Thursday, May 2, 2013

मीठी सरकार की कड़वी कोक


 कोक का शोक
प्रदीप थलवाल

उत्तराखंड की जनता एक बार फिर सड़कों पर उतरने को बेताब है, जिन चार ‘ज’ (जल, जंगल, जमीन और जवान) को लेकर दो दशक पहले उत्तराख्ंाड का समूचा समाज आंदोलित हो गया था, उसी हक के मारे जाने को लेकर एक दफा फिर से प्रदेश का ग्रामीण परिवेश आवेश में है। इस बार लड़ाई लखनऊ में बैठी सरकार से नहीं बल्कि जंग देहरादून से शासित उस सरकार से है जो छद्म पहाड़ी का ढ़ोंग रच कर सूबे की मलाई कार्पोरेट के कारिंदों को पहुंचा रही है। 
इस बार आंदोलन का केंद्र बिन्दु पहाड़ी क्षेत्र में नहीं बल्कि राजधानी के छोर पर बसे विकसनगर तहसील का छरबा गांव है। जहां के जल, जंगल और जमीन को बहुराष्ट्रीय कंपनी के आहते में गिरवी रखने की पटकथा प्रदेश सरकार ने लिख डाली है। सुनियोजित तरीके से तैयार इस योजना को विगत 17 अप्रैल को उस वक्त अमलीजामा पहनाया गया जब सचिवालय के चैथे माले में कोका कोला कंपनी और राज्य सरकार के बीच एमओयू पर दस्तखत हुए। 
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक शीतल पेय बनाने वाली कोका कोला कंपनी प्रदेश में 600 करोड़ रूपये की लागत से अपना धंधा शुरू करेगी। गजब देखिए कि विकासनगर तहसील के अंतर्गत जिस जमीन पर कोका कोला अपना प्लांट लगायेगा, उसकी परिधि में ना सिर्फ ग्रामीणों का जंगल आ रहा है बल्कि शीतला नदी का बीच का हिस्सा भी प्लांट की भेंट चढ़ेगा। इसे प्रदेश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि सूबे में पूंजी निवेश का ढिंढ़ोरा पीटने वाली बहुगुणा सरकार ने जो जमीन कोका कोला को आवंटित की, उसकी पैमाइश ना तो पहले सरकार ने की और ना ही इस बावत शासन-प्रशासन ने स्थानीय लोगों केा विश्वास में लेना उचित समझा। अलबत्ता कोक कंपनी के साथ सौदा बनने के बाद सरकार ने इलाके में जो पैमाइश करवाई उसके तहत ग्रामीणों का वह जंगल भी आ रहा है जिसे हरा-भरा करने में उनकी सालों की मेहनत लगी है। लगभग 68 एकड़ में फैले इस जंगल में दुर्लभ प्रजाति के खैर और शीशम के हजारों पेड़ तो हैं ही प्रवासी परिंदों का यह इलाका पनाहगाह भी है। सरकार का दुस्साहस देखिए कि इस क्षेत्र से बहने वाली शीतला नदी के बीच तक का हिस्सा सरकार कोक कंपनी को सौंपने जा रही है। परिस्थितिकी के बेजोड़ संतुलन वाले इस क्षेत्र को आखिर सरकार क्यों कोका कोला कंपनी को नीलाम करना चाहती है, यह सवाल सरकार की नीयत पर चारों ओर से उठ रहे हैं। 
राज्य सरकार यह सवाल उठने इस लिए भी लाजमी है क्योंकि इससे पहले सितारगंज स्थिति शक्ति फार्म और सैनिक फार्म की जमीन को खुर्द-बुर्द करने का आरोप सरकार पर लग चुका हैं। समाज से नाता रखने वालों से लेकर पर्यावरणविद्ों और स्थानीय जनता ने साफ कर दिया है कि वो कोका-कोला कंपनी को किसी भी कीमत पर प्रदेश में नहीं आने देंगे। नदी बचाओ अभियान से जुड़े सुरेश भाई का कहना है कि कोका कोला कंपनी प्रदेश का भला करने नहीं आ रही है बल्कि यह कंपनी मुनाफा कमाने आ रही है। उन्होंने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रदेश में निकाय चुनाव हो रहे हैं और राज्य सरकार ऐसे वक्त निवेश करने में जुटी है। इतना ही नहीं उनका यह भी आरोप है कि राज्य सरकार ने                                                                                                                                 ग्र्राम पंचायत को भरोसे में लिये बिना उनकी जमीन कोका कोला को दे रही है। जबकि पंचायती राज एक्ट में साफ है कि ग्राम सभा या ग्राम पंचायत के अंतगर्त जमीन पर विकास कार्य करने के लिए एनओसी लेनी होती है, जो कि राज्य सरकार ने अभी तक नहीं ली। सरकार के इस फैसले से साबित होता है कि उसे ना तो आम जनता से लेना-देना है और ना ही उनकी बेशकीमती जमीन से। 
सरकार द्वारा कोका कोला को जमीन दिये जाने पर जहां ग्रामीण गुस्से में हैं वहीं पर्यावरणविद्ों ने भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पर्यावरणविद्ों का मानना है कोका कोला के प्लांट से ना सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा बल्कि इलाके में पानी का संकट भी मंडरायेगा। पर्यावरण के जानकारों का आरोप है कि कोका कोला पानी का लुटेरा है और देश में जहां भी कोक के प्लांट लगे हैं वहंा पानी की विकराल समस्या है। पर्यावरणविद् और नदी बचाओ अभियान से जुड़े सुरेश भाई का कहना है कि हिमालयी राज्यों में पानी अथाह है लेकिन पानी उनके काम नहीं आता। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह लोगों को निःशुल्क पानी उपलब्ध कराये लेकिन राज्य सरकार ऐसा ना कर कंपनियों को पानी पहुंचाने में ज्यादा मददगार बनी हुई है। सुरेश भाई आरोप लगाते हैं कि जहां भी कोका-कोला के प्लांट है उसने पानी का अंधाधुंध दोहन किया है जिससे वहां का वाटर लेवल तेजी से गिरा है। इसी स्थिति का सामना यहां के ग्रामीणों को भी करना पड़ेगा और उनकी सैकड़ों एकड़ में फैली कृषि भूमि पर खतरा मंडरायेगा। 
सरकार द्वारा डाकपत्थर बैराज से पानी दिये जाने के बयान पर सुरेश भाई का कहना है कि पानी राज्य की संपत्ति नहीं है, और ना ही राज्य सरकार इस पर कोई फैसला ले सकती है, सरकार कोका कोला को डाकपत्थर बैराज से पानी नहीं दे सकती। इसके लिए राज्य सरकार को हरियाणा, उत्तर प्रदेश सरकार से भी बातचीत करनी पड़ेगी। यह सरकार का विवादित फैसला है। 
यमुना में पानी नहीं है ऐसे में सरकार कहां से कोका-कोला को पानी उपलब्ध करायेगी। आंकड़े बताते हैं कि गर्मी के दिनों नदी में सिर्फ 10 फीसदी ही पानी रह जाता है। सुरेश भाई  बताते हैं कि ऐसी स्थिति में अगर सरकार कोका कोला को पानी की सप्लाई करती है तो फिर करोड़ों की लागत से बने ढकरानी, ढालीपुर और कुल्हाल विद्युत परियोजनाओं के लिए कहां से पानी लाया जायेगा। ऐसी दशा में यह तीनों परियोजनाएं ठप पड़ जायेगी जिससे प्रदेश में बिजली संकट गहरायेगा। 
कोका-कोला प्लांट का भारी विरोध करते हुए पर्यावरणविद्ों का कहना है कि सरकार को चाहिए कि उसे पहले प्रदेश में सामाजिक, पर्यावरणीय और आर्थिक अध्ययन करना चाहिए तब जाकर निवेशक को सूबे में निवेश करायें। लेकिन यहां तो सरकार बिना सर्वे किये अपनी मन-मर्जी से निवेश कराती है जिसका खामियाजा निर्दोष ग्रामीणों को उठाना पड़ता है। दूसरी ओर कोका-कोला प्लांट से भू-जल दूषित होने से भी पर्यावरणविद् चिंतित है उनका चिंता करना लाजमी है। क्योंकि जब प्लांट में शीतल पेय बनाया जायेगा तो उससे भारी मात्रा में रासायनिक तत्व भी निकलेंगे। जानकारों की माने तों इसमें सर्वाधिक कैडमियम और क्रोमियम जैसे जहरीले रसायन निकलेंगे जिससे कैंसर जैसी महामारी का खतरा बनेगा। इतना ही नहीं प्लांट से निकलने वाले अन्य रसायनों से कृषि भूमि भी जहरीली हो जायेगी। ऐसी स्थिति में यह समूचा इलाका बंजर हो जायेगा। 
राज्य सरकार जिस बैराज से कोका कोला कंपनी को पानी देने की बात कर रही है दरअसल यह बैराज देश का पहला कंजर्वेशन रिजर्व है। जिसे केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर 2004 में नोटिफिकेशन भी जारी हो चुका है। इसके बाद भी अगर राज्य सरकार यहां से कोक कंपनी को पानी सप्लाई करने की बात कहती है तो इससे साफ होता है कि प्रदेश सरकार पर्यावरण के प्रति कितनी फिक्रमंद है। यह वह इलाका है जहंा साइवेरिया से आने वाले प्रवासी पक्षी सबसे ज्यादा पहुंचते हैं। 4440.40 हेक्टेअर में फैले आसन बैराज में तकरीबन 250 से अधिक प्रजाति के विदेशी पंक्षी यहां आते हैं। पक्षी विशेषज्ञों का आंकलन है कि अगर यहां से कंपनी को पानी सप्लाई किया जाता है तो इससे पक्षियों का यह बसेरा उजड़ जायेगा।  
कोक कंपनी से उत्तराखंड सरकार ने एमओयू साइन कर दिया है, कोक के लिए सरकार ने पलकपावड़े बिछा तो दिये लेकिन यह उसकी गले की फंस भी बनता जा रहा है। छरबा में ग्रामीणों और पर्यावरणविद्ों का विरोध सरकार भले ही हल्के में ले रही हो लेकिन यह विरोध उसे महंगा भी पड़ सकता है। राज्य सरकार इस मुगालते में ना रहे कि सड़कों पर हकों के लिए आवाज बुलंद करने वाला सामाज सुस्त पड़ चुका है लेकिन जिस जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए इस प्रदेश की नींव रखी गई थी अगर उसी का हनन होने लगेगा तो निश्चित है समाज की चेतना सरकार की नींद हराम कर सकती है। लिहाजा कोक के शोक से सहमे समाज की बात गौर से सुनी जानी चाहिए।  

