा तकनीक के इस दौर में  जल्द हो जाएगा लेकिन असल सवाल ये है कि आखिर देवभूमि की छाती को माफिया का गमबूट अपने चमचे नौकरशाहों, नेताओं और गैरमुल्की खबरों के ठेकेदारों की बदौलत कब तक रौंदता रहेगा?  माफियाओं ने अपनी कृपा दृष्टि बनाई हुई है। जानकार बताते हैं कि इसमें ऐसी प्रजाति  के पत्रकार है जिनका प्रदेश के सरोकारों से कोई नाता नहीं है और पत्रकारिता उनके लिए महज रोजी रोटी कमाने का जरिया है। बावजूद इसके उनका सिक्का न सिर्फ सरकार और शासन में चलता है बल्कि ये लोग अपने तरीके से मीडिया का हव्वा बनाकर अपने ओर सौंपे गए काम को अंजाम भी दे देते हैं। पत्रकारों के इस गुट में अधिकांशतः पश्चिमी यूपी के लोग शामिल हैं।
खैर पूरे प्रकरण को देखकर लगता है कि इस समूचे प्रदेश में माफिया राज चल रहा है। सरकार और शासन माफियाओं के आगे नतमस्तक है। पुलिस से लेकर शासन-प्रशासन और मीडिया से लेकर सरकार में दखल होने के कारण माफिया अपने अनुसार देवभूमि की छाती को रौंद रहे हैं और प्रदेश की नीतियों को अपने माफिक तोड़ मरोड रहे हैं ।  सूबे में उच्च पदों पर अपने चहेतों को फिट कर रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि ये खबर कोई और उछाल रहा है माना जा रहा है कि इस खबर के पीछे अधिकारियों की बिरादरी के ही वो विभीषण हैं जिनके माफिया से ताल्लुक हैं।  क्योंकि ये आईपीएस अफसर माफियाओं की आंखों की किरकिरी बना हुआ है साथ इस पर पहाड़ी होने का तमगा भी लगा हुआ है। जबकि दूसरी ओर माफिया दून का किला फतह करना चाहते हैं और बड़े शातिर तरीके से इसे अंजाम भी दिया जा रहा है।
बहरहाल सच जो भी हो इसका खुलासा तकनीक के इस दौर में  जल्द हो जाएगा लेकिन असल सवाल ये है कि आखिर देवभूमि की छाती को माफिया का गमबूट अपने चमचे नौकरशाहों, नेताओं और गैरमुल्की खबरों के ठेकेदारों की बदौलत कब तक रौंदता रहेगा?

