Monday, August 26, 2013

घायल है हिमालय बेफिक्र नौकरशाह




भारत में आए सबसे बड़े जल प्रलय के 40 दिन बाद बचाव कार्य अपने अंतिम दौर में है तो राहत कार्य जारी हैं। सरकार मृतकों आश्रितों और आपदा प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता बांटने में जुटी हुई है मगर वह भी कहां ठीक से हो पा रहा है। लेकिन इन सब के बावजूद आपदा से तबाह हुए क्षेत्रों में सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधायें मुहैया कराने पर सरकार का ध्यान नहीं है। केदारघाटी, अलकनंदा घाटी और उत्तरकाशी जिले में आज भी लगभग सब कुछ वैसा ही है जैसा जल प्रलय के दौरान था। सड़क मार्ग अभी भी ध्वस्त हैं तो आपदा प्रभावित लोग आज तक टैंटों और सरकारी भवनों में रहने को मजबूर हैं। कुछेक छोटे कर्मचारियों को अपवाद मान लें तो प्रदेश के वरिष्ठ नौकरशाह या तो राजधानी में ही बैठकों में व्यस्त हैं या फिर हवाई सर्वेक्षण कर लीपापोती में जुटें हैं। नूतन सवेराने आपदा ग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया तो पाया कि सरकार और नौकरशाही की लापरवाही से आपदा प्रभावितों के साथ-साथ समूचा पहाड़ घायल है।

सड़कों का संकट

उत्तराखंड की सबसे बड़ी आपदा को 40 दिन बीत चुके हैं लेकिन मंदाकिनी, अलकनंदा और भागीरथी घाटी के सैकड़ों गांव इस भयंकर त्रासदी से उभर नहीं पाये हैं। हालात इतने गंभीर है कि इन गांवों को जोड़ने वाली तकरीबन 5 हजार किलोमीटर की सड़कें बुरी तरह से ध्वस्त हैं। सड़कों के क्षतिग्रस्त होने से पहाड़ की लगभग 16.4 फीसदी आबादी दाना-पानी से लेकर कपड़े-लत्ते के लिए मुहाल हो गई है। प्रदेश की भौगोलिक बीहड़ता और सरकार के नकारेपन से पहाड़ का कभी ना झुकने वाला हौसला हर रोज टूट रहा है।

उत्तराखंड सरकार की नीतियों के चलते हिमालय की तलहटी में बसे 500 से ज्यादा गांवों का संपर्क आपदा के 40 दिन बाद भी कटा हुआ है। आवागमन की दिक्कतों से जूझ रहे इन गांवों की स्थिति इतनी विकट है कि पैदल रास्ते भी चलने लायक नहीं है। खुद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा भी इस बात को स्वीकारते हैं कि सूबे की 5 हजार किलोमीटर सड़कें भू-स्खलन और नदी के कटाव से तबाह हो चुकी है, जबकि राज्य के लगभग 200 पुल उफनती नदियों के भेंट चढ़ गये हैं। बहुगुणा यह भी बताने से नहीं चूकते कि राज्य के 4,300 गांवों में विद्युत और पेयजल आपूर्ति से लेकर संचार माध्यम ठप हैं।
उत्तरकाशी जिले में यमुना और भागीरथी घाटी के 135 गांव अलग-थलग पड़े हैं, इन गांवों को जोड़ने वाली 23 लिंक रोड़ बंद होने से तकरीबन 30 हजार की आबादी प्रभावित है। रूद्रप्रयाग जिले के हालात भी इससे कम नहीं है। जखोली, ऊखीमठ और अगस्तमुनि ब्लाॅक में मोटर मार्ग ध्वस्त होने से सैकड़ों गांवों का संपर्क टूट चुका है। अगस्तमुनि ब्लाॅक की लाइफ लाइन कहे जाने वाले गुप्तकाशी-मयाली मार्ग पर भी जगह-जगह भू-स्खलन का खतरा बना हुआ है। मंदाकिनी में आई भीषण बाढ़ से अगस्तमुनि और विजयनगर को जोड़ने वाला हाईवे तबाह हो चुका है। जबकि तिलवाड़ा के पास नदी की प्रचंड लहरों ने केदारनाथ हाईवे का लगभग एक किलोमीटर हिस्सा नेस्तनाबूद कर दिया जिससे इलाके में यातायात व्यवस्था बुरी तरह से चरमरा गई है। इतना ही नहीं जिले के तीनों ब्लाॅकों को जोड़ने वाले 26 पुल भी आपदा की भेंट चढ़ चुके हैं। लेकिन विड़ंबना देखिए कि सड़क मार्गों से कट चुके गांवों को जोड़ने के लिए अभी तक किसी भी प्रकार की कोई वैकल्पिक व्यवस्था स्थानीय प्रशासन नहीं कर पाया है।
चमोली जिले में भी 40 दिन बाद हालात सामान्य नहीं हो पाये हैं। जिले में लगभग 53 संपर्क मार्ग अब भी बंद पड़े हैं। जिससे सीधे तौर पर 84 गांव प्रभावित हुए हैं। बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग भी जगह-जगह भू-स्खलन और नदी के कटाव से बाधित है। अकेले गोविंदघाट से लेकर लामबगड़ तक राजमार्ग 4 जगाहांे पर भू-स्खलन की चपेट में हैं। जिन्हें खुलने में अभी काफी वक्त लगेगा। इससे पहले लोक निर्माण विभाग ने दावा किया कि वह आपदा से छतिग्रस्त सड़कों को जुलाई महीने तक खोल देगा, लेकिन असल सच्चाई यह है कि प्रदेश का लोक निर्माण विभाग इन दिनों मोर्चे से गायब है। जुलाई महीना खत्म होने वाला है और सैकड़ों सड़कों का खुलना भी मुमकिन नहीं है। राज्य के चारों धामों को जोड़ने वाली 647 किलोमीटर नेशनल हाईवे को भी भारी नुकसान पहुंचा है। राज्य सरकार ने इसे जल्द तैयार करने का दावा किया था लेकिन सरकार का यह दावा भी हवाई नजर आता है माना जा रहा है कि इसे बनाने में अभी साल भर का समय लग सकता है। प्रदेश में स़ड़कों के सुस्त निर्माण से अंदाजा लगाया जा सकता है कि सूबे की सरकार लोगों के प्रति कितनी फिक्रमंद है। राज्य के ये हालात तब है जब खुद मुख्यमंत्री भी चीजों से वाकिफ हंै। ऐसे में साफ जाहिर होता है कि सूबे में नौकरशाही ने सरकार को बौना साबित कर दिया है।

राहत नहीं पहुंचा पाई सरकार
राज्य में आपदा प्रभावित क्षेत्रों के हालात गंभीर बने हुए हैं। आपदा में सब कुछ लुटा देने वाले कई गांव अब भुखमरी की कगार पर है। आलम यह है कि पीडि़त परिवार तक राहत सामग्री नहीं पहुंच रही है। आपदा पीडि़तों का कहना है कि अगर सरकार उनकी मदद कर रही है तो फिर उनके हिस्से की मदद आखिर जा कहां रही है।