निकाय चुनावए तय करेगा बहुगुणा का भविष्य



भाजपा की साख भी दांव पर
प्रदीप थलवाल

उत्तराखंड में निकाय चुनाव का शंखनाद हो चुका हैए एक बार फिर प्रदेश की शहरी जनता भाग्यविधाता की भूमिका में है। लोकतंत्र के सियासी घाटों पर घातए प्रतिघात और भितरघात का खेल शुरू हो चुका है। टिकटों के बंटवारे को लेकर राजनीतिक पार्टियों में खेमेबंदी हो रही हैए कौनसा खेमा टिकट वितरण में हावी होगा कहना मुश्किल है क्योंकि दांव.पेंच आखिरी दौर तक अजमाये जायेंगे। प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के लिए निकाय चुनाव सबसे अहम होंगे इसकी असल वजह अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव का रास्त यहीं से तय होगा लिहाजा दोनों ही पार्टियों के लिए यह चुनाव किसी लिटमस टेस्ट से कमतर नहीं होगा।
ठीक एक साल पहले राज्य में विधानसभा चुनाव हुएए प्रदेश की जनता ने खंडित जनादेश देकर साबित कर दिया था कि उसे ना तो भाजपा से मोह है और ना कांग्रेस सेए खैर क्षेत्रीय और अन्य दलों को जनता ने सोचने को मजबूर कर दिया था। विधानसभा चुनाव में 32 सीट पाने वाली कांग्रेस सरकार बनाने में भले ही सफल रही लेकिन टिहरी संसदीय सीट पर हुए उप चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस के हौसले पस्त कर डाले। तो दूसरी ओर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से मात्र एक सीट से पिछड़ने वाली भाजपा सितारगंज उपचुनाव से हताश हुई लेकिन टिहरी के नतीजों ने बीजेपी को संभलने का मौका दिया। यानी गौर से अगर जाने और समझे तो दोनों पार्टियों की स्थिति कमोबेश एक सी है और निकाय चुनाव में जो भी पार्टी संगठित होकर मैदान में उतरेगी जीत का सेहरा उसी के सर पर सजेगा।
संगठित और अनुशासन की जहां तक बात की जायए दोनों ही मुख्य पार्टियों में इसका आभाव नजर आता है। पहले कांग्रेस की बात करें तो पार्टी के अंदर साल भर से कोहराम मचा हुआ हैए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा इस कोलाहल को समाप्त करने में नाकामयाब साबित हुए हैं। पार्टी के अंदर कई क्षत्रप लालबत्ती की लालसा पाले हुए हैंए जबकि सीएम लालबत्ती का वितरण करने से डरे हुए हैं उनका यह डर चुनावी नतीजों को लेकर है। लिहाजा विजय बहुगुणा अच्छे वक्त के इंतजार में हैंए लेकिन पार्टी के अंदर सब्र का बांध टूटता जा रहा है जिससे सरकार की भी किरकिरी हो रही है। पार्टी के अंदर मचे घमासान को देखते हुए बड़े नेता अपने हित साधने में जुटे हैंए यही वो नेता हैं जो  कार्यकताओं को अनुशासन की नसीहत देते हैं और खुद अनुशासन की गरिमा को लांघते हैं। जिससे बूथ लेवल पर काम करने वाला कार्यकर्ता अपने आप को उपेक्षित महसूस करता है। खुद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा मंचों से बूथ लेवल के कार्यकर्ताओं के सम्मान की बात तो करते हैं लेकिन वह सालभर में कार्यकर्ताओं के बीच अपनी सीधी पहुंच नहीं बना पाये। जिससे कार्यकर्ताओं का उनके प्रति मोहभंग हो चुका है और इसका असर निकाय चुनाव में दिखाई पड़ेगा।
भाजपा का हाल भी यही हैए अपने आप को संगठित और अनुशासित कहने वाली भाजपा में भी अशांति के बादल घिरे हुए हैं। पार्टी के अंदर तीन गुट सीधे आमने.सामने हैं। इन तीनों गुटों का कार्यकर्ताओं पर अपना प्रभाव है। लेकिन एक.दूसरे के बीच वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा के चलते कार्यकर्ता हाशिए पर है। हाल ही में प्रदेश अध्यक्ष चुनाव के दौरान पार्टी के अंदर उपजी नाराजगी सार्वजनिक होने से साफ हो चुका है कि कि भाजपा भी भाग्य भरोसे बैठी है। पार्टी में अंदरूनी गुटबाजी चरम पर होने से इसकी छाया निकाय चुनाव पर जरूर पड़ेगी।
उत्तराखंड में होने जा रहे निकाय चुनाव में भाजपा और कांग्रेस ही दो मुख्य पार्टियां है लेकिन दोनों के हालत एक.दूसरे से जुदा नहीं है। इन हालातों को दोनों पार्टियों के सर्वेसर्वा बखूबी जानते भी है और समझते भी है। इस कारणवश कांग्रेस निकाय चुनाव को पीछे सरकाना चाहती थी लेकिन वह अपने मनसूबे में सफल नहीं हो पायी। अदालत की चैखट पर पहंुचे इस मामले से सरकार की फजीहत तो हुई लेकिन निकाय चुनाव में जीत सुनिश्चित करने के लिए कांग्रेस ने आरक्षण का हथियार अपने मन मुताबिक इस्तेमाल किया लेकिन यहां भी उसे पार्टी कार्यकर्ताओं की नाराजगी झेलनी पड़ रही है। दरअसल इस पूरे प्रकरण में मुख्यमंत्री के निर्णय पर प्रश्नचिन्ह खड़े किया जा रहे हैंए नाराज कार्यकर्ताओं का कहना है कि सीएम अपने चाण.बाणों की कठपुतली बने हुए हैं। जो फायदा उठाकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।
सरकार द्वारा अपनाये गये आरक्षण के फार्मूले से कांग्रेस के अंदर भारी नाराजगी देखी जा रही है जबकि भाजपा का कहना है कि कांग्रेस ने जो हथकंडा अपनाया उससे उसे नुकसान ही होगा फायदा नहीं। अदालत की फटकार के बाद सरकार ने निकायों का जो आरक्षण तय किया उससे कांग्रेस सरकार पर सवाल उठने लगे हैं सबसे पहले सरकार ने 2001 की जनगणना के आधार पर आरक्षण क्यों तय किया जबकि सरकार को चाहिए था कि वो 2011 की जनगणना के मुताबिक आरक्षण निर्धारित करे। नई जनगणना के आधार पर कई सीटें आरक्षण से बाहर होनी थी अन्य सीटों को आरक्षण मिलना था लेकिन सरकार ने अपने चहेतों की खातिर 2001 की जनगणना को आरक्षण का आधार बनाया। गढ़वाल और कुमाऊं दोनों मंडलों में नगर पालिका की 14.14 सीटें हैं। सरकार की करामात देखिए कि कुमाऊं की 14 में से 10 सीट आरक्षित कर डाली और 4 सामान्य रखी जबकि इसके उलट गढ़वाल की 14 में 4 सीटों पर आरक्षण तय किया और 10 सामान्य रखी। गौर करने वाली बात यह है कि पिछली सरकार ने विगत निकाय चुनाव में दोनों मंडलों की आठ.आठ सीटें सामान्य थी।
उदाहरण के तौर पर अगर टिहरी नगर पालिका को देखें तो यह सीट कई सालों से सामान्य रही है। जबकि इस बार यह सीट आरक्षण के दायरे में थी लेकिन अपने चहेते को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों को तक पर रखा गया। ऐसा ही खेल अन्य सीटों पर खेला गया। जिसमें मसूरीए श्रीनगर जैसी पालिकाएं भी हैं। आखिरकार सरकार ने आरक्षण में जो मनमानी की है उसे जनता भी समझ रही हैए जिस जीत के लिए बहुगुणा एंड कंपनी ने आरक्षण में जो खेल खेला वह कितना असर कारक होगा यह तो अभी भविष्य के गर्भ में हैं लेकिन इतना तो साफ हो चुका है कि आरक्षण के विरोध में प्रदेश में माहौल बन रहा है जोकि कांग्रेस के लिए घातक साबित होगा। सरकार का कहना है कि निकायों का आरक्षण निमयमावली के तहत हुआ है जबकि विपक्ष का कहना है कि आरक्षण में एकरूपता नहीं है और आरक्षण में जमकर खेल हुआ है।
निकाय चुनाव को लेकर प्रदेश के पूरे परिदृश्य को देखें तो जनता सरकार की चालबाजियां भी जानती है और विपक्ष की खामोशी को भी भली.भांति समझ रही है। जनता यह भी जानती है कि निकाय चुनाव दोनों मुख्य पार्टी भाजपा और कांग्रेस के लिए अहम है लिहाजा वह भी अपने फैसले से एक बार फिर राजनीति के चाणक्यों को चैंकाना चाहेगी। ताकि हालात राजनीतिक पार्टियों के बजाय आम जनता के पक्ष में हो। इस बात को ना तो सत्ताधारी दल समझ रहा है और ना ही विपक्ष। जबकि अन्य दल सिर्फ चुनावी पम्पलेटों तक सिमटने की हैसियत रखते हैं।
खैरए निकाय चुनावों को लेकर भाजपा और कांग्रेस के अंदर एक.दूसरे को पटकनी देने की होड़ सी लगी हुई हैए लेकिन सत्तासीन कांग्रेस जिस प्रकार फैसले ले रही वह उसे नुकसान पहुंचाने में सहयक साबित होंगे। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के आंखों में इस वक्त सिर्फ जीत के ख्वाबों में गोते लगा रहे हैं उन्हें यह नहीं मालूम कि ख्वाब हमेशा अधूरे रह जाते हैं खासकर कि तब जब विपक्ष अपनी तैयारियों के साथ चुनावी रण में उतर रहा है और वह सिर्फ सपनीली नारंगी सेनाओं को लेकर जंग जीतने का सपना बुन रहे हैं। लिहाजा उन्हें भी समझना होगा कि आरक्षण के बंटवारे से जो विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं उससे सबक लिया जाय और चुनावी मैदान में जिताऊ प्रत्याशी उतारा जाय ना कि सिफारिशी सिपाही पर दांव खेला जाय। वरना आगमी लोक सभा चुनाव भी सर पर खड़ा है और इसी निकाय चुनाव से लोक सभा चुनाव का रास्ता निकलता है लिहाजा बहुगुणा के लिए यह चुनाव लिटमस टेस्ट सरीखा हैए जिससे पार पाना विजय के लिए चुनौति है।