Friday, November 23, 2012

खात्मे की ओर पहाड़ी राज्य का बुनियादी मकसद




उत्तराखंड का जिक्र आते ही मनोमस्तिष्क में एक पहाडी राज्य का खाका खींच जाता है। ऐसा राज्य जिसे कुदरत ने अपार सुंदरता दी, ऐसा राज्य जो नदियों के संगीत से हर रोज नहाता है। ऐसा राज्य जहां लोगों के चेहरों पर मसूमियत झलकती है। ऐसा राज्य जिसके अंदर देश भक्ति का जज्बा कूट-कूट कर भरा है और देश के स्वाभिमान के लिए जिस प्रदेश के युवाओं ने अपनी जान की बाजी लगाई हो। वहीं काले-कूलेटे और नंग-धडंग पहाड़ों वाला प्रदेश अपने बाल्यकाल के बारह साल पूरा कर चुका है। लेकिन जिस मुकाम पर आज ये पहाड़ी प्रदेश है, वहां से राज्य बनने का बुनियादी मकसद गायब नजर आता है। यहां के लोग ऐसे पहाड़ी राज्य के लिए नहीं लड़े थे बल्कि पहाड़ी लोगों की नियति बदलने और मैदानी चश्मे से देखे जाने वाली सरकारी नीति के खिलाफ  आंदोलन लड़ा गया था। लेकिन बिडंबना देखिए कि राज्य गठन के बारह साल में ऐसा कुछ नहीं हुआ उलटे इस प्रदेश में राज करने वाली राजनीतिक पार्टियों का फोकस पहाड़ के बजाय देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर पर रहा। विकास की ज्यादा से ज्यादा योजनाएं इन्हीं तीनों जनपदों में सिमट कर रह गई। पहाड़ से पलायन नहीं थम रहा है। बल्कि राज्य बनने के बाद पहाड़ से लोगों के पलायन करने का ग्राफ ज्यादा बढ़ा। हालत ये हैं कि कई गांव जन-विहीन हो चुके हैं। लेकिन किसी भी सरकार ने पलायन को रोकने के लिए कोई ठोस नीति नहीं बनाई। टिहरी जिले के प्रतापनगर ब्लॉक में सबसे ज्यादा पलायन हुआ, इतना पलायन शायद ही आजाद भारत में कहीं हुआ हो, इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हुए पलायन के बावजूद भी राज्य सरकार ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया। सामरिक दृष्टि से देखा जाय तो प्रदेश के सीमान्त गांवों हो रहा पलायन भारी खतरे की ओर इशारा कर रहा है। प्रदेश की सीमाएं चीन और नेपाल से लगी होनेे से सीमावर्ती क्षेत्रों से पलायन सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक है। पहाड़ी इलाकों और सीमावार्ती क्षेत्रों से हो रहा पलायन इंगित करता है कि हमारी सरकारों आर्थिक वहज पैदा करने में अक्षम रही है। जिससे पहाड़ का आदमी अपने गांव या कस्बे से पलायन करने को मजबूर है। पहाड़ों का विकास करने का दावा करने वाली यहां की अब तक की सरकारों ने प्रदेश के पहाड़ों को जोड़ने के लिए कोई काम नहीं किया। सूबे में सभी राष्ट्रीय राजमार्ग यूपी के जामने के हैं और से राजमार्ग मैदान को पहाड़ से जोड़ते है ना कि पहाड़ को पहाड़ से। आज तक किसी भी सरकार ने नहीं सोचा कि वो पहाड़ी जिलों को आपास में जोड़े। सरकार के उदासीन रवैये से साफ होता है कि पहाड़ी राज्य की चिंता किसी को नहीं है। कोई पहाड़ के विकास के बारे में सोचने की जहमत तक नहीं उठाता। जब तक सोच दिल्ली की रहेगी। तब तक इस राज्य में कुछ भी नहीं हो पायेगा। कृषि, बागवानी, पर्यटन के मामले में हम एक कदम आगे भी नहीं बढ़ पाये। सरकारें दावे तो खूब करती है कि लेकिन उस पर अमल कभी भी नहीं करती। सूबे की समूची नौकरशाही मैदानी सोच की है, सचिवालय में काम के नाम पर फाइले इधर-उधर जरूर होती है लेकिन बुनियादी चीजों पर कोई भी नौकरशाह फैसले नहीं लेता। राज्य के प्रति सोच रखने वाले चिंतक, विशेषज्ञ, पर्यावरणविद और समाजिक कार्यकर्ताओं को कोई पूछता नहीं है। उनसे विकास योजनाओं को लेकर कोई राय ही नहीं लेता। शायद ये इस राज्य का दुर्भाग्य है कि जो इस प्रदेश की विकास योजना तय कर रहे हैं उन्हें यहां के अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और भूगोल की समझ ही नहीं है। ऐसे में आप कैसे पहाड़ के विकास की सोच सकते हैं। जब नेता अनुभव हीन हो और नौकरशाह अपने सहूलियत के हिसाब से योजनाएं तय कर रहे हो तो इस राज्य का भविष्य क्या होगा, और आप समझ सकते हैं कि इस प्रदेश का बुनियादी मकसद क्यों खत्म होते जा रहे हैं।