राज्य में आई भीशण आपदा के बाद समूचे देश से प्रदेश की मदद के लिए हाथ आगे बढ़े। हर राज्य की ओर से सूबे को राहत सामग्री भेजी गई। लेकिन प्रदेश के भ्रश्ट अफसरो की हिलाहवाली और सरकार के कुप्रबंधन के चलते राहत सामग्री या तो डंप हो रही है या फिर सरकारी कब्जे में सड़ रही है। जगह-जगह से भेजी गई राहत का सरकार के पास कोई रिकाॅर्ड नहीं है। हालांकि सरकार का दावा है कि जो भी सहायता आपदा पीडि़तों के लिए आई है उसे प्रभावितों को बांटा जा रहा है। लेकिन अगर सच्चाई से पर्दा उठाया जाय तो अधिकांश राहत उन लोगों के घरों में पहुंच रही है जो आपदा पीडि़त नहीं है।
हरिद्वार से लेकर देहरादून और आपदा प्रभावित जिलों के कई कस्बों में कुछ लोग राहत सामग्री को ठिकाने लगाने में तुले हैं। जबकि जरूरतमंद किसी तरह अपना गुजारा कर रहे हैं। जानकारों का कहना है कि सरकार भी इस बात से वाकिफ है लेकिन भ्रष्टाचार के दलदल में डूबी सरकार इस ओर कोई कदम उठाने से बच रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि हर रोज राशन से भरे सैकड़ों ट्रक बदरीनाथ और केदारनाथ हाईवे पर देखे जा सकते हैं। राहत सामग्री से लदे ट्रक कहां जा रहे हैं और उनकी राशन किसे बांटी जा रही है इस बात की जानकारी किसी को भी नहीं है। स्थानीय प्रशासन भी इस बात से बेखबर है कि उसके यहां आने वाले ट्रकों की संख्या कितनी है और उसके पास कितनी राहत पहुंच पाई है। इतना ही नहीं प्रशासन के पास प्रभावित गांवों के बारे में कोई जानकारी नहीं है गांव वालों का कहना है कि कई गांवों में अभी तक पटवारी नहीं पहुंच पाया है, ये लोग बताते हैं कि उनका गांव सड़क से सटे होने पर भी पटवारी एक महीने बाद वहां पहुंचा। ऐसे में सरकार की राहत बांटने की बात कुछ अटपटी लगती है।
सरकार और प्रशासन देहरादून में बैठकर भले ही कुछ भी बयान दें लेकिन आपदा प्रभावित क्षेत्रों में राहत सामग्री की बदइंतजामी को लेकर पहाड़ के लोगों में भारी आक्रोश व्याप्त है। केदारनाथ के मुख्य पड़ाव गौरीकुंड से सटे गौरी गांव के जगदीश प्रसाद गोस्वामी बताते हैं कि उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं है। राहत सामग्री के बारे में पूछने पर गोस्वामी कहते हैं कि हेलीकाॅप्टर द्वारा गांव में राशन जरूर पहुंचाई गई थी लेकिन राशन जरूरतमंदों की बजाय कुछ लोगों तक सिमट कर रह गई। गौरीकुंड के आस-पास के गांवों के भी यही हाल है, कहने को तो सरकार द्वारा हेलीकाप्टर से रसद सामग्री बांटी जा रही है लेकिन यह रसद किसे और कितनी बंट रही है इसकी जानकारी किसी को नहीं है। एक स्थानीय बुजुर्ग कहते है कि जितनी राहत सामग्री उत्तराखंड पहुंची है अगर उसका तरीके से वितरण हो तो प्रभावित लोगों का गुजारा साल भर तक चल सकता है लेकिन सरकार की अकर्मण्यता के चलते ऐसा होना संभव नहीं है।
सरकारी तंत्र का कुप्रबंधन पाण्डुकेश्वर में भी देखने को मिला। जहां सरकारी मदद के लिए पाण्डुकेश्वर के आस-पास के गांवों को बुलाया गया था। लेकिन आपदा के मारे ग्रामीणों की आस उस वक्त टूटी जब उन्हें बैरंग वापस लौटना पड़ा। पाण्डुकेश्वर से 5 किलोमीटर दूर अपने गांव से राहत सामग्री के लिए पहुंची जयंती देवी कहती हैं कि उनके साथ बुरा बर्ताव हो रहा है। वह कहती है कि राहत सामग्री के लिए उन्हें पाण्डुकेश्वर बुलाया गया लेकिन इतनी दूर पैदल आने के बाद भी उन्हें राहत सामग्री नहीं मिली। जयंती देवी कहती है कि ऐसी आफत में प्रशासन उनके साथ भद्दा मजाक कर रहा है। सरकार के कुप्रबंधन का एक और उदाहरण गुप्तकाशी से कुछेक किलोमीटर दूर जौला-पाटियूं में दिखा। पाटियूं की ग्राम प्रधान कुंवरी देवी बताती है कि उनका गांव सड़क से सटा है लेकिन आपदा के इतने दिन बीतने के बाद भी उन्हें राहत के नाम पर एक भी फूटी कौड़ी नसीब नहीं हुई। इसे विडंबना नहीं और क्या कहेंगे जहां एक ओर राज्य को बहारी प्रदेशों से भारी तादाद में राहत सामग्री मिल रही है लेकिन प्रदेश सरकार है कि वह राहत को प्रभावितों तक पहुंचाने में नाकामयाब है।

मददगार एनजीओ
अगर एनजीओ नहीं होते तो हम भूखे मर जाते, आज हमारे पास खाने के लिए राशन और पहनने के लिए कपड़े हैं। यह सब एनजीओ की देन हैं, इन लोगों का कर्ज हम कभी नहीं चुका सकतेयह कहना है माहेश्वरी देवी का। चमोली जिले के जोशीमठ से 19 किलोमीटर दूर बसा घाट गांव। 16 जून को अलकनंदा के प्रलय ने इस गांव को भी तबाह कर डाला। स्थानीय लोगों का कहना है कि एनजीओ वालों की मदद से वह आज जिंदा हैं। घाट के ग्रामीणों का कहना है कि उनके गांव में सरकार द्वारा कोई मदद नहीं पहुंची है। वह कहते हैं कि आपदा को आये इतने दिन गुजर चुके हैं लेकिन अभी तक एक पटवारी के अलावा वहां कोई नहीं पहुंचा है।

यह हाल सिर्फ घाट गांव के नहीं है बल्कि समूचे पहाड़ों में सरकार की ओर से कोई भी अधिकारी पीडि़तों तक नहीं पहुंच पाया है। जबकि इसके उलट आपदा प्रभावित गांवों तक कई एनजीओ पहुंचे है। स्थानीय लोगों का कहना है कि शासन-प्रशासन सिर्फ सड़कों तक सिमट कर रह गया है। जबकि आपदा से सबसे ज्यादा पीडि़त सड़कों से दूर हैं। सेव द चिल्ड्रनसंस्था के अविनाश कुमार कहते हैं कि हमारी संस्था पहले आपदा प्रभावित क्षेत्रों का मुआयना करती है और लोगों की आवश्यकता के बारे में जानकारी जुटाती हैं। जिसके बाद हम लोग उस गांव में जाकर राहत सामग्री वितरित करते हैं। वह कहते हैं इस दौरान उन्हें कई सारी विपरीत परिस्थितियों का भी सामना करना पड़ता है।
सेव द चिल्ड्रन के अलावा धाद’, ‘आंचल चैरिटेबल ट्रस्ट’, ‘उत्तरांचल भातृमंडल’, ‘ए.टी.इंडिया’ ‘नव ज्योति डेवलपमेंट सोसइटी’, ‘अखिल गढ़वाल सभाजैसे कई एनजीओ ने पहाड़ों पर मोर्चा खोल रखा है। ए.टी. इंडिया एनजीओ से जुड़ी यशोदा सेमवाल कहती है कि उनके द्वारा आपदा प्रभावित क्षेत्रों को अगल-अलग सेक्टर में बांटा गया है। वह बताती हैं कि रूद्रप्रयाग जिले में 10 सेक्टर है जिसमें कालीमठ घाटी, केदार घाटी, मनसूना, आकाश कामनी, अगस्तमुनि, मयाली, चंदन गंगा, मोहनखाल, तिलवाड़ा और गिमतोली वैली शामिल हैं। यशोदा बताती है कि उनका एनजीओ खाद्य सामग्री के अलावा पीडि़तों के खाते भी बैंकों में खोल रहे हैं ताकि सरकार से मिलने वाली राहत राशि सीधे उनको मिल सके।
सरकार भले ही बड़े-बड़े दावे कर रही हो लेकिन पहाड़ों में एनजीओ से बेहतर काम प्रशासन नहीं कर पाया है। एनजीओ द्वारा धरातल पर किये जा रहे काम से स्थानीय लोगों को सीधे लाभ पहुंच रहा है। जानकारों की माने तो अगर एनजीओ द्वारा पहाड़ों में मदद नहीं पहुंचाई जाती तो आपदा प्रभावित क्षेत्रों में इस त्रासदी के आंकड़े और भी भयावह हो सकते थे। इन लोगों का कहना है कि राज्य सरकार महज खानापूर्ति के लिए हेलीकाॅप्टरों का उपयोग कर रही है, जो काम इलाकों में एनजीओ द्वारा अब तक किया गया वहां तक पहुंचने में सरकार को महीनों लग जायेंगे। राज्य हित में सरकार को चाहिए कि वह एनजीओ के साथ तालमेल बिठा कर लोगों तक राहत पहुंचाये।
बदहाल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं
यूं तो राज्य में स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाएं पहले से ही बदहाल है, लेकिन इस आपदा ने पहाड़ों में स्वास्थ्य और शिक्षा की असल हकीकत सबके समाने रखी है। आपदा प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा का इतना बुरा हाल है कि कुछ अस्पतालों में एक भी डाक्टर नहीं हैं। ऐसे में बीमार और घायल लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। स्थानीय लोगों की मानें तो बरसात के दिनों उन्हें और भी मुसीबत उठानी पड़ती है, वे लोग बताते हैं कि अस्पतालों में डाक्टर न होने के कारण उन्हें छोटी सी बीमारी के ईलाज के लिए श्रीनगर जाना पड़ता है।