(यह लेख विज़न 2020 पत्रिका में प्रकाशित)






Monday, March 25, 2013


                                   
प्रतापनगर के बाशिदों,
यह वक्त अंधेरी कंदराओं में सोने का नहीं है और ना ही यह समय नेताओं और उनके चाण-बाणों की बातों में आकर, सपनों की दुनिया में खो जाने का है, आज वक्त तुम्हें पुकार रहा है, सालों से समय तुम्हारे धैर्य की परीक्षा लेता रहा लेकिन अब नहीं! अब समय हमारा होगा, लेकिन उसके लिए हमें अपने आपको मजबूत करना होगा, पिछले कई दशकों से जो हमारे हालात बने हैं उसके दोषी जितने अन्य लोग हैं उससे कहीं ज्यादा दोषी हम खुद भी है। लिहाजा इन तमाम दोषों से मुक्त होने के लिए हमें एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद करनी होगी।
लालघाटी के बाशिंदों....! तुम्हें अपनी मातृभूमि की सौगंध, तुम्हें अपनी पवित्र भूमि की पीड़ा को समझना होगा, जो करवट तो बदलना चाहती है लेकिन ऐन वक्त पर तुम्हारा साथ छूट जाता है। ........ जरा गौर करो, सोचो और समझो, प्रसव वेदना से जूझती उन महिलाओं की दर्दभरी चीखें....जो पहाड़ों में टकराती हुई खामोश हो जाताी है, उन चुप होती आवाजों को हमें किलकारी में बदलना होगा.... हमें खामोश होते उन शब्दों को अल्फाज देने होंगे जो इलाज की खातिर रास्तों में ही दम तोड़ देते हैं।.... हमें अबोध बच्चों की तुतलाती जुबान को ध्यान से सुनना होगा जिनकी चाहत, सपनों के आसमान में उड़ने से पहले ही दम तोड़ देती है। उन उदास चेहरों के फीके पड़ते रंग को समझना होगा जिनकी आंखों में सुनहरे कल के सपने ओझल हो रहे हैं। महिलाओं की टूटती उम्मीदों को बटोरना होगा जिनकी कमर बोझ के चलते झुकती जा रही है। हमें उन लोगों के त्याग को आत्मसाथ करना होगा जिनकी उंगलियां हमारे उजज्वल भविष्य के खातिर पत्थरों से टिलने से चोटिल हुई। हमें उन जख्मों से मिले दर्द को भी समझना होगा जो हमारे पुरखों कोे अखंड और मजबूत पहाड़ों को धराशाही करने पर मिले। लालघाटी के बाशिदों! अपने भविष्य की पौध के लिए हमारे पुरखों ने तमाम झंझावतों के बाद भी कभी उफ तक नहीं की, और ना ही अपने चेहरे पर कभी दर्द की लकीरें पड़ने दी। उनकी हथेली पर पड़े मेहनत के छाले बताते हैं कि वो अपनी आने वाली पौध के लिए कितने फिक्रमंद थे।
लालघाटी के बाशिंदों....! आज प्रतापनगर किसी बूढ़े आदमी की तरह झील के उस पर उदास और खामोश बैठा है। उसकी आंखों में भविष्य के सपने दम तोड़ रहे हैं और झील का गहरा नीला रंग उसे भयभीत कर रहा है। प्रतापनगर आज डरा हुआ है उसकी औलादें उसे छोड़कर धीरे-धीरे महानगरों की ओर रूख कर रही है, यह सिलसिला कभी थमेगा भी नहीं, यह सोच उसे सदमा पहुंचाती है। लालघाटी के बाशिदों...! जिस झील को देश विकास का प्रतीक बताता है और जिससे पैदा की गई बिजली से हर रोज नहाता है, वही झील हमारे लिए बाड़ बन गई है। ऐसी बाड़ जिसे हम जला भी नहीं सकते, गहरे नीले पानी की ये बाड़ हमारे हौंसलों को हर रोज पस्त कर देती है, हमें लंगड़ा बना के रख दिया है और हमें चलने के लिए मात्र स्यांसू और पीपलडाली पुलों की बैसाखी थमा दी है। लेकिन हम हिम्मत नहीं हारेंगे, हमें अपना हक लेना होगा, प्रतापनगर के भाविष्य के खातिर हमें झील की बाड़ को लांघना होगा, हमें चांटी-डोबरा पुल के लिए लड़ना होगा साथियों, जिसे झील निर्माण से भी पहले बनना चाहिए था लेकिन हमारे दब्बूपन के कारण झील निर्माण के डेढ़ दशक बाद भी बन नहीं पाया और भी दूर-दूर तक इसके बनने की संभावनाएं भी नहीं दिखती।
जरा सोचिए कि आखिर अपने हकों के लिए प्रतापनगर का हर वो शख्स क्यों ठिठक गया, जिसके रगों में स्वाभिमान का खून दौड़ता है, आखिर लालघाटी के लालों ने अपने हक के लिए चुप्पी क्यों साध रखी है। आखिर क्यों ठिठक गये हो तुम, या फिर तुम्हें रोका गया। लालघाटी के बाशिदों तुम्हारा भविष्य सवाल कर रहा है कि यह स्थिति क्यों आ पड़ी है। क्या यह स्थिति तुमने खुद स्वीकारी है या फिर तुम पर जबरन थोपी गई है। खैर जो भी हो हमें अपने अंदर जमी सीलन और काई को साफ करना होगा, वरना दशकों इस दंश को झेलना पडे़गा।
लालघाटी के बाशिदों...! इस त्रासद काल से बाहर आना होगा। ठीक ही कहा था आचार्य चाणक्य ने जिसमें बदलने का साहस नहीं होता, उन्हें स्थितियों को सहना पड़ता है, लिहाजा अगर अभी स्थितियों को नहीं बदला जायेगा तो हमें ऐसे ही जूझना पड़ेगा। इसीलिए लालघाटी के वाशिदों यंत्रणाओं से हारकर तो हर कोई मर सकता है लेकिन यंत्रणाओं पर विजय पाकर बहुत कम मुक्त होते हैं। हम रहे या ना रहे इससे क्या फर्क पड़ता है लेकिन फर्क भविष्य पर जरूर पड़ेगा, क्योंकि भविष्य को हम लंगड़ा प्रतापनगर सौंप कर क्या उत्तर देंगे यह समझना होगा। लिहाजा लालघाटी के वाशिदों अपने सामथ्र्य को पहचानो, जो स्थितियों हमें मुंह चिढ़ा रही है और हमें चुनौती दे रही है इन स्थितियों से हमें लड़ना होगा और इन बाधाओं और वर्जनाओं को तोड़ना होगा, लिहाजा नवीन संरचनाओं को बुनना होगा।
लालघाटी के लालों चुनौतियों को देख निराश मत होना, तुम्हें अपने हक के लिए प्रयास करना होगा क्योंकि भविष्य के शिल्पी तुम हो और प्रतापनगर का भाग्य तुम्हें ही लिखना है।
 प्रदीप थलवाल

Friday, February 1, 2013

कविता संग्रह



1
तप
 बड़े बुजुर्ग कह गये 
 कि तप में ताकत होती है
 लेकिन मेरी साधना का सिला देखिए
कि ईश्वर तो मिला 
 मगर गूंगा और बहरा







2
इंतजार
खामोश और गुमशुम था मैं
हल पल राह निहार रहा था
उस भोर के इंतजार में
हर रात बेचैनी से काट रहा था
लेकिन मुझे क्या पता था
 कि रात की चांदनी में
मेरा चांद चोरी हो जायेगा।






3
स्वाभिमान
स्वाभिमान के चोले ने
ऐसी चोट पहुंचाई
कि मैं देखता रह गया
 और समुद्र लुटता गया।




4
त्याग
रे  दुनियां वालों!
थी तुम्हें शिकायत मेरे प्यार से
अब तो खुश हो जाओ
टांग दी खूंटी पर मैंने
अपने मोहब्बत की चादर