उत्तराखंड को एक नए जनांदोलन की दरकार



9 नवंबर 2000, ये वो दिन था जिस दिन, उत्तराखंड के आसमान में उम्मीदों की पतंग तैर रही थी, रंग-बिरंगे सपनों से सजी ये पतंग आसमान की ऊंचाई को भेद रही थी। उत्तराखंड का समाज नए राज्य मिलने से इतना खुश था कि राज्य के प्रति उसकी उम्मीदों का ग्राफ भी दोगुना हो चला था। राज्य गठन की खबर पहाड़ों में रोडियो के माध्यम से सुनी गई थी, तो अगले दिन अपने उत्तराखंड का आकार और प्रकार अखबारों की चौखट के भीतर छपा हुआ पाया।
नए राज्य की अकुलाहट से समूचा उत्तराखंड नए उत्साह से लैस था। बच्चे, बूढ़ों से लेकर महिलाएं नए उत्तराखंड की कल्पानाओं का खाका आपस में बुन रही थी। युवाओं के सपनों का उत्तराखंड बेरोजगार मुक्त प्रदेश था, यही वजह थी कि उनके जेहन में कैद शिक्षित और सभ्य समाज बनने का सपना हिलोरे मार रहा था। पलायन की पीड़ा की मार झेल रहे गांव में नई रौनक और युवाओं की चहल-पहल का इंतजार बूढ़ी और धुंधली पड़ रही नजरांें ने करना शुरू कर दिया था।
प्रदेश की महिलाओं ने जिस उत्तराखंड के लिए लड़ाई लड़ी थी, आज वो भी अपने सपनों को पूरा होता देख रही थी, काम के बोझ से भी वो मुक्त होना चाहती थी, वो भी अपने समाज में हाशिये पर नहीं बल्कि मुख्यधारा में शामिल होना चाहती थी। उत्तराखंड के विकास के लिए उनके अंदर जो छटपटाहट थी, उसके साकार होने की उम्मीद नजर आने लगी थी।
लेकिन अफसोस कि नियति को शायद ये कभी मंजूर नहीं था, और ना ही उन लोगों ने राज्य के प्रति कोई ठोस सकारात्मक पहल की जो इस प्रदेश के भाग्य-विधाता बनाये गये। इस प्रदेश की किस्मत का फैसला तो उसी दिन तय हो चुका था, जब सूबे की अंतरिम सरकार और इस मुल्क के पहले मुखिया ने प्रदेश का पहला शासनादेश निकाला। इस शासनादेश में राज्य की जो नींव रखी गई, उससे इस प्रदेश की अवधारणा ही खत्म होती है। जबकि इसके उलट छत्तीसगढ़ ने अपने पहले शासनादेश में अपने मूल निवासियों की पैरवी की।
 इसे बिडंबना नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे कि वहां भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी और यहां भी, लेकिन यहां के राजनेताओं ने जो शासनादेश जारी किया उसे पहाड़ी बुद्धिजीवी, चिंतक, सम्मान पा चुके आंदोलनकारी और गुमनामी के अंधेरे में खो चुका आंदोलनकारी तबका अंतरिम सरकार की अपरिपक्वता मानता है और राज्य में एक नए जनांदोलन की गुंजाइश देख रहा है।
इस माटी के लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी प्रदेश की हालत को देखकर उदास हैं। उनकी उदासी से साफ झलकता है कि सपनों का प्रदेश अभी कोसों दूर है। नरेंद्र सिंह नेगी कहते हैं कि बारह साल किसी प्रदेश के लिए कम नहीं हेाता है। लेकिन बारह साल के सफर में जो तकलीफ जनता महसूस कर रही है, उससे उसके अंदर आक्रोश गहराता जा रहा है। जनता में पनप रहा असंतोष एक दिन जरूर जनांदोलन का रूप लेगा। हम अंधेरे में रहें ऐसा नहीं हो सकता। बारह साल का सफर बता रहा है कि आखिर हम कहां जा रहे हैं। अगर हममें राज करने की सामर्थ्य नहीं है तो हमें गुलाम बना दिया जाय।
 नेगी कहते हैं कि इतिहास हमेशा गवाह रहा है कि बिना छीने-झपटे अपना हक नहीं लिया जा सकता। लिहाजा उत्तराखंड में भी एक बडे़ जनांदोलन की खदबदाहट अभी से सुनाई देने लगी है। उत्तराखंड के भाग्य में तो हमेशा आंदोलन ही लिखा है, यहां हर छोटी-बड़ी मांग के लिए लोगों को अपने घर की दहलील लांघनी पड़ी, तब जाकर लोगों ने अपना हक पाया है। प्रदेश की वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए एक नए आंदोलन की आवश्यकता महसूस की जा रही है। ऐसे में सरकार के नुमाइंदांे को भी अपनी सोच बदली होगी, स्थानीय लोगों की भावना का ख्याल रखना होगा। अगर नीति नियंताआंे ने प्रदेश के प्रति अपनी सोच नहीं बदली तो जनता बर्दाश्त नहीं करेगी।
उत्तराखंड के बारे में जनकवि अतुल शर्मा कहते हैं कि बारह साल बाद मैं इस राज्य में एक और जनांदोलन की गुंजाइश देखता हूं। यहां सत्ता बदलती है, लेकिन व्यवस्था नहीं। 12 साल के दौरान महिलाओं की पीठ का बोझ कम नहीं हुआ। इस राज्य अब तक की सरकारें कोई ठोस नीति नहीं बना पायी। राज्य तो मिला लेकिन सपने आज भी सपने रह गये। इस पृथक राज्य की अवधारणा पांच ‘प’ को लेकर थी। पानी, पलायन, पर्यटन, पर्यावरण और पहचान। इन पांचों ‘प’ को लेकर पिछले बारह साल में क्या हुआ आप देख सकते हैं। व्यवस्था की नीति और नियत साफ न होना इसका कारण है। जो तकलीफ में है उनसे मिलकर नीतियां नहीं बन रही है। अभी गांव व्यवस्था की पकड़ से दूर हैं। इसीलिए ग्राम स्तर से व्यवस्था के खिलाफ जनाक्रोश भड़क रहा है। एक सुबह जरूरी आयेगी जब युवा समझेगा कि उसके हक-हकूकों पर डाका डाला जा रहा है। वो निश्चित विद्रोह करेगा, वो उठ खड़ा होगा अपने हक की खातिर और उसी दिन इस प्रदेश में एक दूसरे जनांदोलन का सूत्रपात होगा। तुम याद रखना-
                             एक दिन नई सुबह उगेगी यहां देखना, दर्द भरी रात भी कटेगी यहां देखना