अगस्तमुनि ब्लाॅक के जौल-पाटियूं ग्राम सभा के लोग बताते हैं कि उनके यहां स्थिति भारी नाजुक हैं ये लोग कहते हैं कि अगर इलाके में कोई बीमार होता है तो उसे देखने वाला यहां कोई डाक्टर नहीं है। लिहाजा उन्हें खर्चा करके ऋषिकेश और देहरादून जाना पड़ता है। दूसरी ओर स्कूलों का भी यही आलम हैं, कहीं स्कूल हैं तो टीचर नहीं, जहां टीचर हैं भी तो वहां स्कूल भू-स्खलन की जद में आ चुके हंै। पांडुकेश्वर की महिलाएं बताती है कि वह अपने बच्चों के भविष्य को लेकर खासी चिंतित हैं, वे कहती हैं कि गोविंदघाट और पांडुकेश्वर के पास सड़क टूटने से उनके बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं। इतना ही नहीं आपदा के चलते स्कूलों की दीवारंे जर्जर हालत में है ऐसे में उन्हें हर समय डर सताये रहता है कि कहीं कोई अनहोनी ना हो जाय। स्कूलों का यही हाल रूद्रप्रयाग जिले में भी हैं, भीषण त्रासदी के चलते कई स्कूल तबाही की भेंट चढ़ चुके हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जो स्कूल बचे भी है वह खतरे की जद में हंै, ऐसे में बच्चों को स्कूल भेजना खतरे से खाली नहीं हैं। और कहीं स्कूल की हालत तो सही है लेकिन भारी बारिश और भूस्खलन के चलते सड़के जगह-जगह क्षतिग्रस्त है जिससे बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। वह कहते हैं कि सड़कें क्षतिग्रस्त होने से स्कूल में टीचर भी नहीं आ पाते जिस वजह से बच्चों को घर वापस लौटना पड़ता है।

यात्रा बंद रोजगार ठप
जून के महीने उत्तराखंड में आई भीशण तबाही चार धाम यात्रा भी खटाई में पड़ गई है। चार धाम यात्रा के ठप पड़ने से लोगों के रोजगार पर भारी असर पड़ा है। बदरीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री धामों में यात्रियों को पहुंचाने वाले पोर्टरो, घोड़ा मालिकों और डंडी-कंडी वालों का व्यवसाय इस साल चैपट हो चुका है। इतना ही नहीं यात्रा रूट पर पड़ने वाले सैकड़ों ढ़ाबे, होटल और लाॅज इन दिनों सूने पड़े हैं। जोशीमठ में एक होटल संचालक बताते हैं इस साल उन्हें भारी नुकसान पहुंचा है। वह बताते हैं कि हर साल यात्रा के दौरान उनका होटल बुक रहता था। जिसके लिए लोग एडवांस बुकिंग कर लेते थे, इस बार भी उनके होटल में सैकड़ों बुकिंग थी लेकिन चार धाम यात्रा ठप पड़ने से उन्हें लोगों के पैसे वापस देने पड़ रहे हैं। उत्तराखंड में यह हाल मात्र एक होटल का नहीं है बल्कि सैकड़ों होटल मालिक इस आपदा से संकट में हैं।
चार धाम यात्रा के पीछे अपना गुजर-बसर करने वाले डंडी-कंडी वालों को इस बार सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा। दरअसल इन लोगों का मुख्य रोजगार धामों में यात्रियों को पहुंचाना है। लेकिन इस बार केदारप्रलय के बाद चार धाम यात्रा लगभग बंद हो चुकी है। जिसके चलते ये लोग अब पूरी तरह से बेरोजगार हो चुके हैं। ऐसे ही हालात घोड़ा स्वामियों की भी है। केदारनाथ और हेमकुंड साहिब में अधिकांश यात्री घोड़ों से पहुंचते हैं, अलकनंदा और केदारघाटी में अधिकांश लोग घोडे़-खच्चरों पर आश्रित हैं इसके अलावा उनके पास रोजगार का कोई और साधन नहीं है। ये लोग बताते हैं कि इस बार यात्रा में भारी भीड़ थी जिससे उन्हें अच्छे पैसे कमाने की काफी उम्मीद थी लेकिन 16 जून को आई बाढ़ ने उनके उम्मीदों पर पानी फेर दिया। केदारघाटी में घोड़ा-खच्चर वालों का कहना है कि बाढ़ में उनके कई खच्चर बह गये हैं लेकिन सरकार की ओर से उन्हें अभी तक कोई मदद नहीं मिल पाई है।
यात्रा पड़ावों पर बसे कस्बों की रौनक इस बार गायब हो चुकी है। यात्रा ठप पड़ने से बाजार सुने पड़े हैं। जोशीमठ में कपड़ों की दुकान चलाने वाले राजेश कहते हैं कि वह हरियाणा के रहने वाले हैं और पिछले कई सालों से यहां कपड़ों की दुकान चला रहे हैं। राजेश बताते हैं इस साल कुदरत ने उनके व्यापार को भी भारी नुकसान पहुंचाया। वह कहते हैं कि यात्रा बंद होने से वह भारी घाटे में है। पहाड़ में हर साल आपदा को देखते हुए वह कहते हैं अब पहाड़ में बिजनेस करना बहुत कठिन है वह बताते हैं कि वो अब हमेशा के लिए पहाड़ छोड़ देंगे और शहरों में कहीं काम तलाशेंगे। पहाड़ों में कुदरत की मार झेलने वाले कई राजेश हैं जो रोजगार के खातिर अब पहाड़ों की जगह शहरों में जाना चाहते हैं। इन लोगों का कहना है कि चार धाम यात्रा ही उनकी आजीविका का एक मात्रा जरिया था जो अब खत्म हो चुका है। लिहाजा उन्हें भी अब शहरों में कहीं नौकरी ढूंढनी पडे़गी।
राज्य सरकार भले ही सितंबर में तीन धामों में यात्रा शुरू करने का दावा कर रही हो, लेकिन स्थानीय लोगों का मानना है कि इस साल यात्रा होनी संभव नहीं हैं। इस बात को स्थानीय व्यापारी भी दबी जुबान में स्वीकारते हैं, इन लोगों की सरकार से मांग है कि वह चार धाम मार्गों को जल्दी बहाल करें।

आपदा की इस घड़ी में जब सरकार को पीडि़तों के बीच होना चाहिए था तब न जाने सरकार कहां थी। आपदा प्रभावित क्षेत्रों में सेना ने सराहनीय कार्य किया है। यदि के सेना के जवान जी-जान से बचाव कार्यों में नहीं जुटते तो बहुत भारी नुकसान हो सकता था। सीमा सड़क संगठन ने भी इस दौरान अच्छा काम किया है। उत्तराखंड सरकार को सेना और बीआरओ की मदद करनी चाहिए थी। लेकिन सरकार बीआरओं को आवश्यक धन उपलब्ध नहीं करा पाई। सरकार मंे शामिल नेता और नौकरशाह हवाई सर्वेक्षण तक ही सीमित रहे। राज्य में आई इस आपदा को चेतावनी समझते हुए भविष्य में पूरी तैयारी होनी चाहिए।
- बी.सी.खंडूड़ी, पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराख्ंड

उत्तराखंड सरकार ने आपदा के दौरान राहत और बचाव कार्यों पर पूरा ध्यान केंद्रित किया। मुख्यमंत्री जी के अलावा सभी मंत्रियों और विधायकों ने जिम्मेदारी से काम किया। सरकार ने काबिल अफसरों को आपदाग्रस्त क्षेत्रों में तैनात कर पीडि़तों को जल्द से जल्द राहत उपलब्ध कराई। यह बहुत बड़ी जल प्रलय थी। इसके बावजूद सरकार ने सेना के साथ मिलकर व्यापक स्तर पर बचाव कार्यों को अंजाम दिया। इसी संयुक्त प्रयास का नतीजा रहा कि लाखों लोगों को आपदाग्रस्त क्षेत्रों से बाहर निकाल कर सुरक्षित उनके घरों तक पहुंचाया। राहत कार्य अब भी चरम सीमा पर है। सरकार का प्रयास है कि अंतिम पीडि़त तक राहत सामग्री पहुंच सके। आपदा की इस घड़ी में भाजपा के नेता जिस तरह से बयानबाजी कर रहे हैं वह दुर्भाग्यपूर्ण हैं। यह पीडि़तों के जख्मों पर मदद का मरहम लगाने का समय है।
- सुबोध उनियाल, विधायक, कांग्रेस

उत्तराखंड में आपदा से बड़ा नुकसान हुआ है। पूरे देश के लोग इस आपदा से प्रभावित हुए हैं। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने इसे हिमालयी सुनामी कहा है। मैं स्वयं आपदाग्रस्त क्षेत्रों से लौटा हूं। सरकार के प्रयास नाकाफी हैं। इसलिए जरूरी है कि इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाय।


- त्रिवेंद्र सिंह पंवार, अध्यक्ष, उत्तराखंड क्रांति दल

हम युद्ध स्तर पर बंद सड़कों को खोलने में जुटें हैं। हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती मौसम बना हुआ है। भारी बारिश से दोबारा सड़कों पर मलबा आ रहा है। शासन और प्रशासन की मदद न मिलने से हमें खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। यदि हमें स्थानीय प्रशासन सहयोग करे तो हम सड़कों को यातायात के लिए खोल देंगे। हालांकि अभी तक हम हर रोज औसतन 20 मेजर लैंडस्लाइड हटा रहे हैं।
- मेजर राहुल श्रीवास्तव, बीआरओ

कहर किसका प्राकृतिक या सरकारी..?