कृति- प्रदीप थलवाल

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Friday, January 25, 2013

संकट में ऊर्जा प्रदेश




विद्युत उत्पादन घटने से, ब्लैक आउट का बढ़ा खतरा
प्रदीप थलवाल
उत्तराखंड राज्य को लेकर यहां के वाशिंदों ने जो सपने बुने वो धीरे-धीरे  धूमिल होते नजर आ रहे हैं। राज्य में आपार प्राकृतिक संसाधनों के होने से इसे कुदरत के किसी तोहफे से कम नहीं आंका जाता था। यहीं वजह है कि इस प्रदेश के संसाधनों पर हर  किसी ने डाका डालने की कोशिश की। उत्तर प्रदेश मंे रहते हुए प्राकृतिक संसाधनों का जिस निर्ममता से दोहन किया गया था उसी का परिणाम उत्तराखंड राज्य आंदोलन  रहा। राज्य आंदोलन के दौरान प्रदेश के जनमानस ने अलग सूबे के लिए कई सपने देखे, उन्हीं सपनों से एक था ऊर्जा प्रदेश का। ऊर्जा में अत्म निर्भरता का जो सपना देखा गया  था वो हमारे पुरखों की उस उदासी के खात्मे का था, जिसे उन्होंने गुप और अंधेरी कंद्राओं में सहा और जिया था। लेकिन अफसोस कि राज्य गठन के बाद ऊर्जा प्रदेश का सपना खंड-खंड होता नजर आ रहा है।
जिस ऊर्जा प्रदेश का सपना प्रदेश सरकार दिखाती है उसकी असल सच्चाई देखनी है तो पहाड़ों में जाने की जरूरत नहीं है। प्रदेश के शहरों में ही आपको कई उदाहरण मिल जायेंगे। शहर में लोग  बिजली की कटौती से परेशान हंै। विद्युत विभाग जब चाहे अपने मन मुताबिक बिजली कटौती कर देता है।  बिजली कटौती के पीछे की अगर असल वजह देखें तो राज्य में विद्युत उत्पादन ना होना है। राज्य में भले ही कई बड़े और भारी भरकम बांध हैं और कुछ निर्माणाधीन और प्रस्तावित भी हैं। लेकिन इन सब के बावजूद  राज्य में हो रही बिजली की खपत के मुकाबले  बिजली पैदा नहीं हो रही है। आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 31.07 मिलियन यूनिट की डिमांड  है लेकिन उत्पादन सिर्फ 11.08 मिलियन यूनिट का हो रहा है।  यानी कि प्रदेश के तकरीबन सभी बिजली घरों पर जरूरत के एक तिहाई भी उत्पादन नहीं हो रहा है।
जिससे साफ होता है कि राज्य में बिजली संकट खत्म होने के बजाय गहराता जा रहा है। ऊर्जा के जानकारों की माने तो अगर प्रदेश के यही हालात रहे तो वो दिन दूर नहीं जब पूरे प्रदेश में ब्लैक आउट का खतरा होगा। दूसरी ओर ब्लैक आउट के खतरे से बचने के लिए विद्युत विभाग ने बड़ी मात्रा में बिजली कटौती का सहारा लिया है। दिसंबर 2011 और दिसंबर 2012 के आंकड़ों पर अगर गौर करें तो दिसंबर 2011 में 19.05 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ जबकि 24 दिसंबर 2012  तक 12.02 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ। आंकड़े साफ बता रहे है कि दिसंबर 2011 के मुकाबले दिसंबर 2012 में 11.08 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन कम हुआ। जबकि इसके सापेक्ष विद्युत की मांग 30.04 मिलियन यूनिट थी।
बिजली की आपूर्ति को पूरा करने के लिए निगम द्वारा केंद्र से 5.10 मिलियन यूनिट बिजली खरीदी जा रही है। साथ ही ग्रिड से 4 मिलियन यूनिट बिजली की खरीद भी हो रही है। लेकिन राज्य में विद्युत उत्पदान इतना कम हो रहा है कि इस समस्या से पार पान ेके लिए उत्तराखंड पावर कार्पोरेशन के पसीने छूट रहे हैं। बिजली उत्पादन में कमी और मांग अधिक होने के चलते ऊर्जा निगम ने बिजली कटौती का फंडा अपना लिया है। यही कारण है कि पहले गढ़वाल फिर कुमांऊ मंडल और अब शहरी क्षेत्रों में घंटो बिजली कटौती शुरू कर दी है।
इतना ही नहीं बिजली की बढ़ती मांग को देखते हुए ऊर्जा निगम बडे़ पैमाने पर कटौती के मूड में है और वो उन शहरी इलाकों में भी विद्युत कटौती करने वाला है जहां निगम ने कटौती ना करने का निर्णय लिया था। ऐसा नहीं है कि विद्युत उत्पादन के गिरते स्तर से पार पाने के लिए कदम ना उठाये हो, इसके लिए निगम ने बकायदा रणनीति बनाई जो कि कारगर साबित नहीं हुई। इसीलिए निगम अब विद्युत कटौती पर उतर आया है और हर रोज  पांच मिलियन यूनिट रोस्टिंग कर मांग के आस-पास पहुंचने की कोशिश कर रहा है। विद्युत कटौती को लेकर ऊर्जा निगम के अधिकारियों का कहना है कि दिसंबर माह में उन्हें इतने कम विद्युत उत्पादन की उम्मीद नहीं थी। अधिकारियों का कहना है कि लगातार बढ़ती ठंड के कारण नदियों का जलस्तर गिरने से बिजली उत्पदान में भी कमी आयी।
राज्य में बिजली कटौती जोरों पर है , लेकिन प्रदेश सरकार हर मंच से सूबे में शत प्रतिशत बिजली देने की बात करती है। यह हालात उस प्रदेश के हैं  जिसे ऊर्जा प्रदेश की पदवी जब-तब दी जाती है और सूबे को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की घोषणा की जाती है। विडंबना देखिए पहले ये बात भाजपा बोला करती थी और अब कांग्रेस। राज्य गठन के बाद दोनों दलों ने बारी-बारी से सूबे में शासन किया और जनता को ऊर्जा प्रदेश के ख्वाब दिखाये। सूबे को बिजली से रोशन करने के लिए बकायदा कागजों पर नीतियां बनाई  लेकिन असल हकीकत में इनका फायदा माफियाओं को पहुंचाया। प्रदेश की नदियों पर बांध बनाये गये, लाखों की संख्या में लोगों को उनकी जन्म और कर्मभूमि से उजाड़ा कर उन्हें विस्थापित किया गया।  बांधों से बनाई जा रही बिजली से दिल्ली जैसे महानगर ों को जगमगाया जा रहा है। लेकिन बिजली कि खातिर जिन लोगों को उनकी जड़ों से दूर किया वही लोग आज लालटेन युग में जीने को मजबूर हंै। जरा सोचिए क्या इसी ऊर्जा प्रदेश के लिए लोग सड़कों पर उतरे थे?