चौराहे पर उत्तराखंड आंदोलन की ताकतें



उत्तराखंड की आने वाली पीढ़ी जब इतिहास के पन्नों को पलटेगी, तो उन्हें शायद ही यकीन नहीं होगा कि, उत्तराखंड एक जनांदोलन की कोख से पैदा हुआ राज्य है। ऐसा आंदोलन आजाद भारत के इतिहास में शायद ही कभी हुआ होगा, जिसका अपना कोई ना नेता था और ना ही नेतृत्व। इस जनांदोलन में हर कोई शामिल था और हर किसी का एक ही मकसद था ‘अपना राज्य हो, अपना राज हो’। यही वजह थी कि सपनों के प्रदेश को साकार करने के लिए इस आंदोलन में लुका-छिपी का खेल खेलने वाले बच्चे थे, तो कांपती हुई काया में जवानी का जोश लिए बुजुर्ग, घर-आंगन की जिम्मेदारी संभालने वाली महिलाएं थी, तो नौकरी की खातिर अपने समाज से दूर परदेश गया युवा, यहां तक की सरकार के मुलाजिम होने के बाद भी पहाड़ के सैकड़ों बेटों ने अपने फौलादी हौंसला दिखाकर नौकरी की परवाह किये बिना आंदोलन में शामिल हुए और पहाड़ की आवाज को बुलंद किया। माटी का मान और अपनों के सम्मान के लिए भड़की एक चिंगारी ने कब जनांदोलन का रूप लिया किसी को भी पता नहीं चला।
ये वो दौर था, जब दुनियां नई सदी की शुरूआत में नई संभावनएं तलाशने में व्यस्त थी, लेकिन तब उत्तराखंड का पहाड़ी समाज अपने हक-हकूकों के लिए छटपटा रहा था, और यही छटपटाहट उत्तराखंड राज्य आंदोलन की क्रांति का बीज साबित हुआ। जल, जंगल, जमीन और जवान के बुनियाद मुद्दे को लेकर लड़े गये इस आंदोलन का नेतृत्व किसी एक के हाथ में नहीं था, लेकिन इसके बावजूद भी राज्य अंादोलन के नाम पर अपने घरों तक सीमित लोगों ने मुंडेरों को लांघ कर सड़कों पर आवाज बुलंद की। तब धार से लेकर गाड़, गली-मोहल्लों और सड़कों से लेकर सर्पीली पगडंडियों हर जगह आज दो अभी दो उत्तराखंड राज्य दो जैसे नारे सुनाई पड़ते थे। गजब देखिए कि राज्य आंदोलन के दौरान कई संगठनों ने जरूर भागदारी निभाई, जिनकी एक ही आवाज पर लोग अपना काम छोड़ आंदोलन में शामिल होते थे, लेकिन अफसोस कि आज उत्तराखंड राज्य आंदोलन की ताकतें चौराहे पर खड़ी है। जबकि राज्य की मौजूदा हालात में उन ताकतों को एक ही मंच पर खड़ा न होने की कमी शिद्दत से महसूस की जा रही है। हालात ये हैं कि जिन मुट्ठियों ने राज्य के सरोकारों के लिए एक जुट होकर हवा में लहराना था आज वो बिखरी हुई उंगलियां बन गई हैं। उत्तराखंड आंदोलन की ये ताकतें बैचेन हैं, उन्हें अफसोस है कि कभी अलग राज्य को लेकर वो एक आवाज पर एकजुट हो जाया करती थी लेकिन आज मूल मुद्दों से भटक जाने की बेचैनी उन्हें सताये जा रही है।