आपदा नहीं यह हुक्मरानों का एस्टीमेट प्रबंध है
प्रदीप थलवाल

जब से धरती अस्तित्व में आयी, साल दर साल हिमालय के पर्यावरण में मानसून को बरसाने को मजबूर किया है। देश के बाकी हिस्सों में जहां हलक तक बूंद-बूंद के लिए तरशते हैं वहीं हिमालय में पूरे साल हरियाली का मंजर होता है। जो बरसात तोहफे के रूप में पहाड़ों को सरसब्ज करती है। वही बरसात बिजली बनाने के लिए, खेतों को सींचने के लिए पानी तो देती है साथ ही, जो मिट्टी पहाड़ों से कटती है उसे रेत और पत्थर बना कर नदी के तटों में छोड जाती है। हमारे आशियानों को बनाने के लिए। प्रकृति के इसी तोहफे का इंतजार बड़ी बेसब्री से हो रहा था लेकिन हर साल कुदरत के इस तोहफे को हमें कहर कहना पड़ रहा है और सरकारी लब्जों में ये प्राकृतिक आपदा है। सवाल है क्या सचमुच प्राकृतिक आपदा आयी है या नौकरशाहों या राजनेताओं की पिछले छह दशकों से सोई हुई जमात में प्रकृति के मार्ग में मानव जनित अवरोधक डाल कर स्वयं आपदा को न्यौता दिया है। बरसात हर साल आती है, अगले बरस भी आयेगी तो इसे प्राकृतिक आपदा कहा जाय या फिर सरकार जनित आपदा।
पिछले कुछ दिनों के दरमियान उत्तरकाशी से लेकर केदारघाटी के आसमान में हाॅलीकप्टर भी मंडरा रहे हैं और जमीन पर लालबत्ती जडि़त गाडियां भी रंेग रही है। जनता को इस बात का अहसास कराने लिए कि सरकार और सरकारी मशीनरी जागी हुई है। आपदा का जायजा लेकर प्रबंध का स्टीमेंट बनाने के लिए, दूरभाष पर देश के प्रधानमंत्री से लेकर यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी बात हो रही है, दिल्ली से हजार करोड़ की बड़ी खैरात भी लाई जा रही है। अन्य राज्य भी दिल खोलकर हमारी सरकार की आर्थिक मदद कर रहे हैं। अपनी सरकार भी  आपदा के आगे मुश्तैद रहने का अभिनय कर रही है।
लेकिन इतिहास के पन्नों को जरा पलटिये तो ये नजारे नए नहीं हैं। बीते सालों में भी आपदा आई, बीते साल भी दर्जनों मौत हुई, हजारों लोग बेघर हुए, दर्जनों बस्तियां जमींदोज हुई, आसमान में हाॅलिकाप्टर भी मंडराये, दून से लेकर दिल्ली तक के हुक्मरानों ने हवा और जमीन से तबाही के मंजरों को देखा और करोड़ों रूपये के स्टीमेट तैयार कर खैरात भी उत्तराखंड पहुंची, लेकिन अफसोस कि उस खैरात से उत्तराखंड के जिन प्रभावितों को मरहम लगाना था, देहरादून से सफर तय करके वो उनके उजडे आशियानों के पुनस्र्थापना की बजाय कहीं और ही जा पहुंची। आपदा के आगे जागी हुई सरकार, जागे हुए मुख्यमंत्री और उनके साथी। आज जागे हैं अहसास अच्छा हो  रहा है। लेकिन सवाल है कि क्या विजय बहुगुणा, आपदा प्रबंधन मंत्री यशपाल आर्य, कैबिनेट मंत्रियों ने क्या जिंदगी में पहली बार बरसात को देखा है। मुख्यमंत्री को उत्तराखंड की सियासत में आये हुए करीब दो दशक से भी अधिक समय हो गया है। भारी भरकम महकमों के लिए कोपभवन तक जाने वाले आपदा प्रबंधन मंत्री यशपाल आर्य के सिंचाई महकमे के लिए जो बरसात किसी वरदान से कम नहीं वहीं इस बारिश को समेटना उनके लिए किसी अभिशाप से कम नहीं लेकिन आर्य ने ना वरदान सहेजने का प्रबंध किया और ना आपदा से बचने का जुगाड़। प्रबंध के नाम सरकार द्वारा राहत उपलब्ध कराना तो दूर अब तक वह मलबे के ढेरों में दबे लोगों को भी नहीं तलाश पायी है। 
आपदा ने पूरे प्रदेश को हिलाकर रखा हुआ है। जैसे जैसे दिन आगे बढ़ेंगे प्रबंध को लेकर समाचार लिखे जायेंगे। लेकिन सवाल है कि हर साल आने वाली  इस बरसात को हम कहर के बजाय वरदान बनाने की अगर चिंता करते तो आपदा प्रबंधन मंत्रालय को सिर्फ बादल फटने से होने वाली हानि और पुल बहने के अलावा बाकि किसी भी नुकसान का ना जायजा करना पड़ता और ना ही प्रबंध। आजादी से लेकर आज तक नदी-घाटी बचाओ के नाम पर चल रही विभिन्न परियोजनाओं, पर्यावरण और जलचर संरक्षण, विभिन्न विकास प्राधिकरणों और धर्मस्व और साहसिक पर्यटन के नाम पर जितनी करोड़ो-करोड़ की धनराशि आवंटित हुई है। उसमें से आधी भी अगर योजनाबद्ध  तरीके से खर्च होती तो नदियों और घाटियों में निर्मित बस्तियां व व्यवसायिक बाजारों को तटों से हटाकर कहीं और सुरक्षित स्थानों पर विस्थापित किया जा सकता था, जिससे ना सिर्फ नदियों पर तटबंध और रमणीक पार्क व घाटों की स्थापना होती वरन आधा प्रदूषण भी खुद खत्म हो जाता। लेकिन अफसोस सरकारी सरपरस्ती में बदरी-केदार सहित गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक नदियों के तट कंकरीट के जंगलों से लगातार पट रहे हैं। और हर साल प्रकृति के इस वरदान के सामने खड़े होकर हम स्वयं आपदा को न्यौता दे रहे हैं।
आपदा के प्रबंध के लिए सरकार द्वारा जो स्टीमेट बनाया जाता है पीडि़तों को कभी भी  उसका लाभ नहीं मिल पाता। बेहतर होगा कि सरकार पिछले वर्षों की लीक को तोड़कर नई लीक गढ़े और जो लोग आपदा का दंश झेल रहे हैं उन्हें उनका हक दिलाये। केदारघाटी की इस आपदा से जागी हुई सरकार को जागृत तभी माना जायेगा जब अगले बरस प्रकृति के इसी वरदान को हमें फिर से कहर लिखने के लिए मजबूर ना होना पड़े।