उत्तराखंड क्रांति दलः आपसी द्वंद और बिखराव



यूकेडी का सख्त फैसला, प्रीतम पंवार पार्टी से निलंबित
आपसी गुटबाजी से कहीं वजूद ना खो दे उक्रांद
प्रदीप थलवाल
कभी उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन की प्रमुख ताकत रही यूकेडी इस तरह कमजोर होकर बिखराव का दंश झेलेगी शायद ऐसा किसी ने भी नहीं सोचा होगा। कई दफा टूटने-जुड़ने और  बिखराव से गुजरने वाला ये क्षेत्रीय दल एक बार फिर से टूट की कगार पर है। मौजूदा समय में उत्तराखंड क्रांति दल के भीतर सब कुछ सामान्य नजर नहीं है। पार्टी के अंदर छोटे-बड़े  नेताओं की तलवारें खिंची हुई है। धडो़ं में विभाजित यूकेडी में अगर थोड़ी सी भी चूक हुई तो उक्रांद नेस्तनाबूद हो जायेगा और राज्य आंदोलन की ताकत रही यूकेडी के अवशेष इतिहास की  पोटली में नजर आयेंगे।
उत्तराखंड क्रांति दल के वर्तमान हालात उसकी करनी के ही फल है। राज्य गठन के बाद उक्रांद के इतिहास पर नजर डालें तो जनता के बीच यूकेडी की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी सेे गिरा है। कभी प्रदेश भर में यूकेडी की एक आवाज पर लोग अपना कामकाज छोड़ इकट्ठा हो जाया करते थे लेकिन मात्र दो दशक के अंदर ऐसा क्या हो गया कि यूकेडी ने अपनी ये खूबी खो दी। आलम यह है कि यूकेडी को लोग राज्य आंदोलन की ताकत के बजाय हिकारत भरी नजरों से देखते हैं। लेकिन दल की ऐसी स्थिति को लेकर कभी भी पार्टी के अंदर किसी ने इस ओर ना सोचा और ना ही समझने की कोशिश की और अगर कोशिशें हुई भी तो उनका नतीजा तो सिफर ही नजर आता है।
यूकेडी में जब-तब अजब-गजब फैसले लिए गये, ये फैसले पार्टी हित में जरूरी भी थे लेकिन ज्यादातर फैसलों में आपसी रंजिश की झलक नजर आती थी। अमूमन देखा जाय तो यूकेडी हमेशा कुछ ही लोगों के हाथ की कठपुतली बनी रही, वो जो भी फैसले लेते उसे पार्टी मान लेती और आम कार्यकर्ता फैसलों की सहमति पर सिर्फ गर्दन हिलाता रह जाता।  इन्हीं फैसलों में से एक पिछली भाजपा सरकार को पार्टी का समर्थन देना भी था। इस समर्थन का नतीजा यह हुआ कि उत्तराखंड क्रांति दल खेमों में बंट गई और धड़ों में बंटी यूकेडी के बीच असली और नकली की जंग छिड़ी। इसी बीच प्रदेश में विधानसभा चुनाव भी हुए। यूकेडी का आपसी द्वंद पार्टी का सिंबल भी सीज करवा बैठा। नतीजा यह रहा कि चुनाव आयोग ने दो गुटों को अलग-अलग चुनाव निशान आवंटित किया।
उक्रांद ;पीद्ध और उक्रांद ;डीद्ध नाम से अलग हुए मुख्य धड़ों ने चुनावी मैदान में अपनी ताल ठोकी। जिसमें उक्रांद ;पीद्ध एक सीट लाने में कामयाब रहा लेकिन उक्रांद ;डीद्ध को जनता ने सिरे से खारिज किया। उत्तराखंड की राजनीति को करीब से जानने वालों का कहना है कि इस जनादेश ने यूकेडी को जमीन दिखा दी और संकेत दे दिये हैं कि उसे अगर क्षेत्रीय ताकत बनना है तो दल के नेताओं को धड़ों में नहीं बल्कि एकजुट होना होगा। साथ ही उन्हें ग्राम स्तर पर अपने आप को मजबूत करना होगा। क्योंकि उक्रांद का जन्म क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर हुआ था ना कि राष्ट्रीय पार्टियों का पिछलग्गु बनने के लिए। राजनीति के जानकारों का ये भी कहना है कि यूकेडी ने मौजूदा कांग्रेस सरकार को समर्थन देकर फिर से साबित कर दिया है कि उसे सत्ता सुख भोगने की आदत पड़ गई है। राजनीतिक जानकार अंदेशा जता रहे है कि सरकार को दिया समर्थन यूकेडी के लिए कभी भी सिरदर्द बन सकता है और शायद यही वजह है कि यूकेड़ी के अंदर मचा घमासान इसी दर्द के संकेत हैं।  जो अब स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं।
हाल ही में चुनाव आयोग ने यूकेडी ;पीद्ध को असली ठहराया और जल्द केंद्रीय कार्यकारिणी गठित करने को कहा इसके साथ ही चुनाव आयोग ने यूकेडी को तगड़ा झटका भी दिया और उसकी क्षेत्रीय दल की मान्यता ही खत्म कर दी। जिससे यूकेडी के अंदर उपजी नाराजगी भी सामने आयी। छोटे और बेड़े नेताओं के साथ सबसे पहले यूकेडी कोटे से विधायक और प्रदेश सरकार में शहरी विकास मंत्री प्रीतम सिंह पंवार ने अपने केंद्रीय अध्यक्ष पर हमला बोला। प्रीतम पंवार ने त्रिवेंद्र पंवार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए कहा कि पार्टी में अध्यक्ष की कार्यप्रणाली किसी तानाशाह से कम नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब अध्यक्ष का कार्यकाल 25 जुलाई 2012 को  खत्म हो चुका है लेकिन वो पद पर असंवैधानिक ढंग से काबिज हैं। इतना ही नहीं प्रीतम पंवार ने उत्तराकाशी जिला कार्यकारिणी को भंग किये जाने को भी सरासर गलत ठहराया। प्रीतम पंवार अपने अध्यक्ष से इतने खफा हंै कि उन्होने साफ कर दिया है कि वो त्रिवेंद्र पंवार का नेतृत्व नहीं स्वीकार करेंगे।