राज्य गठन के बाद उत्तराखंड राज्य आंदोलन की ताकतें बिखरी पड़ी हैं। राज्य आंदोलन में भागीदार संगठनों और पर्टियों के इस बिखराव का कारण कुछ संगठनों का मकसद सिर्फ उत्तराखंड राज्य का निर्माण था, राज्य मिला और उनका उत्तरदायित्व खत्म हो गया। लेकिन जिस राज्य के स्वरूप की कल्पना की गई थी जिसके लिए लड़ाई लड़ी गई थी, वह सपना आज भी अधूरा है। जो आज तक स्थाई राजधानी का चयन नहीं कर पाये, वो इस प्रदेश का क्या विकास करेंगे। लिहाजा आंदोलन की ताकतों को एकजुट होना चाहिए।
- कमला पंत, अध्यक्ष, उत्तराखंड महिला मंच



निजी स्वार्थ और नफा-नुकसान की सोच की वहज से आज उत्तराखंड राज्य आंदोलन की ताकतों चौराहे पर है। जिसकी वहज से उन लोगों ने फायदा उठाया जो राज्य आंादोलन के धुर विरोधी थे। राज्य तो बना लेकिन राज्य आंदोलनकारियों का क्या मिला। जिन लोगों को कुर्सी मिली, उन्होंने अपने पीछे के उन लोगों को भुला डाला जो नमक-रोटी खा कर आंदोलन में साथ खड़े थे। जिससे आंदोलनकारियों को गहरी चोट पहुंची है।
- सुशीला ध्यानी, अध्यक्ष, कौशल्या डबराल वाहिनी


उत्तराखंड आंदोलन दो विचारधाराओं ने लड़ा। एक विचारधारा वो थी जो आज दो अभी दो उत्तराखंड राज्य दो वाले थे, दूसरी विचारधारा के लोग वो थे जो राज्य कैसे चलेगा, कैसी नीति होगी को लेकर आंदोलन लड़ रहे थे। क्योंकि यहां के लोगों ने नए उत्तराखंड से नये भारत के निर्माण का सपना बुना था। उत्तराखंड आंदोलन की ताकतें कमजोर पड़ी है। राजनेताओं ने जैसे चाहा अपना फायदा उठाया कोई बोलने वाला नहीं है, ऐसे में प्रदेश में सामाजिक, राजनीतिक और व्यवस्था परिवर्तन की सख्त जरूरत है। क्योंकि समस्या का समाधान वही कर सकता है जिसकी समस्या है, और इसके लिए नई ताकत का खड़ा होना जरूरी है।

-पी सी तिवारी, अध्यक्ष उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी

उत्तराखंड राज्य के हालत देख अफसोस होता है, जहां तक बात राज्य आंदोलन की ताकतों की है, कोई भी एक मंच पर नहीं है। राज्य आंदोलन को सब भूल गये। राष्ट्रीय दलों ने दिग्भ्रमित कर दिया है। कुछ लोग अपने रास्ते भटक गये। ये लोग अपनी मातृ-शक्ति का अपना भूल गये। एक दल से कई धड़े बन गये। जिससे हमारी मूल भावना कमजोर पड़ गई। अगर सपनों के उत्तराखंड को पाना है तो अपने अहम को त्यागना होगा और क्षेत्रीय ताकत को मजबूत करना होगा।

- ए.पी. जुयाल, केंद्रीय कार्यकारी अध्यक्ष, यूकेडी पी


                           
                                               प्रस्तुति- प्रदीप थलवाल

Monday, October 22, 2012

क्या लोकतंत्र के पर्व का जश्न फीका होने लगा है?