ईको सेंसिटिव जोनः यह संवेदनशील मसला है



                     
गौमुख से उत्तरकाशी तक के 100 किलोमीटर का इलाका ईको संेसिटिवजोन घोषित कर दिया गया है। तमाम विरोध को दरकिनार करते हुए केंद्र सरकार ने ईको सेंसिटिवजोन को लेकर 21 अप्रैल को गज नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। इससे पूर्व 07 जनवरी 2013 को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा जारी पत्र में पूरे देश के 650 राष्ट्रीय पार्को व सेन्चुरी से लगे 10 किमी क्षेत्र को ईको सेन्सटिव जोन घोषित किये जाने के सन्दर्भ में सभी राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों को निर्देषित किया गया है। इसमें प्रत्येक राज्य को 15 फरवरी 2013 तक नेश्नल पार्कों व सेन्चुरियों से लगे क्षेत्रों को इको सेन्सेटिव जोनघोषित किये जाने का प्रस्ताव मंत्रालय को भेजे जाने की बात कही गयी थी। लेकिन प्रस्ताव नहीं मिलने पर वन्य जीव संरक्षण रणनीति-2002 के तहत अधिसूचित एवं 2011 के दिशा निर्देश लागू माने जायेंगें। यानी कि नेश्नल पार्को एवं वन्य जीव अभ्यारण्यों से लगे 10 किमी क्षेत्र को इको सेंसिटिव जोन घोषित माना जाएगा। उधर उत्तराखंड में गोमुख से उत्तरकाशी तक केंद्र सरकार द्वारा जारी नोटिफिकेशन के तहत भागीरथी नदी के जल संभरण क्षेत्र का 4179.59 वर्ग किलोमीटर इलाका परिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र के अंतर्गत होगा और इस पूरे इलाके में अब किसी भी तरह की गतिविधियां प्रतिबंधित हो जायेगी।
केंद्र सरकार के नोटिफिकेशन के बाद उत्तरकाशी में ईकोसंेसटिव को लेकर हल्ला मच गया है। हालांकि गौमुख के इस डरावने मंजर से पर्यावरण मंत्रालय की चिंता लाजमी है। जो गोमुख कभी बर्फ की दुशाला ओढ़कर भगीरथी के प्रवाह मे इजाफा करता था आज वह गौमुख डरावनी चट्टान बन कर गया है। कही से नहीं लगता कि कभी गोमुख बर्फीला ग्लेशियर रहा होगा। बहरहाल उत्तरकाशी मे ईको संेसंटिवजोन का मसला पर्यावरण के मुद्दो की हदों को पार कर सियासी मसला बन गया है। दरअसल उत्तरकाशी से गौमुख तक जिले के 88 गांवों पर पारिस्थितकीय संवेदनशीलता की आंच आ रही है। केंद सरकार के इस कदम के बाद इलाके में क्या होगा! बेशक आम आदमी की अपनी समझ अपने अंदाज में इसका मतलब न समझ पा रही हो। लेकिन सियासी कुनबा केंद्र के इस फैसले को अपने अंदाज में समझ रहा है और समझाने की कोशिश भी कर रहा है। पर्यावरण का मुद्दा भगवान विश्वनाथ की धरती पर सियासी मुद्दा बन कर रह गया है।
भाजपा के पूर्व विधायक गोपाल रावत का आरोप है कि कांगे्रस सरकार ने उत्तरकाशी से लेकर गोमुख तक जनता को गुमराह किया है। गंगोत्री से विधायक विजयपाल सजवाण केंद्र सरकार के फैसले पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि क्षेत्र में विकास के साथ कोई समझौता नही होगा और वह स्थानीय हितों के साथ हैं। सजवाण कहते हैं कि ईको संेसटिवजोन अगर विकास में रोडे़ अटकाता दिखाई देगा तो वे इसे काला कानून करार देंगे। सजवाण यह भी कहते हैं कि ये मासला अचानक एक दिन मंे पैदा नही हुआ। जब ईको संेसटिवजोन की कवायद शुरू हुइ थी तब सूबे मे भाजपा की सरकार थी और उस वक्त के निजाम ग्रीन बोनस की वकालत कर रहे थे। जबकि भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री रहे डा. रमेश पोखरियाल निशंक बताते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से बैठक कर इसका विरोध किया था। पूर्व मुख्यमंत्री पोखरियाल सवाल उठाते हैं कि इतने बड़े क्षेत्र को अति संवेदनशील करने पर केंद्र सरकार क्या पूरे उत्तराखंड को खाली कराना चाहती है।
भागीरथी नदी के दोनों किनारों से लगे बड़े भू-भाग को केंद्र सरकार द्वारा इको सेंसिटिव जोन घोषित किये जाने के बाद भारी विरोध को देखते हुए प्रदेश सरकार ने कैबिनेट बैठक बुलाई। जिसमें ईको संेसिटिव जोन का कैबिनेट ने भी विरोध किया। कैबिनेट बैठक में तय किया गया कि केंद्र सरकार को जनभावना से अवगत करा कर गजट नोटिफिकेशन में संसोधन के लिए पैरवी की जायेगी। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कहा कि ईको सेंसिटिव जोन के मसले पर प्रधानमंत्री, यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री और केंद्रीय वन मंत्री से बातचीत कर नोटिफिकेशन में संसोधन करने के प्रयास किये जायेंगे। हालांकि मुख्यमंत्री ने स्वीकारा कि पर्यावरण सुरक्षा और विकास दोनों जरूरी है, लिहाजा केंद्र को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जो कि बैलेंस रहे।
सियासी मसले के बीच कुछ लोग ऐसे भी है जो राज्य सरकार को कटघरे में खड़ाकर रहे है । उनका तर्क है कि अगर केंद्र ने 88 गांवों को दायरे मे लाने के लिए नोटिफिकेशन जारी किया है तो सूबे की सरकार भी इससे वाकिफ होगी। हालांकि ऐसे लोगों की राय हैै कि ये आबोहवा का मसला है सियासी मुद्दा नही। लिहाजा जन मुद्दे पर सियासत नही होनी चाहिए। गंगोत्री से उतरकाशी तक इको सेंसटिव जोन घोषित किये जाने के बाद से एक ओर जहां भाजपा ने इसका विरोध कर रही है वहीं धर्मनगरी हरिद्वार में संतों में काफी उत्साह है। मातृ सदन के स्वामी शिवानंद सरस्वती कहते हैं कि मातृ सदन और संत इसे गंगा और उत्तराखंड के पर्यावरण के लिए उठाया गया कारगर कदम मानते है। वह कहते हैं कि संतो की यह भी राय है कि गंगोत्री की तर्ज पर केदारनाथ और बद्रीनाथ से अलकनंदा और मंदाकनी तक वाले क्षेत्र भी इको सेंसटिव जोन घोषित किया जाना चाहिए। ताकि उत्तराखंड के पर्यावरण को बचाया जा सके।
उत्तराखंड के भूगोल को अगर देखें तो प्रदेश में 65 फीसदी भूमि पर वन हैं और मात्र 13 फीसदी भूमि ही कृषि भूमि है। जबकि प्रदेश में 6 नेश्नल पार्क व 7 सेन्चुरी हैं, कृषि भूमि कम होने के कारण प्रदेश का ग्रामीण समाज जंगलों और वन भूमि पर निर्भर है। ऐसी दशा में ग्रामीणों को पशुओं के लिए घास चारा पत्तियों से लेकर जलावन लकड़ी और आवास बनाने के लिए ईमारती लकड़ी से लेकर पत्थरों के लिए जंगलों पर निर्भर है।
जानकारों का मानना है कि पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा इको सेंसिटिव जोन घोषित किये जाने से पहले प्रदेश और केंद्र सरकार ने गोमुख से लेकर उत्तरकाशी की स्थिति, परिस्थिति और भौगोलिक परिस्थितियों सहित भू-बंदोबस्त का अध्ययन नहीं किया। इनका मानना है कि इको सेन्सटेटिव जोन बनाने से नेश्नल पार्कों और सेन्चुरियों से लगे क्षेत्र में निवास करने वाले ग्रामीणों का जीवन यापन असम्भव हो जायेगा। क्योंकि ऐसी दशा में ग्रामीण लोग ना तो पशुपालन ही कर पायेंगे और ना ही खेती या फिर अन्य कार्य कर पायेंगे।
ईको सेंसिटिव जोन को लेकर सोसल साइट नेटवर्क पर भी लंबी बहस छिड़ी है। फेसबुक पर वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा लिखते हैं कि अब प्रदेश में इको सेंसटिव जोन पर बवाल मचा है, मानो इससे नदियाँ थम जाएंगी, मकानों की छतें ढह जायेंगी, फलों से रस और फूलों से रंग गायब हो जाएगा। सच यह है कि गंगोत्री से उत्तरकाशी ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड का पूरा पर्वतीय क्षेत्र ही इको सेंसटिव यानी पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील है। बहुगुणा आगे लिखते हैं कि स्थानीय निवासियों के सिवा यहाँ की मिट्टी, रेत, बजरी, पत्थर, पानी और पेडों से छेड़ छाड़ का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए और स्थानीय लोगों को भी अपनी जरूरतों के लिए प्रकृति पर निर्भर रहने का अधिकार है, न कि व्यापार करने का, लेकिन ठेकेदारों और उनके रक्षित नेताओं ने चीख पुकार मचाना शुरू कर दिया। राजीव नयन लिखते हैं कि इकोलोजी ही हिमालय की स्थायी इकोनोमी है मिट्टी, पानी, रेत, बजरी, चूना, लकडी, पत्थर और वनौषधियों के व्यापारिक दोहन पर पूर्ण रोक लगे।
प्रदेश में पारिस्थितिकी सन्तुलन लगतार असन्तुलित हो रहा है, पारिस्थितिकी सन्तुलन के पीछे सरकार की जनविरोधी नीतियां, खनन माफिया और वन माफिया सहित तस्कर जिम्मेदार है। जिन्होंने पहाड़ को तबाह किया है। केंद्र सरकार द्वारा ईको सेंसिटिव जोन की घोषणा का विरोध भी यही लोग कर रहे हैं और जनता को बरगला रहे हैं। खैर बात निकली है तो दूर तलक जरूर जाएगी लिहाजा प्रदेश सरकार को चाहिए कि वह इस मसले पर दूरगामी सोच का परिचय दे।