बताया जा रहा है कि प्रीतम पंवार यूकेडी से अलग हुए धड़ों और अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर एक मजबूत राजनीतिक संगठन खड़ा करने की तैयारी में है। इसे देखते हुए त्रिवेंद्र पंवार के धुर विरोध प्रीतम के पक्ष में उतर आये हैं। दूसरी ओर धड़ों में बंट रही यूकेडी के नेताओं ने शहरी विकास मंत्री के बयान को गलत ठहराया और उन्हें नसीहत देते हुए कहा कि अगर प्रीतम पंवार पार्टी हित की बात करते तो उन्होंने अपनी बात पार्टी फोरम में रखनी चाहिए थी ना कि मीडिया में सार्वजनिक करनी चाहिए थी। उधर उक्रांद के वरिष्ठ नेता और पार्टी संरक्षक काशी सिंह ऐरी ने भी अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि पार्टी को चाहिए कि वो जल्द से जल्द केंद्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाएं। इसके लिए उन्होंने पार्टी अध्यक्ष को भी पत्र लिखा और 15 दिन के अंदर अधिवेश्न बुलाने की बात कही। यूकेडी के सूत्रों की माने तो काशी सिंह ऐरी पिछले लंबे समय से केंद्रीय अध्यक्ष से नाराज चल रहे हैं। बताया जा रहा है कि दल से उन्हें भी निष्कासित कर दिया था लेकिन कुछ वजहों के चलते उनके निष्कासन को रोक लिया गया। दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषकों की भविष्यवाणी भी सच साबित हो रही है। जिसमें राजनीतिक पंडितों का कहना था कि अगर पार्टी का माहौल ऐसा ही रह तो त्रिवेंद्र पंवार एक और इतिहास दोहरा सकते हैं । त्रिवेंद्र पंवार ने एक बार फिर सख्त फैसला लेते हुए पार्टी के एक मात्र विधायक और कांग्रेस सरकार में शहरी विकास मंत्री प्रीतम पंवार को पार्टी से निलंबित कर नोटिस भेज दिया है। पत्रकार वार्ता के दौरान यूकेडी के केंद्रीय अध्यक्ष ने सीधे लफ्जों कहा कि पार्टी में अनुशासनहीनता बर्दास्त नहीं की जायेगी और प्रीतम पंवार पिछले समय से अनुशासनहीनता कर रहे थे। यूकेडी अध्यक्ष के इस कड़क फैसले से ना सिर्फ कांग्रेस-यूकेडी गठबंधन पर फर्क पड़ेगा बल्कि ये फैसला पार्टी के लिए भी भारी पड़ेगा। उधर उक्रांद ;डीद्ध ने भी मामले की नजाकत को भांपते हुए फिर से पार्टी का एकीकरण का राग छेड़ दिया है।
यूकेडी में बन रहे समीकरण बता रहे हैं कि प्रदेश का एक मात्र क्षेत्रीय दल अपने एक और बिखराव की ओर है। यूकेडी का दुर्भाग्य देखिए कि जन्म से  ही इस क्षेत्रीय दल की नियति टूटने-संवरने और बिखरने की रही है। कमोबेश राजनीति में स्थिति बनती और बगड़ती कैसी है ये बात उक्रांद के नेता अच्छी तरह जानते हैं।  लेकिन पार्टी के किसी भी नेता ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और ना ही पार्टी के इन हालातों का मुल्यांकन करने की सोची। विडंबना देखिए कि एक बार फिर उत्तराखंड क्रांति दल हाशिये पर  है।  पार्टी में अंदरूनी कोहराम मचा हुआ है, एक-दूसरे पर आरोप मंढ़े जा रहे हैं कोई प्रीतम पंवार पर सवाल उठा रहे है तो कोई अध्यक्ष की कार्यप्रणाली को तानाशाही करार दे रहे है। लिहाजा दोनों से ही सवाल पूछा जाना चाहिए। प्रीतम पंवार ने अगर पार्टी के खिलाफ काम किया है तो उन्हें दंड दिया जाना उचित है,  जबकि दूसरी ओर पार्टी अध्यक्ष त्रिवेंद्र पंवार को भी बताना होगा कि उन्होने पार्टी के लिए अपने शासनकाल में क्या किया? आखिर पार्टी के नेता उनसे खफा क्यों हैं? क्या वजह है कि वो पार्टी को एकजुट करने में नाकाम हैं?  क्यों  उनकी कार्यप्रणाली पर उंगली उठायी जा रही है?
आखिर यूकेडी के नेताओं को समझना हो वो यूपी की सपा और बसपा,  पंजाब का अकाली दल, पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस, तमिलनाडू की डीएमके और एडीएमके, झारखंड की झमुमो की तरह क्यों नहीं बन पायी। यूकेडी नेताओं को एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी की जगह आत्ममंथन करना होगा कि उन्हें कैसे पार्टी को मजबूत करना होगा। ताकि उत्तराखंड राज्य आंदोलन की इस ताकत की बाजुएं फिर मजबूत हो सके। ?