टिहरी संसदीय सीट पर हुए उपचुनाव में जो मत प्रतिशत सामने आया है उससे हर कोई हैरान भी है और परेशान भी। क्योंकि इस संसदीय सीट पर हुए उपचुनाव से तकरीबन 6-7 माह पहले प्रदेेश में विधानसभा चुनाव हुए थे और फिर सितारगंज में एक उपचुनाव भी हुआ था। जिसमें सूबे की जनता ने रिकॉर्ड वोटिंग की थी, लेकिन तकरीबन छह महिने के अंतराल बाद जो ये चुनाव हुआ है उसमें जनता ने खुलकर भागीदारी नही की। लोकतंत्र का चुनावी पर्व फीका रहा । इस चुनाव के प्रति जनता का मोह भंग क्यों हुआ ? यह बात राजनीतिक समीक्षकों को तो अखर ही रही है सियासी दलों को भी सोचने को मजबूर कर रही है कि आखिर चूक कहां पर हुई। राजनीतिक दलों के सत्ता स्वार्थ ने जनता को घरों में बिठाया या लोकतंत्र का चुनावी उत्सव धीरे-धीरे अपनी लोकप्रियता खो रहा हो। वजह जो भी हो दुनिया के सबसे बडे़ और मजबूत लोकतंत्र में कम मतदान भविष्य के लिए एक खतरनाक आहट मानी जा सकती है।
बहरहाल टिहरी संसदीय सीट पर हुए उपचुनाव में लगभग 43 पफीसदी मतदान हुआ। अगर जिलावार देखा जाय तो सबसे ज्यादा मतदान देहरादून जिले में हुआ, देहरादून जिले में 45.29 प्रतिशत मतदान हुआ, दूसरे नंबर पर उत्तरकाशी जिला रहा है जहंा 44 पफीसदी मतदाताओं ने अपने मताध्किार का प्रयोग किया। सबसे कम मतदान टिहरी जिले में हुआ। यहां सिपर्फ 36.19 प्रतिशत मतदान हुआ। तीनों जिलों के मतदान पर अगर नजर डालें तो उत्तरकाशी का प्रदर्शन बेहतर रहा। क्योंकि उत्तरकाशी जिले में आयी आपदा और जिले में धन की कटाई और मंडाई होने के बाद भी मतदाताओं थोड़ा बहुत उत्साह देखने को मिला। जबकि टिहरी के मतदाताओं ने लोकतंत्रा के इस पर्व का कोई महत्व नहीं दिया।
अगर तीनों जिलों की विधनसभा सीटों के हिसाब से मतदान की स्थिति देखें तो सबसे ज्यादा मतदान विकासनगर विधनसभा सीट पर हुआ यहां 52.43 प्रतिशत मतदान हुआ। जबकि दूसरे नंबर पर चकराता विधनसभा सीट रही। सहसपुर और गंगोत्राी क्रमशः तीसरे और चौथे क्रम पर रही। सबसे कम वोटिंग घनसाली और टिहरी विधनसभा क्षेत्रा पर हुई । यहां क्रमशः 29.88 और 33.87 मतदाताओं ने अपने वोट का प्रयोग किया।

टिहरी संसदीय सीट का भूगोल देखा जाय तो इस सीट का अध्किांश भाग पर्वतीय है, जबकि मैदानी इलाका कम ही है। लेकिन पर्वतीय क्षेत्रा की अपेक्षा मैदानी क्षेत्रा में मतदाताओं की संख्या ज्यादा है। इस लिहाज से मैदानी क्षेत्रा में पर्वतीय इलाकों की अपेक्षा ज्यादा मतदान भी हुआ है। जो कि सीध्े तौर पर जीत और हार के लिए निर्णयक साबित हुआ। दूसरी ओर मैदानी विधनसभा क्षेत्रों में हुए मतप्रतिशत को देखे तो वो उत्तरकाशी जनपद की तीनों विधनसभा सीटों पर हुए मतदान की अपेक्षा कम हुआ है जबकि टिहरी की चारों विधनसभा क्षेत्रों में मतदान न्यूनतम रहा है। सवाल उठाता है कि पर्वतीय मतदाता ने वोट देने में क्यों कंजूसी दिखाई।