Thursday, May 2, 2013

मीठी सरकार की कड़वी कोक


 कोक का शोक
प्रदीप थलवाल

उत्तराखंड की जनता एक बार फिर सड़कों पर उतरने को बेताब है, जिन चार ‘ज’ (जल, जंगल, जमीन और जवान) को लेकर दो दशक पहले उत्तराख्ंाड का समूचा समाज आंदोलित हो गया था, उसी हक के मारे जाने को लेकर एक दफा फिर से प्रदेश का ग्रामीण परिवेश आवेश में है। इस बार लड़ाई लखनऊ में बैठी सरकार से नहीं बल्कि जंग देहरादून से शासित उस सरकार से है जो छद्म पहाड़ी का ढ़ोंग रच कर सूबे की मलाई कार्पोरेट के कारिंदों को पहुंचा रही है। 
इस बार आंदोलन का केंद्र बिन्दु पहाड़ी क्षेत्र में नहीं बल्कि राजधानी के छोर पर बसे विकसनगर तहसील का छरबा गांव है। जहां के जल, जंगल और जमीन को बहुराष्ट्रीय कंपनी के आहते में गिरवी रखने की पटकथा प्रदेश सरकार ने लिख डाली है। सुनियोजित तरीके से तैयार इस योजना को विगत 17 अप्रैल को उस वक्त अमलीजामा पहनाया गया जब सचिवालय के चैथे माले में कोका कोला कंपनी और राज्य सरकार के बीच एमओयू पर दस्तखत हुए। 
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक शीतल पेय बनाने वाली कोका कोला कंपनी प्रदेश में 600 करोड़ रूपये की लागत से अपना धंधा शुरू करेगी। गजब देखिए कि विकासनगर तहसील के अंतर्गत जिस जमीन पर कोका कोला अपना प्लांट लगायेगा, उसकी परिधि में ना सिर्फ ग्रामीणों का जंगल आ रहा है बल्कि शीतला नदी का बीच का हिस्सा भी प्लांट की भेंट चढ़ेगा। इसे प्रदेश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि सूबे में पूंजी निवेश का ढिंढ़ोरा पीटने वाली बहुगुणा सरकार ने जो जमीन कोका कोला को आवंटित की, उसकी पैमाइश ना तो पहले सरकार ने की और ना ही इस बावत शासन-प्रशासन ने स्थानीय लोगों केा विश्वास में लेना उचित समझा। अलबत्ता कोक कंपनी के साथ सौदा बनने के बाद सरकार ने इलाके में जो पैमाइश करवाई उसके तहत ग्रामीणों का वह जंगल भी आ रहा है जिसे हरा-भरा करने में उनकी सालों की मेहनत लगी है। लगभग 68 एकड़ में फैले इस जंगल में दुर्लभ प्रजाति के खैर और शीशम के हजारों पेड़ तो हैं ही प्रवासी परिंदों का यह इलाका पनाहगाह भी है। सरकार का दुस्साहस देखिए कि इस क्षेत्र से बहने वाली शीतला नदी के बीच तक का हिस्सा सरकार कोक कंपनी को सौंपने जा रही है। परिस्थितिकी के बेजोड़ संतुलन वाले इस क्षेत्र को आखिर सरकार क्यों कोका कोला कंपनी को नीलाम करना चाहती है, यह सवाल सरकार की नीयत पर चारों ओर से उठ रहे हैं। 
राज्य सरकार यह सवाल उठने इस लिए भी लाजमी है क्योंकि इससे पहले सितारगंज स्थिति शक्ति फार्म और सैनिक फार्म की जमीन को खुर्द-बुर्द करने का आरोप सरकार पर लग चुका हैं। समाज से नाता रखने वालों से लेकर पर्यावरणविद्ों और स्थानीय जनता ने साफ कर दिया है कि वो कोका-कोला कंपनी को किसी भी कीमत पर प्रदेश में नहीं आने देंगे। नदी बचाओ अभियान से जुड़े सुरेश भाई का कहना है कि कोका कोला कंपनी प्रदेश का भला करने नहीं आ रही है बल्कि यह कंपनी मुनाफा कमाने आ रही है। उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रदेश में निकाय चुनाव हो रहे हैं और राज्य सरकार ऐसे वक्त निवेश करने में जुटी है। इतना ही नहीं उनका यह भी आरोप है कि राज्य सरकार ने                                                                                                                                 ग्र्राम पंचायत को भरोसे में लिये बिना उनकी जमीन कोका कोला को दे रही है। जबकि पंचायती राज एक्ट में साफ है कि ग्राम सभा या ग्राम पंचायत के अंतगर्त जमीन पर विकास कार्य करने के लिए एनओसी लेनी होती है, जो कि राज्य सरकार ने अभी तक नहीं ली। सरकार के इस फैसले से साबित होता है कि उसे ना तो आम जनता से लेना-देना है और ना ही उनकी बेशकीमती जमीन से। 
सरकार द्वारा कोका कोला को जमीन दिये जाने पर जहां ग्रामीण गुस्से में हैं वहीं पर्यावरणविद्ों ने भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पर्यावरणविद्ों का मानना है कोका कोला के प्लांट से ना सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा बल्कि इलाके में पानी का संकट भी मंडरायेगा। पर्यावरण के जानकारों का आरोप है कि कोका कोला पानी का लुटेरा है और देश में जहां भी कोक के प्लांट लगे हैं वहंा पानी की विकराल समस्या है। पर्यावरणविद् और नदी बचाओ अभियान से जुड़े सुरेश भाई का कहना है कि हिमालयी राज्यों में पानी अथाह है लेकिन पानी उनके काम नहीं आता। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह लोगों को निःशुल्क पानी उपलब्ध कराये लेकिन राज्य सरकार ऐसा ना कर कंपनियों को पानी पहुंचाने में ज्यादा मददगार बनी हुई है। सुरेश भाई आरोप लगाते हैं कि जहां भी कोका-कोला के प्लांट है उसने पानी का अंधाधुंध दोहन किया है जिससे वहां का वाटर लेवल तेजी से गिरा है। इसी स्थिति का सामना यहां के ग्रामीणों को भी करना पड़ेगा और उनकी सैकड़ों एकड़ में फैली कृषि भूमि पर खतरा मंडरायेगा। 
सरकार द्वारा डाकपत्थर बैराज से पानी दिये जाने के बयान पर सुरेश भाई का कहना है कि पानी राज्य की संपत्ति नहीं है, और ना ही राज्य सरकार इस पर कोई फैसला ले सकती है, सरकार कोका कोला को डाकपत्थर बैराज से पानी नहीं दे सकती। इसके लिए राज्य सरकार को हरियाणा, उत्तर प्रदेश सरकार से भी बातचीत करनी पड़ेगी। यह सरकार का विवादित फैसला है। 
यमुना में पानी नहीं है ऐसे में सरकार कहां से कोका-कोला को पानी उपलब्ध करायेगी। आंकड़े बताते हैं कि गर्मी के दिनों नदी में सिर्फ 10 फीसदी ही पानी रह जाता है। सुरेश भाई  बताते हैं कि ऐसी स्थिति में अगर सरकार कोका कोला को पानी की सप्लाई करती है तो फिर करोड़ों की लागत से बने ढकरानी, ढालीपुर और कुल्हाल विद्युत परियोजनाओं के लिए कहां से पानी लाया जायेगा। ऐसी दशा में यह तीनों परियोजनाएं ठप पड़ जायेगी जिससे प्रदेश में बिजली संकट गहरायेगा। 
कोका-कोला प्लांट का भारी विरोध करते हुए पर्यावरणविद्ों का कहना है कि सरकार को चाहिए कि उसे पहले प्रदेश में सामाजिक, पर्यावरणीय और आर्थिक अध्ययन करना चाहिए तब जाकर निवेशक को सूबे में निवेश करायें। लेकिन यहां तो सरकार बिना सर्वे किये अपनी मन-मर्जी से निवेश कराती है जिसका खामियाजा निर्दोष ग्रामीणों को उठाना पड़ता है। दूसरी ओर कोका-कोला प्लांट से भू-जल दूषित होने से भी पर्यावरणविद् चिंतित है उनका चिंता करना लाजमी है। क्योंकि जब प्लांट में शीतल पेय बनाया जायेगा तो उससे भारी मात्रा में रासायनिक तत्व भी निकलेंगे। जानकारों की माने तों इसमें सर्वाधिक कैडमियम और क्रोमियम जैसे जहरीले रसायन निकलेंगे जिससे कैंसर जैसी महामारी का खतरा बनेगा। इतना ही नहीं प्लांट से निकलने वाले अन्य रसायनों से कृषि भूमि भी जहरीली हो जायेगी। ऐसी स्थिति में यह समूचा इलाका बंजर हो जायेगा। 
राज्य सरकार जिस बैराज से कोका कोला कंपनी को पानी देने की बात कर रही है दरअसल यह बैराज देश का पहला कंजर्वेशन रिजर्व है। जिसे केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर 2004 में नोटिफिकेशन भी जारी हो चुका है। इसके बाद भी अगर राज्य सरकार यहां से कोक कंपनी को पानी सप्लाई करने की बात कहती है तो इससे साफ होता है कि प्रदेश सरकार पर्यावरण के प्रति कितनी फिक्रमंद है। यह वह इलाका है जहंा साइवेरिया से आने वाले प्रवासी पक्षी सबसे ज्यादा पहुंचते हैं। 4440.40 हेक्टेअर में फैले आसन बैराज में तकरीबन 250 से अधिक प्रजाति के विदेशी पंक्षी यहां आते हैं। पक्षी विशेषज्ञों का आंकलन है कि अगर यहां से कंपनी को पानी सप्लाई किया जाता है तो इससे पक्षियों का यह बसेरा उजड़ जायेगा।  
कोक कंपनी से उत्तराखंड सरकार ने एमओयू साइन कर दिया है, कोक के लिए सरकार ने पलकपावड़े बिछा तो दिये लेकिन यह उसकी गले की फंस भी बनता जा रहा है। छरबा में ग्रामीणों और पर्यावरणविद्ों का विरोध सरकार भले ही हल्के में ले रही हो लेकिन यह विरोध उसे महंगा भी पड़ सकता है। राज्य सरकार इस मुगालते में ना रहे कि सड़कों पर हकों के लिए आवाज बुलंद करने वाला सामाज सुस्त पड़ चुका है लेकिन जिस जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए इस प्रदेश की नींव रखी गई थी अगर उसी का हनन होने लगेगा तो निश्चित है समाज की चेतना सरकार की नींद हराम कर सकती है। लिहाजा कोक के शोक से सहमे समाज की बात गौर से सुनी जानी चाहिए।  