मूल निवासः कोहरा घना है



प्रदीप थलवाल

प्रदेश भर में इन दिनों मूल निवास का मुद्दा गरमाया हुआ है। कई राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने इस प्रकरण को लेकर सरकार के खिलाफ हल्ला बोला। हाल ही में उत्तराखंड क्रंति दल ने मूल निवास को लेकर प्रदेश बंद का अहवान किया जिसे सूबे के कई राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने समर्थन देकर सफल बनाया। दूसरी ओर यूकेडी के फैसले का कई संगठनों ने विरोध कर मूल निवास के मुद्दे को और हवा दे दी है।
राजधानी से लेकर प्रदेश के जिलों में सरकार के उस बयान की निंदा हो रही है, जिसे प्रदेश की संसदीय कार्य मंत्री इंदिरा हृदयेश ने विधानसभा सत्र के दौरान दिया। सदन में बकौल संसदीय कार्य मंत्री ने कहा कि  राज्य गठन के दिन से सभी लोग मूल निवासी हैं। सरकार द्वारा सदन में दिया गया यह बयान तूल पकड़ता जा रहा है। पहाड़ से लेकर मैदानी इलाकों में सरकार के फैसले को प्रदेश की अवधारणा के विरोध में देखा जा रहा है। कई दलों की दलील है कि सरकार ने सदन में जो बयान दिया, वो सीधे-सीधे देश की अखंडता को चोट पहुंचाता है साथ ही संविधान का उल्लंघन भी करता है।
इससे पहले नैनीताल हाईकोर्ट ने भी मूल निवास के संदर्भ में फैसला सुनाया। जिसमें कोर्ट ने दलील दी कि 9 नवंबर 2000 यानि कि राज्य गठन के दिन जो भी व्यक्ति उत्तराखंड की सीमा में रह रहा था उसे यहां का मूल निवासी माना जायेगा। हाई कोर्ट और राज्य सरकार के फैसले से जनता भ्रमित हो चुकी है। क्योंकि देश की सर्वोच्च अदालत इस संदर्भ में पहले ही व्यवस्था कर चुकी है। सुप्रीम कोर्ट के अुनसार यदि कोई व्यक्ति रोजागर और अन्य कार्यों हेतु किसी दूसरे राज्य में जाता है, तो उसे उस राज्य का जाति प्रमाण पत्र नहीं मिलेगा, उसे उसी राज्य से जाति प्रमाण पत्र मिलेगा जहां का वो मूल निवासी है। सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था राष्ट्रपति के नोटिफिकेशन के तहत दी। मूल निवास के संदर्भ में भारत के राष्ट्रपति के नोटिफिकेशन की तिथि 10 अगस्त / 6 सितंबर 1950 को जो व्यक्ति जिस राज्य का स्थायी निवासी  था उसे उसी राज्य में मूल निवास प््रामाण पत्र मिलेगा। यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रपति के नोटिफिकेशन की तिथि पर अस्थाई रोजगार या अध्ययन के लिए किसी अन्य राज्य में गया हो तो भी उसे अपने मूल राज्य में ही जाति प््रामाण पत्र मिलेगा। ऐसे में मूल निवास के मसले पर राज्य सरकार का फैसला संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है।
संविधान के जानकारों का कहना है कि मूल निवास पर राज्य सरकार कोई भी ऐसा कानून नहीं बना सकती जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों और संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ हो। जानकारों  का कहना है कि विधानसभा में मूल निवास पर  नया शासनादेश जारी करने का ऐलान राजनीति से प्रेरित है। लिहाजा यह विधानसभा के विशेषाधिकार हनन का मामला बनता है।
उत्तराखंड के साथ देश के नक्शे पर छत्तीसगढ़ और झारखंड भी उभरे, लेकिन इन दोनों राज्यों में मूल निवास और जाति प्रमाण पत्र दिये जाने के प्रावधान हैं। झारखंड में उन्हीं व्यक्तियों को मूल निवास प्रमाण पत्र निर्गत किये जा सकते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी वहां के निवासी हैं। जबकि छत्तीसगढ़ में जाति प्रमाण पत्र उन्हीं लोगों को दिये जाते हैं जिनके पूर्वज 10 अगस्त/06 सितंबर 1950 को छत्तीसगढ़ के मूल निवासी थे। उन लोगों को यहां मूल निवास प्रमाण पत्र नहीं दिये जाते हैं जो यहां अन्य राज्यों से आये हैं।
कमोबेश यही स्थिति महाराष्ट्र की भी है। महाराष्ट्र में भी उसके गठन यानी कि 1 मई 1960 के बाद मूल निवास का मुुद्दा गरमाया था। महाराष्ट्र में भी वहां के गैर मूल निवासियों ने जाति प्रमाणपत्र  दिये जाने की मांग की। ऐसी स्थिति में महाराष्ट्र सरकार ने  भारत सरकार से इस संदर्भ में कानूनी राय मांगी। जिस पर भारत सरकार ने सभी राज्यों को राष्ट्रपति के नोटिफिकेशन की तिथि 10 अगस्त/6 सितंबर 1950 का परिपत्र जारी किया। भारत सरकार के दिशा-निर्देशन के बाद महाराष्ट्र सरकार ने 12 फरवरी 1981 को एक सर्कुलर जारी किया जिसमें स्पष्ट किया गया था कि राज्य में उन्हीं व्यक्तियों को अनुसूचित जाति जनजाति के प््रामाण पत्र मिलेंगे जो 10 अगस्त/ 6 सितंबर 1950 को राज्य के स्थाई निवासी थे। इस सर्कुलर में ये भी स्पष्ट किया था कि जो व्यक्ति 1950 में राज्य की भौगोलिक सीमा में निवास करते थे वहीं जाति प्रमाण पत्र के हकदार होंगे।
ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड में ऐसे नियम नहीं है। उत्तराखंड राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 की धारा 24,25 और इसी अधिनियम की पांचवीं और छठी अनुसूची एवं संविधान पीठ के निर्णय में साफ है कि उत्तराखंड में उसी व्यक्ति को जाति प्रमाण पत्र मिल सकता है जो 10 अगस्त/ 06 सितंबर 1950 को वर्तमान उत्तराखंड राज्य की सीमा में स्थाई निवासी के रूप में निवास कर रहा था। जानकारों का कहना है कि जब प्रदेश में मूल निवास का प्रावधान है तो फिर राज्य सरकार े मूल निवास की कट आॅफ डेट राज्य गठन को क्यों मान रही है। इससे यह बात भी निकल कर आती है कि राज्य सरकार 6 सितंबर 1950 के बाद बाहरी राज्यों से आए लोगों को मूल निवास के मामले पर गुमराह कर रही है। संविधान के जानकार आशंका व्यक्त करते हैं कि सरकार के फैसले से प्रदेश के मूल निवासी हाशिए पर तो जायेंगे लेकिन वो अपने हकों के लिए किसी भी हद तक जाने से नहीं हिचकिचाएंगे।
कमेटी दर कमेटी
उत्तराख्ंाड राज्य गठन के साथ ही प्रदेश में मूल निवास का मामला गरमाने लगा था। इस मामले को लेकर सूबे में राजनीति उग्र होने लगी। जिसे देखते हुए सभी सरकारों ने कमेटी का गठन पर मामले को शांत करने की कोशिश की। क्योंकि किसी भी सरकार के अंदर इतनी इच्छाशक्ति नहीं थी कि वो राष्ट्रपति के नोटिफिकेशन के प्राविधान को राज्य में लागू कर सके। जैसे कि अन्य राज्यों में है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी व्यवस्था के तहत निर्यण दिये हैं। लेकिन राज्य सरकार में दृढ इच्छाशक्ति की कमी और वोट बैंक की राजनीति जैसे कारकों ने प्रदेश में एक बड़ी समस्या खड़ी कर दी है। इस समस्या से ना सिर्फ पहाड़ और मैदान की खाई चैड़ी होती जा रही है बल्कि मूल निवासियों को उकसाने की कोशिशें भी तेज होती जा रही है। मूल निवास मसले पर कमेटी गठित करने का फैसला सबसे पहले भाजपा सरकार का था, यह वहीं भाजपा है जिसने राजधानी चयन आयोग बनाकर स्थाई राजधानी को लटकाने में अहम भूमिका निभाई। भाजपा सरकार ने प्रकाश पंत की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई। इस कमेटी ने अपनी सिफारिशों में कहा कि 1950 में जो व्यक्ति जहां का निवासी था उसे