क्या इसकी वहज एक के बाद एक हो रहे चुनाव से लोग ऊब गये हैं? या पिफर पहाड़ के जनसरोकार के मुद्दे न उठाये जाने से जनता नाराज है। टिहरी उपचुनाव में हुए कम मतदान के पीछे जनप्रतिनिध्यिों का जनता के प्रति गैरजिम्मेदाराना रवैया भी एक कारण माना जा रहा है । जनता का मानना है कि जब वो किसी काम से अपने जनप्रतिनिध् िके पास जाती है तो जनप्रतिनिध् िया तो उसे टरका देता या पिफर उसके काम को ज्यादा अहमियत नहीं देता। जिससे मतदाता में नाराजगी है।
देखा गया है कि चुनाव के दौरान प्रत्याशी मतदाता के घर तक वोट मांगने जरूर आता है लेकिन जीतने के बाद वो पूरे पांच साल तक उन्हें अपनी शक्ल तक नहीं दिखाता। जिस वक्त उन्हें अपने जनप्रतिनिध् िकी आवश्यकता होती है उस समय वो देहरादून अपने भविष्य की तिकड़म भिड़ाने के लिए जुगत भिड़ता है या पिफर दिल्ली दरबार में अपने सियासी वजूद को बचाने के लिए जी हजूरी पफरमा रहा होता है।
ऐसे में जनता के पास चुनाव ही एकमात्रा ऐसा हथियार है जिसके जरिए वो अपनी नाखुशी जाहिर कर सकता है। माना जा रहा है कि टिहरी उपचुनाव में कम मतदान भी इसी बात का प्रतीक है।
सबसे ज्यादा मतदाताओं की नाराजगी टिहरी जिले में दिखी। जहां सबसे कम मतदान हुआ। कम वोटिंग होने का कारण क्षेत्रा की उपेक्षा भी है। क्योंकि टिहरी झील से जो समस्या कम से कम प्रतापनगर और घनसाली विधनसभा क्षेत्रा के लिए उपजी है उसी का नतीजा है कि दोनों ही विधनसभा सीटों में वोट प्रतिशत कम रहा। यहां तक कि टिहरी विधनसभा क्षेत्रा में भी मतदान बहुत कम रहा। राजनीतिक दलों से नाता रखने वाले इस बात को भी स्वीकारते हैं कि मतदान होने के पीछे का सबसे बड़ा कारण स्थानीय मुद्दों और स्थानीय लोगों को महत्व नहीं दिया जाना है। क्योंकि टिहरी उपचुनाव मे क्षेत्राीय मुद्दे किसी भी पार्टी ने नहीं उठाये बशर्ते यूकेडी पी के। दूसरी और प्रदेश की दो मुख्य राजनीतिक दलों ने प्रत्याशी चयन में भी दिल्ली दरबार का हुक्म माना। स्थानीय चेहरे को चुनावी समर में उतारना मुनासिब नहीं समझा। जिसका सीध असर मतदान पर पड़ा।

टिहरी संसदीय सीट पर कम मतदान का ये दूसरा अवसर है। इससे पहले राज्य गठन की मांग को लेकर प्रदेश भर में चुनाव बहिष्कार किया गया था। उस वक्त सूबे में बहुत कम मतदान हुआ था। हालांकि इस बार भी कई जगह चुनाव का बहिष्कार किया गया था।
लेकिन सवाल उठाता  है कि क्या चुनाव बहिष्कार से समस्या का हल हो जायेगा। इस प्रकार से चुनाव के प्रति लोगों में उदासीनता का भाव भरता जा रहा है, इससे स्पष्ट होता है कि भविष्य में चुनाव मात्रा रस्म अदायगी तक सीमित रह जायेगा। लोकतंत्रा के इस पर्व का जश्न पफीका न पड़े इसके लिए राजनीतिक दलों को अपने गिरेबान में झांकना होगा । वरना कहीं ऐसा न हो कि नौबत उस जगह पंहुच जाए जहां संविधान के इस महत्वपूर्ण अध्किार का महत्व ही खत्म हो जाए। बहरहाल टिहरी संसदीय सीट के उपचुनाव में हुए कम मतदान ने लोकतंत्रा के भविष्य पर एक सवालिया निशान लगा ही दिया है।