निकाय चुनावए तय करेगा बहुगुणा का भविष्य



भाजपा की साख भी दांव पर
प्रदीप थलवाल

उत्तराखंड में निकाय चुनाव का शंखनाद हो चुका हैए एक बार फिर प्रदेश की शहरी जनता भाग्यविधाता की भूमिका में है। लोकतंत्र के सियासी घाटों पर घातए प्रतिघात और भितरघात का खेल शुरू हो चुका है। टिकटों के बंटवारे को लेकर राजनीतिक पार्टियों में खेमेबंदी हो रही हैए कौनसा खेमा टिकट वितरण में हावी होगा कहना मुश्किल है क्योंकि दांव.पेंच आखिरी दौर तक अजमाये जायेंगे। प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के लिए निकाय चुनाव सबसे अहम होंगे इसकी असल वजह अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव का रास्त यहीं से तय होगा लिहाजा दोनों ही पार्टियों के लिए यह चुनाव किसी लिटमस टेस्ट से कमतर नहीं होगा।
ठीक एक साल पहले राज्य में विधानसभा चुनाव हुएए प्रदेश की जनता ने खंडित जनादेश देकर साबित कर दिया था कि उसे ना तो भाजपा से मोह है और ना कांग्रेस सेए खैर क्षेत्रीय और अन्य दलों को जनता ने सोचने को मजबूर कर दिया था। विधानसभा चुनाव में 32 सीट पाने वाली कांग्रेस सरकार बनाने में भले ही सफल रही लेकिन टिहरी संसदीय सीट पर हुए उप चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस के हौसले पस्त कर डाले। तो दूसरी ओर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से मात्र एक सीट से पिछड़ने वाली भाजपा सितारगंज उपचुनाव से हताश हुई लेकिन टिहरी के नतीजों ने बीजेपी को संभलने का मौका दिया। यानी गौर से अगर जाने और समझे तो दोनों पार्टियों की स्थिति कमोबेश एक सी है और निकाय चुनाव में जो भी पार्टी संगठित होकर मैदान में उतरेगी जीत का सेहरा उसी के सर पर सजेगा।
संगठित और अनुशासन की जहां तक बात की जायए दोनों ही मुख्य पार्टियों में इसका आभाव नजर आता है। पहले कांग्रेस की बात करें तो पार्टी के अंदर साल भर से कोहराम मचा हुआ हैए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा इस कोलाहल को समाप्त करने में नाकामयाब साबित हुए हैं। पार्टी के अंदर कई क्षत्रप लालबत्ती की लालसा पाले हुए हैंए जबकि सीएम लालबत्ती का वितरण करने से डरे हुए हैं उनका यह डर चुनावी नतीजों को लेकर है। लिहाजा विजय बहुगुणा अच्छे वक्त के इंतजार में हैंए लेकिन पार्टी के अंदर सब्र का बांध टूटता जा रहा है जिससे सरकार की भी किरकिरी हो रही है। पार्टी के अंदर मचे घमासान को देखते हुए बड़े नेता अपने हित साधने में जुटे हैंए यही वो नेता हैं जो  कार्यकताओं को अनुशासन की नसीहत देते हैं और खुद अनुशासन की गरिमा को लांघते हैं। जिससे बूथ लेवल पर काम करने वाला कार्यकर्ता अपने आप को उपेक्षित महसूस करता है। खुद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा मंचों से बूथ लेवल के कार्यकर्ताओं के सम्मान की बात तो करते हैं लेकिन वह सालभर में कार्यकर्ताओं के बीच अपनी सीधी पहुंच नहीं बना पाये। जिससे कार्यकर्ताओं का उनके प्रति मोहभंग हो चुका है और इसका असर निकाय चुनाव में दिखाई पड़ेगा।
भाजपा का हाल भी यही हैए अपने आप को संगठित और अनुशासित कहने वाली भाजपा में भी अशांति के बादल घिरे हुए हैं। पार्टी के अंदर तीन गुट सीधे आमने.सामने हैं। इन तीनों गुटों का कार्यकर्ताओं पर अपना प्रभाव है। लेकिन एक.दूसरे के बीच वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा के चलते कार्यकर्ता हाशिए पर है। हाल ही में प्रदेश अध्यक्ष चुनाव के दौरान पार्टी के अंदर उपजी नाराजगी सार्वजनिक होने से साफ हो चुका है कि कि भाजपा भी भाग्य भरोसे बैठी है। पार्टी में अंदरूनी गुटबाजी चरम पर होने से इसकी छाया निकाय चुनाव पर जरूर पड़ेगी।
उत्तराखंड में होने जा रहे निकाय चुनाव में भाजपा और कांग्रेस ही दो मुख्य पार्टियां है लेकिन दोनों के हालत एक.दूसरे से जुदा नहीं है। इन हालातों को दोनों पार्टियों के सर्वेसर्वा बखूबी जानते भी है और समझते भी है। इस कारणवश कांग्रेस निकाय चुनाव को पीछे सरकाना चाहती थी लेकिन वह अपने मनसूबे में सफल नहीं हो पायी। अदालत की चैखट पर पहंुचे इस मामले से सरकार की फजीहत तो हुई लेकिन निकाय चुनाव में जीत सुनिश्चित करने के लिए कांग्रेस ने आरक्षण का हथियार अपने मन मुताबिक इस्तेमाल किया लेकिन यहां भी उसे पार्टी कार्यकर्ताओं की नाराजगी झेलनी पड़ रही है। दरअसल इस पूरे प्रकरण में मुख्यमंत्री के निर्णय पर प्रश्नचिन्ह खड़े किया जा रहे हैंए नाराज कार्यकर्ताओं का कहना है कि सीएम अपने चाण.बाणों की कठपुतली बने हुए हैं। जो फायदा उठाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।
सरकार द्वारा अपनाये गये आरक्षण के फार्मूले से कांग्रेस के अंदर भारी नाराजगी देखी जा रही है जबकि भाजपा का कहना है कि कांग्रेस ने जो हथकंडा अपनाया उससे उसे नुकसान ही होगा फायदा नहीं। अदालत की फटकार के बाद सरकार ने निकायों का जो आरक्षण तय किया उससे कांग्रेस सरकार पर सवाल उठने लगे हैं सबसे पहले सरकार ने 2001 की जनगणना के आधार पर आरक्षण क्यों तय किया जबकि सरकार को चाहिए था कि वो 2011 की जनगणना के मुताबिक आरक्षण निर्धारित करे। नई जनगणना के आधार पर कई सीटें आरक्षण से बाहर होनी थी अन्य सीटों को आरक्षण मिलना था लेकिन सरकार ने अपने चहेतों की खातिर 2001 की जनगणना को आरक्षण का आधार बनाया। गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मंडलों में नगर पालिका की 14.14 सीटें हैं। सरकार की करामात देखिए कि कुमाऊं की 14 में से 10 सीट आरक्षित कर डाली और 4 सामान्य रखी जबकि इसके उलट गढ़वाल की 14 में 4 सीटों पर आरक्षण तय किया और 10 सामान्य रखी। गौर करने वाली बात यह है कि पिछली सरकार ने विगत निकाय चुनाव में दोनों मंडलों की आठ.आठ सीटें सामान्य थी।
उदाहरण के तौर पर अगर टिहरी नगर पालिका को देखें तो यह सीट कई सालों से सामान्य रही है। जबकि इस बार यह सीट आरक्षण के दायरे में थी लेकिन अपने चहेते को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों को तक पर रखा गया। ऐसा ही खेल अन्य सीटों पर खेला गया। जिसमें मसूरीए श्रीनगर जैसी पालिकाएं भी हैं। आखिरकार सरकार ने आरक्षण में जो मनमानी की है उसे जनता भी समझ रही हैए जिस जीत के लिए बहुगुणा एंड कंपनी ने आरक्षण में जो खेल खेला वह कितना असर कारक होगा यह तो अभी भविष्य के गर्भ में हैं लेकिन इतना तो साफ हो चुका है कि आरक्षण के विरोध में प्रदेश में माहौल बन रहा है जोकि कांग्रेस के लिए घातक साबित होगा। सरकार का कहना है कि निकायों का आरक्षण निमयमावली के तहत हुआ है जबकि विपक्ष का कहना है कि आरक्षण में एकरूपता नहीं है और आरक्षण में जमकर खेल हुआ है।
निकाय चुनाव को लेकर प्रदेश के पूरे परिदृश्य को देखें तो जनता सरकार की चालबाजियां भी जानती है और विपक्ष की खामोशी को भी भली.भांति समझ रही है। जनता यह भी जानती है कि निकाय चुनाव दोनों मुख्य पार्टी भाजपा और कांग्रेस के लिए अहम है लिहाजा वह भी अपने फैसले से एक बार फिर राजनीति के चाणक्यों को चैंकाना चाहेगी। ताकि हालात राजनीतिक पार्टियों के बजाय आम जनता के पक्ष में हो। इस बात को ना तो सत्ताधारी दल समझ रहा है और ना ही विपक्ष। जबकि अन्य दल सिर्फ चुनावी पम्पलेटों तक सिमटने की हैसियत रखते हैं।
खैरए निकाय चुनावों को लेकर भाजपा और कांग्रेस के अंदर एक.दूसरे को पटकनी देने की होड़ सी लगी हुई हैए लेकिन सत्तासीन कांग्रेस जिस प्रकार फैसले ले रही वह उसे नुकसान पहुंचाने में सहयक साबित होंगे। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के आंखों में इस वक्त सिर्फ जीत के ख्वाबों में गोते लगा रहे हैं उन्हें यह नहीं मालूम कि ख्वाब हमेशा अधूरे रह जाते हैं खासकर कि तब जब विपक्ष अपनी तैयारियों के साथ चुनावी रण में उतर रहा है और वह सिर्फ सपनीली नारंगी सेनाओं को लेकर जंग जीतने का सपना बुन रहे हैं। लिहाजा उन्हें भी समझना होगा कि आरक्षण के बंटवारे से जो विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं उससे सबक लिया जाय और चुनावी मैदान में जिताऊ प्रत्याशी उतारा जाय ना कि सिफारिशी सिपाही पर दांव खेला जाय। वरना आगमी लोक सभा चुनाव भी सर पर खड़ा है और इसी निकाय चुनाव से लोक सभा चुनाव का रास्ता निकलता है लिहाजा बहुगुणा के लिए यह चुनाव लिटमस टेस्ट सरीखा हैए जिससे पार पाना विजय के लिए चुनौति है।


(यह लेख विज़न 2020 पत्रिका में प्रकाशित)






Monday, March 25, 2013


                                   
प्रतापनगर के बाशिदों,
यह वक्त अंधेरी कंदराओं में सोने का नहीं है और ना ही यह समय नेताओं और उनके चाण-बाणों की बातों में आकर, सपनों की दुनिया में खो जाने का है, आज वक्त तुम्हें पुकार रहा है, सालों से समय तुम्हारे धैर्य की परीक्षा लेता रहा लेकिन अब नहीं! अब समय हमारा होगा, लेकिन उसके लिए हमें अपने आपको मजबूत करना होगा, पिछले कई दशकों से जो हमारे हालात बने हैं उसके दोषी जितने अन्य लोग हैं उससे कहीं ज्यादा दोषी हम खुद भी है। लिहाजा इन तमाम दोषों से मुक्त होने के लिए हमें एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद करनी होगी।
लालघाटी के बाशिंदों....! तुम्हें अपनी मातृभूमि की सौगंध, तुम्हें अपनी पवित्र भूमि की पीड़ा को समझना होगा, जो करवट तो बदलना चाहती है लेकिन ऐन वक्त पर तुम्हारा साथ छूट जाता है। ........ जरा गौर करो, सोचो और समझो, प्रसव वेदना से जूझती उन महिलाओं की दर्दभरी चीखें....जो पहाड़ों में टकराती हुई खामोश हो जाताी है, उन चुप होती आवाजों को हमें किलकारी में बदलना होगा.... हमें खामोश होते उन शब्दों को अल्फाज देने होंगे जो इलाज की खातिर रास्तों में ही दम तोड़ देते हैं।.... हमें अबोध बच्चों की तुतलाती जुबान को ध्यान से सुनना होगा जिनकी चाहत, सपनों के आसमान में उड़ने से पहले ही दम तोड़ देती है। उन उदास चेहरों के फीके पड़ते रंग को समझना होगा जिनकी आंखों में सुनहरे कल के सपने ओझल हो रहे हैं। महिलाओं की टूटती उम्मीदों को बटोरना होगा जिनकी कमर बोझ के चलते झुकती जा रही है। हमें उन लोगों के त्याग को आत्मसाथ करना होगा जिनकी उंगलियां हमारे उजज्वल भविष्य के खातिर पत्थरों से टिलने से चोटिल हुई। हमें उन जख्मों से मिले दर्द को भी समझना होगा जो हमारे पुरखों कोे अखंड और मजबूत पहाड़ों को धराशाही करने पर मिले। लालघाटी के बाशिदों! अपने भविष्य की पौध के लिए हमारे पुरखों ने तमाम झंझावतों के बाद भी कभी उफ तक नहीं की, और ना ही अपने चेहरे पर कभी दर्द की लकीरें पड़ने दी। उनकी हथेली पर पड़े मेहनत के छाले बताते हैं कि वो अपनी आने वाली पौध के लिए कितने फिक्रमंद थे।
लालघाटी के बाशिंदों....! आज प्रतापनगर किसी बूढ़े आदमी की तरह झील के उस पर उदास और खामोश बैठा है। उसकी आंखों में भविष्य के सपने दम तोड़ रहे हैं और झील का गहरा नीला रंग उसे भयभीत कर रहा है। प्रतापनगर आज डरा हुआ है उसकी औलादें उसे छोड़कर धीरे-धीरे महानगरों की ओर रूख कर रही है, यह सिलसिला कभी थमेगा भी नहीं, यह सोच उसे सदमा पहुंचाती है। लालघाटी के बाशिदों...! जिस झील को देश विकास का प्रतीक बताता है और जिससे पैदा की गई बिजली से हर रोज नहाता है, वही झील हमारे लिए बाड़ बन गई है। ऐसी बाड़ जिसे हम जला भी नहीं सकते, गहरे नीले पानी की ये बाड़ हमारे हौंसलों को हर रोज पस्त कर देती है, हमें लंगड़ा बना के रख दिया है और हमें चलने के लिए मात्र स्यांसू और पीपलडाली पुलों की बैसाखी थमा दी है। लेकिन हम हिम्मत नहीं हारेंगे, हमें अपना हक लेना होगा, प्रतापनगर के भाविष्य के खातिर हमें झील की बाड़ को लांघना होगा, हमें चांटी-डोबरा पुल के लिए लड़ना होगा साथियों, जिसे झील निर्माण से भी पहले बनना चाहिए था लेकिन हमारे दब्बूपन के कारण झील निर्माण के डेढ़ दशक बाद भी बन नहीं पाया और भी दूर-दूर तक इसके बनने की संभावनाएं भी नहीं दिखती।
जरा सोचिए कि आखिर अपने हकों के लिए प्रतापनगर का हर वो शख्स क्यों ठिठक गया, जिसके रगों में स्वाभिमान का खून दौड़ता है, आखिर लालघाटी के लालों ने अपने हक के लिए चुप्पी क्यों साध रखी है। आखिर क्यों ठिठक गये हो तुम, या फिर तुम्हें रोका गया। लालघाटी के बाशिदों तुम्हारा भविष्य सवाल कर रहा है कि यह स्थिति क्यों आ पड़ी है। क्या यह स्थिति तुमने खुद स्वीकारी है या फिर तुम पर जबरन थोपी गई है। खैर जो भी हो हमें अपने अंदर जमी सीलन और काई को साफ करना होगा, वरना दशकों इस दंश को झेलना पडे़गा।
लालघाटी के बाशिदों...! इस त्रासद काल से बाहर आना होगा। ठीक ही कहा था आचार्य चाणक्य ने जिसमें बदलने का साहस नहीं होता, उन्हें स्थितियों को सहना पड़ता है, लिहाजा अगर अभी स्थितियों को नहीं बदला जायेगा तो हमें ऐसे ही जूझना पड़ेगा। इसीलिए लालघाटी के वाशिदों यंत्रणाओं से हारकर तो हर कोई मर सकता है लेकिन यंत्रणाओं पर विजय पाकर बहुत कम मुक्त होते हैं। हम रहे या ना रहे इससे क्या फर्क पड़ता है लेकिन फर्क भविष्य पर जरूर पड़ेगा, क्योंकि भविष्य को हम लंगड़ा प्रतापनगर सौंप कर क्या उत्तर देंगे यह समझना होगा। लिहाजा लालघाटी के वाशिदों अपने सामथ्र्य को पहचानो, जो स्थितियों हमें मुंह चिढ़ा रही है और हमें चुनौती दे रही है इन स्थितियों से हमें लड़ना होगा और इन बाधाओं और वर्जनाओं को तोड़ना होगा, लिहाजा नवीन संरचनाओं को बुनना होगा।
लालघाटी के लालों चुनौतियों को देख निराश मत होना, तुम्हें अपने हक के लिए प्रयास करना होगा क्योंकि भविष्य के शिल्पी तुम हो और प्रतापनगर का भाग्य तुम्हें ही लिखना है।
 प्रदीप थलवाल