वहां का मूल निवासी माना जाय। साथ ही पंत कमेटी ने ये भी जोड़ा कि 15 साल पहले राज्य में रह रहे ऐसे व्यक्ति को भी स्थाई निवासी माना जाय जिसकी राज्य में स्थाई संपत्ति हो। ऐसा व्यक्त् िजो राजकीय सेवा में हो और उसका राज्य के बाहर ट्रांसफर ना हुआ हो। इसके साथ ही पंत कमेटी ने एक और दलील दी कि जिसका रोजगार कार्यालयों में स्थाई निवासी का रजिस्ट्रेशन हो। पंत कमेटी की सिफारिशों से राज्य सरकार सहमत नहीं हुई लिहाजा राज्य सरकार ने एक और समिति का गठन किया। इस समिति को गठन करने का श्रेय भी भाजपा सरकार को जाता है। भाजपा सरकार ने तत्कालीन मंत्री मदन कौशिक की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। गजब देखिए कि इस समिति में भाजपा ने जानबूझ कर यूकेडी नेता और उस समय भाजपा सरकार में राजस्व मंत्री रहे दिवाकार भट्ट को भी शामिल किया। इस समिति ने भी अपने फैसले दिये। जिसमें 11 वीं कक्षा में दाखिले पर डोमिसाइल नहीं मांगा जाय। राज्य बनने के बाद जितने लोग यूपी से आये थे उन लोगों को भी राज्य के अन्य लोगों की तरह मूल निवास प्रमाण पत्र दिया जाय। साथ ही अगर कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि वह राज्य में 60  साल से रह रहा है लेकिन उसके पास सिर्फ 40 साल तक के साक्ष्य है तो 20 साल के दस्तावेज राज्य सरकार उसे उपलब्ध कराये। कौशिक समिति की दलीलें पर अगर गौर करें तो इसमें साफ झलकता है कि ये धरातल पर काम किये बिना तैयार की गई है। भाजपा ने दो-दो कमेटी का गठन तो जरूर किया लेकिन लागू किसी भी कमेटी की सिफारिशें नहीं की। राज्य में सरकार अब कांग्रेस की है इस सरकार से लोगों को उम्मीद थी लेकिन कांग्रेस सरकार ने भी भाजपा की राह पर कदम आगे बढ़ाते हुए एक और कमेटी का गठन कर दिया है और ये कमेटी इंदिरा हृदयेश की अध्यक्षता में काम करेगी। अब देखना ये हो्रगा कि इंदिरा हृदयेश की अध्यक्षता में गठित ये कमेटी क्या फैसले देती है या फिर ये कमेटी भी घिसे-पिटे फार्मूले अपनाये और सिर्फ राजनीति के समीकरणों को ही हल करने की कोशिश करेगी।
बयान
मूल निवास को लेकर हाईकोर्ट का फैसला असंवैधानिक है। हाईकोर्ट का फैसला सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग, भारत सरकार द्वारा 1982 और 1984 को दिये गये निर्णय और संविधान के अनुच्छेद 5 के खिलाफ है। राज्य सरकार द्वारा हाईकोर्ट के फैसले को मान लेना उसकी असंवेदनशीलता को स्पष्ट करती है। जिस दिन से राज्य बना उस दिन से प्रदेश में सरकार चलाने वाली पार्टी हो या फिर सहयोगी दल सभी जनता की नजरों में दोषी हैं। क्योंकि किसी ने भी मूल निवास को लेकर ठोस कदम नहीं उठाये। वर्तमान बहुगुणा सरकार मूल निवास को लेकर संजीदा नहीं है अगर होती तो सरकार  हाईकोर्ट के निर्णय मानने के बजाय सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देती।  इसके साथ ही सदन में बैठने वाले विधायक हो या फिर पूर्व विधायक और मंत्री रहे हों, इस विषय पर किसी को दोष मुक्त नहीं किया जा सकता। क्योंकि जनता ने इन्हें सदन में निधि हजम करने के लिए नहीं भेजा बल्कि उनकी आवाज को सदन में उठाने के लिए भेजा। इन सभी ने जनता के विश्वास को तार-तार किया है।
रविंद्र जुगरान, पूर्व अध्यक्ष, राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद और भाजपा नेता।
हम राज्य सरकार के फैसले के बिलकुल पक्ष में नहीं हैं। क्योंकि देश में जब मूल निवास को लेकर व्यवस्था है तो फिर राज्य सरकार इस तरह कोई भी फैसला मानने पर क्यों बाध्य है। हाईकोर्ट का फैसला सरकार द्वारा माना जाना गंभीर है। इससे लोगों में भ्रंातियां उत्पन्न होंगी। देश के अंदर किसी भी जाति-संप्रदाय को कहीं भी रहने का अधिकार है। लेकिन जाति प्रमाण पत्र के लिए उसे अपने मूल राज्य से लेने का प्रावधान है। ऐसे में राज्य सरकार इस व्यवस्था के खिलाफ क्यों कदम उठा रही है। महिला मंच मांग करता है कि सरकार राज्य में स्थाई निवासी घोषित करे।
कमला पंत, अध्यक्षा, महिला मंच।
राज्य सरकार द्वारा मूल निवास की कट आॅफ डेट 9 नवंबर 2000 को स्वीकार करना इस प्रदेश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। मूल निवास पर सरकार का ये फैसला सोची समझी चाल है। क्योंकि सरकार में अधिकांश लोग मैदानी मूल के  हैं और ये नहीं चाहते हैं कि इस प्रदेश का भला हो। ये लोग सिर्फ अपने परिवार का भला चाहते हैं। इसीलिए मूल निवास को लेकर सरकार हाईकोर्ट का निर्णय स्वीकार कर रही है। राज्य के अगले परिसीमन में यह और भी खुलकर सामने आ जायेगी। जब पहाड़ में महज 17 सीटें रहेगी और सारी सीटों पर मैदान का कब्जा होगा। उत्तराखंड रक्षा मोर्चा सरकार के इस फैसला का घोर विरोध करता है।
टीपीएस रावत, अध्यक्ष, उत्तराखंड रक्षा मोर्चा
देखिए संविधान में मूल निवास को लेकर कहीं कोई जिक्र नहीं है। संविधान में दो शब्दों का जिक्र है जिसमें डोमिसाइल और रेजिडेंस हैं। 1950 में जो नोटिफिकेशन जारी हुआ था वो अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए हुआ था ना कि मूल निवास के लिए। उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में अगर बात करें तो 1950 में जब नोटिफिकेशन जारी हुआ था। तब उत्तराखंड का कोई अस्थित्व नहीं था। ऐसी स्थिति में अगर कोई जाति प्रमाण पत्र मांगता है तो सरकार को देखना चाहिए कि वह जाति यूपी में नोटिफाइड है कि नहीं। अगर है तो राज्य सरकार को चाहिए कि उसे जाति प्रमाण पत्र दे। जहां तक अनुच्छेद 5 का सवाल है तो इसमें मूल निवास का कहीं कोई जिक्र नहीं है इसमें नागरिकता की बात कही गई है। मूल निवास पर राज्य में बरगलाने वाली बात हो रही है। मूल निवास से ना तो लाभ है और ना ही हानि। मामला जाति प्रमाण पत्र का है ना कि मूल निवास का।
एस. एस. पांगती, पूर्व आईएएस अधिकारी
मूल निवास को लेकर लोग भ्रम में हैं। दरअसल मसला जाति प्रमाण पत्र है। संविधान में जाति प्रमाण पत्र दिये जाने की  व्यवस्था है। 1950 में जारी राष्ट्रपति के नोटिफिकेशन में साफ लिखा है कि किसी भी व्यक्ति को जाति प्रमाण पत्र उसके मूल राज्य से मिलेगा। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद कई बाहरी लोग इस प्रदेश में आये। उन्हें अगर यहां का जाति प्रमाण पत्र दिया जाता है तो उससे यहां के अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को मिलने वाला लाभ बाहरी लोग उठायेंगे, क्योंकि प्रदेश में कई जनजाति बहुत ही पिछड़ी हुई है। दूसरी बात सांस्कृतिक पहचान की भी है। उत्तराखंड राज्य का निर्माण ही अलग सांस्कृतिक पहचान के लिए हुआ था ऐसे में इस राज्य का औचित्य ही क्या रह जायेगा जब यहां के पिछड़े लोगों का हक कोई और छीन लेगा। सरकार में निर्णय लेने की क्षमता नहीं है  ऐसे में कुछ लोग जानबूझ कर मूल निवास का विरोध कर मैदान और पहाड़ को बांटने की कोशिश कर रहे हैं।
जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार